राजस्थान लोकगायन शैलियां और प्रमुख जातियां

राजस्थान लोकगायन शैलियां और प्रमुख जातियां
र ाजस्थान की सांस्कृतिक पहचान यहाँ की मरुधरा में गूंजने वाले लोक-संगीत से है। यहाँ की 'संगीतजीवी' जातियों ने न केवल कला को जीवित रखा, बल्कि इसे विश्व पटल पर भी पहुँचाया। राजस्थान में संगीत का विकास जाजमानी परंपरा (यजमान-संरक्षक) के तहत हुआ, जहाँ विशिष्ट जातियाँ अपने संरक्षकों के यहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी गायन-वादन का कार्य करती आ रही हैं। वर्ष 2023-24 में हुए जिलों के पुनर्गठन के बाद, इन जातियों के भौगोलिक वितरण में भी महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। Table of Contents 1. राजस्थान की विशिष्ट विद्वान एवं संगीतज्ञ जातियाँ यहाँ की जातियाँ केवल गायक नहीं, बल्कि इतिहासकार और कवि भी रही हैं। चारण (Charan): यह एक अत्यंत प्राचीन और विद्वान जाति है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत में भी इनका उल्लेख मिलता है। राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में इनकी संख्या सर्वाधिक है। ये चार भागों में विभक्त हैं: मारू, काछेला, सोरठिया और तुम्बेल। इनकी प्रमुख शाखाएँ आशिया, रोहड़िया और टापरिया हैं। राव (Rao): इस जाति में डिंगल और पिंगल भाषा के बड़े विद्वान और कवि हुए हैं। चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो के रचयिता) इसी परंपरा से माने जाते …