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राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

1. प्राचीन गणतंत्रीय व्यवस्था (Ancient Republican System in Rajasthan)

राजस्थान में प्राचीन काल से ही गणतंत्रीय (Republican) शासन व्यवस्था के प्रमाण मिलते हैं। आर्यों के निवास से स्थायी बस्तियां बनीं, जिन्हें आगे चलकर जनपद कहा गया।

  • जानकारी के प्रमुख स्रोत: समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख) से राजस्थान के विभिन्न गणराज्यों की जानकारी मिलती है, जिनमें प्रमुख हैं:
    • मालव
    • यौधेय
    • अर्जुनायन
    • आभीर
  • गुप्तों का प्रभाव: गुप्त शासकों ने इन गणराज्यों को पराजित कर अपने अधीन कर लिया। हालाँकि, उन्होंने इनके आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप (Non-interference) की नीति अपनाई, जिसके कारण इनका प्राचीन गणतंत्रीय स्वरूप बना रहा।
  • पतन एवं समाप्ति: गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद, छठी शताब्दी में हूणों के लगातार आक्रमणों के कारण राजस्थान से प्राचीन गणतंत्रीय व्यवस्था हमेशा के लिए समाप्त हो गई।

2. पूर्व मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था (7वीं से 12वीं सदी)

इस काल में राजस्थान में राजतंत्रात्मक (Monarchical) शासन व्यवस्था का विस्तार हुआ। शासन की शक्तियां मुख्य रूप से राजा और उसके मंत्रिमंडल में निहित थीं।

(A) राजा (The King - Supreme Position)

  • स्थान और शक्तियां: राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था। वह निरंकुश (Autocratic) होता था।
  • प्रमुख उपाधियां: महाराजा, महाराजाधिराज, परमभट्टारक, प्रभु, वल्लभ, धर्मप्रतिपाल आदि।
    • प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम व द्वितीय ने 'नारायण' की उपाधि धारण की।
    • भोज प्रथम ने 'आदिवराह' की उपाधि ली।
    • गुहिल और चौहान शासकों को 'परमेश्वर' कहा गया।
  • दैवीय संकल्पना (Divine Right): राजा स्वयं को ईश्वर का अंश घोषित करते थे।
  • कर्तव्य: दुष्टों को दंड देना, धर्म की रक्षा करना, युद्ध में सेना का नेतृत्व करना, न्याय प्रदान करना और लोकहित के कार्य करना।
  • नियंत्रण: यद्यपि राजा निरंकुश था, फिर भी मंत्रिमंडल, स्थानीय शासन संस्थाएं, धर्म, और जनसमूह उसकी स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण रखते थे।
  • युवराज: राजा का उत्तराधिकारी और राज्य का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद।

(B) उच्चाधिकारी एवं मंत्रिमंडल (Council of Ministers)

राजा की सहायता के लिए एक मंत्रिमंडल होता था, जिसकी नियुक्ति राजा अपनी इच्छा से करता था। अधिकांश मंत्री पद वंशानुगत (Hereditary) होते थे। इनका कार्य केवल सलाह देना था और राजा इनकी सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं था।

मंत्री का पद प्रमुख कार्य / दायित्व
प्रधानमंत्री / महामंत्री सभी मंत्रियों में प्रमुख; राजा का मुख्य प्रतिनिधि।
सन्धिविग्रहिक विदेश मंत्री के समान; राजा के आदेश और विदेश संबंधी पत्र तैयार करना।
अक्षपटलिक आय-व्यय, भूमि अनुदान और भू-लेखों (Records) का विवरण रखना। (मेवाड़ के अल्लट के समय दो अक्षपटलिक थे)।
भाण्डारिक (भण्डारी) राजकोष (Treasury) और रसद की देख-रेख करना।
महाप्रतिहार राजदरबार की व्यवस्था संभालना।
महापुरोहित राजा के धार्मिक कार्यों का मुख्य पुरोहित।
भिषगाधिराज राजकीय चिकित्सक (Royal Physician)।

(C) प्रांतीय एवं स्थानीय प्रशासन (Provincial & Local Administration)

प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य को विभिन्न इकाइयों में बांटा गया था:

