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मारवाड़

मेवाड़ राजवंश का संपूर्ण इतिहास (The Complete History of Mewar Dynasty)

मेवाड़ का राजवंश विश्व के सबसे प्राचीन राजवंशों में से एक है, जिसने एक ही स्थान पर सबसे लंबे समय तक शासन किया। इनका आदर्श वाक्य है- "जो दृढ़ राखे धर्म को, तिहि राखे करतार" (अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है, ईश्वर उसकी रक्षा करता है)।

1. मेवाड़: भौगोलिक स्थिति एवं प्राचीन नाम

मेवाड़ वर्तमान राजस्थान के दक्षिणी भाग में स्थित है। इसके अंतर्गत उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा और प्रतापगढ़ (आंशिक) के क्षेत्र आते हैं।

  • प्राचीन नाम: इसे मेदपाट (मेव जाति की अधिकता के कारण), प्राग्व़ाट और शिवि जनपद (राजधानी- माध्यमिका/नगरी) के नाम से जाना जाता था।
  • कुलदेवता: एकलिंगनाथ जी (लकुलीश संप्रदाय)। मेवाड़ के शासक स्वयं को इनका 'दीवान' मानकर शासन करते थे।
  • कुलदेवी: बाण माता।
  • राजध्वज: इनके ध्वज में एक ओर क्षत्रिय योद्धा और दूसरी ओर भील योद्धा (पूंजा भील का प्रतीक) अंकित है। बीच में उगता हुआ सूर्य है (सूर्यवंशी होने का प्रतीक)।

2. गुहिल वंश की उत्पत्ति (Origin of Guhil Dynasty)

मेवाड़ के शासक 'सूर्यवंशी' हिंदू हैं। इनके आदि पुरुष या मूल पुरुष गुहादित्य (Guhaditya) थे।

  • स्थापना: 566 ई. (लगभग) में गुहादित्य ने गुहिल वंश की नींव रखी।
  • माता-पिता: पिता शीलादित्य (वल्लभी के शासक) और माता पुष्पावती।
  • पालन-पोषण: कमलावती नामक ब्राह्मणी द्वारा बीरनगर (इडर) की गुफाओं में।

3. बप्पा रावल (Bappa Rawal): वास्तविक संस्थापक (734-753 ई.)

गुहिल वंश के वास्तविक संस्थापक कालभोज थे, जिन्हें 'बप्पा रावल' की उपाधि मिली थी।

  • गुरु: हारित ऋषि (पाशुपत संप्रदाय)।
  • चित्तौड़ विजय (734 ई.): बप्पा रावल ने मानमौर्य (मौर्य वंश) को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार किया।
  • राजधानी: नागदा (उदयपुर)। यहाँ उन्होंने सास-बहू (सहस्त्रबाहु) का मंदिर बनवाया।
  • उपलब्धियाँ:
    • इन्होंने अरब आक्रमणकारियों (मोहम्मद बिन कासिम के बाद के प्रभाव) को सिंध तक खदेड़ा।
    • इतिहासकार सी.वी. वैद्य ने इनकी तुलना 'चार्ल्स मार्टेल' (फ्रांसीसी सेनापति) से की है।
    • इन्होंने मेवाड़ में सर्वप्रथम सोने के सिक्के चलाए (115 ग्रेन)।

4. मध्यकालीन मेवाड़ के प्रमुख शासक

(A) अल्लट (Allat) - (10वीं सदी)

  • उपाधि: आलू रावल।
  • दूसरी राजधानी: आहड़ (Ahar) को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
  • नौकरशाही: मेवाड़ में सर्वप्रथम 'नौकरशाही' (Bureaucracy) का गठन किया।
  • अंतरराष्ट्रीय विवाह: हूण राजकुमारी 'हरिया देवी' से विवाह किया।

(B) जैत्रसिंह (Jaitra Singh) - (1213-1253 ई.)

  • भूताला का युद्ध (1227 ई.): जैत्रसिंह ने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश को हराया। इस युद्ध की जानकारी जयसिंह सूरी के ग्रंथ 'हमीर मद मर्दन' में मिलती है।
  • स्वर्ण काल: इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा ने इनके काल को "मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्ण काल" कहा है।
  • राजधानी: नागदा के नष्ट होने पर चित्तौड़ को अपनी नई राजधानी बनाया।

5. रावल रतन सिंह और चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.)

ये गुहिल वंश की रावल शाखा के अंतिम शासक थे।

  • समकालीन शत्रु: अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली सुल्तान)।
  • युद्ध के कारण: साम्राज्य विस्तार की नीति, चित्तौड़ का सामरिक महत्व और (किवदंतियों के अनुसार) रानी पद्मिनी की सुंदरता।
  • चित्तौड़ का प्रथम साका (26 अगस्त 1303):
    • केसरिया: रावल रतन सिंह, गोरा और बादल (पद्मिनी के चाचा-भाई) के नेतृत्व में राजपूतों ने केसरिया किया।
    • जौहर: रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ अग्नि जौहर किया। यह राजस्थान के इतिहास का सबसे बड़ा जौहर माना जाता है।
  • परिणाम: अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर 'खिज्राबाद' रखा और अपने पुत्र खिज्र खां को सौंप दिया।
  • साहित्यिक साक्ष्य: मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित 'पद्मावत' (1540 ई.)।

6. सिसोदिया वंश (Sisodia Dynasty) का उदय

राणा हम्मीर (Rana Hammir) - (1326-1364 ई.)