  • प्रांत (Province): इसका मुखिया 'भूचक्रवर्ती' कहलाता था, जो बड़े सामंतों की मदद से शासन चलाता था।
  • प्रशासनिक पदानुक्रम: प्रांत → मण्डल (प्रधान: मण्डलीक) → विषय (प्रशासक: विषयपति)।
  • नगर और गांव:
    • विषयों में पत्तन (बंदरगाह/नगर) और खेटक होते थे, जिनका प्रशासक 'तंत्रपाल' कहलाता था।
    • कस्बों व मंडियों का प्रशासन मण्डपिकाएँ चलाती थीं।
    • उद्योग-धंधों से जुड़े लोगों का संगठन 'श्रेणी' (Guild) कहलाता था।
    • ग्रामों के समूह का अधिकारी 'ग्रामपाल' कहलाता था।
    • अग्रहार: ब्राह्मणों को अनुदान (दान) में दिए गए कर-मुक्त गांव।
  • ग्राम प्रशासन: गांव का प्रशासन 'पंचकुल' नामक संस्था चलाती थी। इसमें गाँव के पांच वरिष्ठ नागरिक होते थे, जिनमें से 1-2 राज्य के प्रतिनिधि (कर्णिक/लिपिक) होते थे। यह स्थानीय विवादों का निपटारा करती थी।

3. राजस्व व्यवस्था (Revenue System)

राज्य की आय का सबसे बड़ा और मुख्य साधन भूमिकर था।

  • भूमिकर (उदंग): इसकी दर कुल उपज का 1/10 से 1/6 भाग तक होती थी।
  • भोग कर: यह राज्य की भूमि पर कृषि करने वाले किसानों से लिया जाता था और यह उदंग से अधिक होता था।
  • कर वसूलने के तरीके:
    • हिरण्यक: जब कर नकद (मुद्रा) के रूप में लिया जाता था।
    • उद्रंग व भोग: जब कर उपज (अनाज, सब्जी, फल, दूध आदि) के रूप में लिया जाता था।
  • व्यापारिक कर: आयात-निर्यात कर 'मण्डपियों' और चुंगीघरों द्वारा वसूला जाता था।
  • आभाव्य (अबवाब): अनेक अन्य छोटे करों को सामूहिक रूप से आभाव्य कहते थे।
    • कन्धक: कंधे पर ढोये जाने वाले माल पर।
    • बेणी: बाँस और चारे पर।
    • कोश्म: पिलाई पर।
    • खल-भिक्षा: सेवाओं के बदले।

4. सैन्य एवं न्याय व्यवस्था (Military & Judicial System)

(A) सैन्य व्यवस्था

राजतंत्रात्मक व्यवस्था का मुख्य आधार सेना थी। सेना के प्रमुख अधिकारियों को महादण्डनायक या दण्डपति कहा जाता था।

  • बलाधिकृत: कस्बों और नगर सेना का प्रमुख।
  • महश्वपति: घुड़सवार सेना (अश्वरोही) का प्रधान।
  • पीलूपति: गजसेना (हाथियों की सेना) का प्रधान।
  • पायकाधिपति: पैदल सेना (Infantry) का प्रधान।
  • स्कन्दपति: रथ सेना का प्रधान।
  • कोट्टपाल: किलेदार (किले की रक्षा करने वाला)।

आंतरिक शांति: राज्य के भीतर शांति और सुरक्षा के लिए पुलिस व गुप्तचर व्यवस्था थी। इसके प्रमुख अधिकारियों को दण्डपाशिक, आरक्षिक, दाण्डिक व तलार कहा जाता था।

(B) न्याय व्यवस्था

  • सर्वोच्च न्यायाधीश: राजा स्वयं सर्वोच्च न्यायाधीश होता था, जो पंडितों और न्याय-मर्मज्ञों की सहायता से न्याय करता था।
  • दण्ड: अपराधों के लिए सामान्यतः जुर्माना, कारावास (जेल) और अंग-विच्छेदन (अंग काटना) का दण्ड दिया जाता था।

5. आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था (Economic & Social System)

(A) आर्थिक व्यवस्था

  • आजीविका का आधार: अधिकांश जनता का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन था। कृषक वर्ग सहित सभी वर्गों की आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी।
  • व्यापार स्थानीय और विदेशी दोनों स्तरों पर होता था। वैश्य और क्षत्रिय मुख्य रूप से व्यापार-वाणिज्य में संलग्न थे।

(B) सामाजिक व्यवस्था

समाज चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में बंटा था, लेकिन यह विभाजन बहुत कठोर नहीं था।

  • ब्राह्मण: समाज में इनका सर्वोच्च स्थान था। पंचगौड़, पुष्करणा व श्रीमाली ब्राह्मण श्रेष्ठ माने जाते थे। भीनमाल के ब्राह्मण अपनी विद्या और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे।
  • क्षत्रिय (राजपूत): समाज में दूसरा स्थान। इस काल में इन्हें 'राजपूत' कहा जाने लगा। अनेक विदेशी जातियां भी समाज में घुल-मिलकर क्षत्रिय कहलाईं। इनका मुख्य कार्य देश की रक्षा और युद्ध करना था।
  • वैश्य: ये व्यापार-वाणिज्य और लेन-देन करते थे। कई वैश्य जातियों का उद्भव क्षत्रियों से हुआ (जैसे- अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल)। ये आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध थे।
  • शूद्र: ये दस्तकारी (कारीगरी) और खेती का काम करते थे (जैसे कुम्हार, नाई, लुहार, दर्जी आदि)। प्राचीन काल की तुलना में इस समय इनका सामाजिक स्तर थोड़ा ऊँचा उठा था।

(C) समाज के अन्य वर्ग एवं स्त्रियों की स्थिति

  • उत्यन्ज (अछूत): इनमें भील, डोम, मछुआरे, चाण्डाल और चमार शामिल थे। इनकी बस्ती सामान्यतः गांव से बाहर होती थी।
  • म्लेच्छ: कबर, भील, मीड़े, मेड़ और भारत में आने वाली सभी विदेशी जातियों को म्लेच्छ कहा जाता था।
  • स्त्रियों की स्थिति: समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी
    • पुत्री के जन्म को दुःख का कारण माना जाता था।
    • विधवाओं को समाज में हेय (हीन) दृष्टि से देखा जाता था।
    • सती प्रथा का व्यापक प्रचलन था।
    • शासक और समृद्ध वर्गों में बहुपत्नी प्रथा (Polygamy) का रिवाज था।

1. मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था: एक परिचय

मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन राजस्थान में रियासतों के उदय से लेकर 1818 ई. में अंग्रेजों के साथ हुई संधियों तक किया जाता है।

  • शासन का स्वरूप: राजस्थान में बड़ी रियासतें थीं जिन पर मुग़ल सूबा व्यवस्था का गहरा प्रभाव था (मुगलों ने राजस्थान को 17 सूबों में विभाजित किया था)।
  • प्रशासन के मूल स्तम्भ: यह व्यवस्था मुख्य रूप से तीन स्तम्भों पर टिकी थी:
    1. सामान्य एवं सैनिक प्रशासन
    2. न्याय प्रशासन
    3. भू-राजस्व प्रशासन
  • शासन का आधार: सम्पूर्ण शासन तंत्र राजा और सामंत वर्ग पर आधारित था।

2. राजा (शासक) और युवराज

(A) राजा (The King)

मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था का मुख्य केंद्र राजा स्वयं होता था, जिसमें समस्त प्रशासनिक, सैनिक व न्यायिक शक्तियां निहित होती थीं।

  • प्रमुख उपाधियां: महाराजाधिराज, परमभट्टारक, राज राजेश्वर, नृपेन्द्र आदि।
  • दैवीय संकल्पना: शासक स्वयं को ईश्वर का अंश या प्रतिनिधि मानते थे।
  • दीवान की प्रथा: कई शासक अपने आराध्य देव को राज्य का वास्तविक स्वामी मानते थे और स्वयं को उनका दीवान मानकर शासन करते थे।
    • मेवाड़ के शासक: एकलिंगजी के दीवान।
    • जयपुर के शासक: गोविन्द देवजी के दीवान।
  • प्रमुख कर्तव्य: धर्म की रक्षा करना, प्रजा का पालन करना, न्याय करना, दुष्टों को दंड देना, सैन्य संचालन करना और शासन के नियम-कायदे निर्धारित करना।
  • विशेषाधिकार: आखेट (शिकार) करना, दरबार लगाना, उत्सवों पर शाही सवारी निकालना, तुलादान करना, राजसूय यज्ञ करना, और अपराधियों को क्षमा दान देना।
  • नियंत्रण: राजा पूरी तरह से निरंकुश नहीं होता था। मंत्रिमंडल, स्थानीय शासन संस्थाएं, सामंत वर्ग, धर्म शास्त्रों की मर्यादाएं और जनसमूह उसकी शक्तियों को नियंत्रित करते थे।