रावल शाखा की समाप्ति के बाद सिसोदा गाँव के जागीरदार हम्मीर ने 1326 ई. में चित्तौड़ पर पुनः अधिकार किया और 'सिसोदिया वंश' या 'राणा शाखा' की नींव रखी।

  • उपाधियाँ:
    • मेवाड़ का उद्धारक (Savior of Mewar)।
    • विषम घाटी पंचानन (कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति में) - इसका अर्थ है 'विकट परिस्थितियों में शेर के समान'।
  • सिंगोली का युद्ध: मोहम्मद बिन तुगलक को पराजित किया।
  • निर्माण: चित्तौड़ में अन्नपूर्णा माता (बरबड़ी माता) का मंदिर बनवाया।

राणा लाखा (Lakha) - (1382-1421 ई.)

  • जावर माइंस: इनके काल में जावर (उदयपुर) में चाँदी की खान निकली, जिससे आर्थिक समृद्धि बढ़ी।
  • पिछोला झील: एक बंजारे (पिच्छू) ने पिछोला झील का निर्माण करवाया।
  • मारवाड़-मेवाड़ संबंध: मारवाड़ के राव चूड़ा ने अपनी पुत्री हंसाबाई का विवाह लाखा के साथ किया, इस शर्त पर कि हंसाबाई का पुत्र ही मेवाड़ का अगला राजा बनेगा।
  • कुंवर चूड़ा: लाखा के जेष्ठ पुत्र चूड़ा ने हंसाबाई के पुत्र (मोकल) के लिए राजगद्दी त्याग दी। उन्हें 'मेवाड़ का भीष्म पितामह' कहा जाता है।

राणा मोकल (Mokal) - (1421-1433 ई.)

  • इन्होंने चित्तौड़ में समिधेश्वर मंदिर (त्रिभुवन नारायण मंदिर) का जीर्णोद्धार कराया।
  • 1433 ई. में झीलवाड़ा (राजसमंद) में चाचा और मेरा ने इनकी हत्या कर दी।

7. महाराणा कुंभा (Maharana Kumbha) - (1433-1468 ई.)

महाराणा कुंभा का काल मेवाड़ के इतिहास का 'स्थापत्य कला का स्वर्ण काल' (Golden Era of Architecture) कहलाता है। वीर विनोद ग्रंथ (श्यामलदास) के अनुसार, मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण कुंभा ने करवाया।

(A) प्रमुख विजय (Military Conquests):
  • सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): मालवा के महमूद खिलजी-I को हराया।
    • इस विजय के उपलक्ष्य में चित्तौड़ में 9-मंजिला विजय स्तंभ (Vijay Stambh) बनवाया।
    • विजय स्तंभ को 'भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश' और 'विष्णु ध्वज' कहा जाता है।
  • चंपानेर की संधि (1456 ई.): मालवा और गुजरात के सुल्तानों ने मिलकर कुंभा को हराने की योजना बनाई, लेकिन कुंभा ने उन्हें 1457 (बदनौर युद्ध) में फिर से हरा दिया।
(B) सांस्कृतिक उपलब्धियाँ:
  • उपाधियाँ: हाल गुरु (पहाड़ी दुर्गों का स्वामी), अभिनव भरताचार्य (संगीत प्रेमी), राणो रासो (साहित्यकारों का आश्रयदाता), छाप गुरु (छापामार युद्ध में निपुण)।
  • प्रमुख ग्रंथ: संगीत राज (5 भागों में), संगीत मीमांसा, सूड प्रबंध। इन्होंने जयदेव की 'गीत गोविंद' पर 'रसिक प्रिया' टीका लिखी।
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग: अपनी पत्नी कुंभल देवी की याद में बनवाया। इसका शिल्पी 'मंडन' था। इसकी दीवार (36 किमी) चीन की दीवार के बाद दूसरी सबसे लंबी दीवार है। इसी दुर्ग में 'कटारगढ़' (मेवाड़ की आँख) स्थित है।

8. महाराणा सांगा (Maharana Sanga) - (1509-1528 ई.)

इनका मूल नाम संग्राम सिंह था। इन्हें 'सैनिकों का भग्नावशेष' (Remains of a Soldier) कहा जाता है क्योंकि इनके शरीर पर 80 घाव थे। ये अंतिम हिंदू सम्राट थे जिनके नेतृत्व में सभी राजपूत राजा एकजुट हुए (पाती पेरवन प्रथा)।

(A) प्रमुख युद्ध:
  • खातौली का युद्ध (1517 ई.): इब्राहिम लोदी (दिल्ली) को हराया। (सांगा का एक हाथ कटा)।
  • बाड़ी का युद्ध (1518 ई.): धौलपुर में इब्राहिम लोदी को पुनः हराया।
  • गागरोन का युद्ध (1519 ई.): मालवा के महमूद खिलजी-II को हराया।
  • बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527): बाबर की सेना को बुरी तरह पराजित किया।
(B) खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई.):
  • पक्ष: महाराणा सांगा बनाम बाबर।
  • महत्व: यह भारतीय इतिहास का निर्णायक युद्ध था। बाबर ने इसमें 'तुलुगमा पद्धति' और तोपखाने का प्रयोग किया।
  • परिणाम: बाबर की विजय हुई। सांगा घायल हुए (घायल अवस्था में बसवा, दौसा ले जाया गया)।
  • मृत्यु: 30 जनवरी 1528 को कालपी (MP) में जहर देने से मृत्यु हुई। मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में इनकी छतरी स्थित है।

9. पन्नाधाय का बलिदान (1536 ई.)

सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में अस्थिरता आई। दासी पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी और उदय सिंह को मारना चाहता था।

  • बलिदान: पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन को उदय सिंह की जगह लिटाकर बलिदान दिया और मेवाड़ के भविष्य (उदय सिंह) को सुरक्षित कुम्भलगढ़ पहुँचाया।

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