(B) युवराज (The Crown Prince)

शासन व्यवस्था में राजा के बाद युवराज (महाराज कुमार) का स्थान सबसे महत्वपूर्ण होता था।

  • उत्तराधिकार की समस्या: बहुविवाह प्रथा के कारण राजा के कई पुत्र होते थे और उत्तराधिकार का कोई स्पष्ट नियम नहीं था, जिससे अक्सर भाइयों में संघर्ष होता था (जैसे महाराणा रायमल के पुत्रों पृथ्वीराज, जयमल और सांगा के बीच)।
  • उत्तराधिकार का चयन: सामान्यतः ज्येष्ठ (सबसे बड़े) पुत्र को ही शासक बनाया जाता था। परंतु, कभी-कभी राजा अपनी प्रिय रानी के प्रभाव में आकर ज्येष्ठ पुत्र के स्थान पर छोटे पुत्र को उत्तराधिकारी घोषित कर देता था (जैसे महाराणा उदयसिंह ने ज्येष्ठ पुत्र प्रताप की जगह जगमाल को उत्तराधिकारी बनाया था)।
  • सामंतों की भूमिका: यदि शासक का निर्णय अनुचित होता था, तो सामंत वर्ग उसका विरोध करता था (जैसे जगमाल के मामले में सामंतों ने विरोध कर महाराणा प्रताप को शासक बनाया)।
  • संन्यास की परंपरा: कभी-कभी शासक अपने जीवनकाल में ही सुयोग्य पुत्र को राज्य की बागडोर सौंपकर संन्यास ले लेते थे।
    • प्रतिहार शासक भोजदेव ने नागभट्ट को।
    • जैत्रसिंह ने हम्मीरदेव चौहान को।
    • अजयराज चौहान ने अर्णोराज को।

3. मंत्रिमंडल (Council of Ministers)

मुगलों के आगमन से पूर्व के ग्रंथों और शिलालेखों में राजा की सहायता के लिए एक मंत्रिमंडल का उल्लेख मिलता है।

  • नियुक्ति और कार्यकाल: मंत्रियों की नियुक्ति राजा अपनी स्वेच्छा से करता था। उनका वेतन और कार्यकाल पूरी तरह से राजा की इच्छा पर निर्भर करता था।
  • स्थिति: मंत्री केवल राजा के सलाहकार होते थे; राजा उनकी सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं था। सदस्यों का चयन उनके वंश, जाति और योग्यता के आधार पर होता था।

(A) पूर्व मध्यकाल के प्रमुख अधिकारी:

  • सन्धिविग्रहिक: विदेश मंत्री। यह सभी आदेशों और विदेश से संबंधित पत्रों को तैयार करता था और कई भाषाओं/लिपियों का ज्ञाता होता था।
  • अक्षपटलिक: यह राज्य की आय-व्यय का ब्यौरा और भूमि अनुदानों का लेखा-जोखा रखता था।
  • भाण्डारिक (भण्डारी): यह राजकोष का मुख्य अधिकारी था, जो खजाने और रसद का कार्य देखता था। बाद में यह पद वंशानुगत हो गया।
  • अन्य अधिकारी: महापुरोहित (धार्मिक कार्य), भिषगाधिराज (राज वैद्य), बंदीपति (कविता पाठ करने वाला), और नैमित्तिक (राजकीय ज्योतिषी)।

4. मध्यकाल के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी

(A) प्रधान / प्रधानमंत्री

यह मंत्रिमंडल का सबसे महत्वपूर्ण पद था और केंद्र में राजा के बाद सर्वोच्च अधिकारी होता था। इसे मुख्यमंत्री या 'मंत्री प्रवर' भी कहा जाता था।

  • कार्य: राजा का मुख्य सलाहकार होना और शासन संचालन, सैन्य तथा न्याय संबंधी कार्यों में राजा की सहायता करना।
  • विभिन्न राज्यों में स्थिति:
    • मारवाड़: महाराजा विजयसिंह के समय कुछ अंतराल को छोड़कर यह पद कूँपावतों के पास रहा। महाराजा मानसिंह के समय यह पोखरण के ठाकुर के पास था।
    • मेवाड़: यह पद सलूम्बर के रावत के पास वंशानुगत रूप से था और इसे 'भांजगढ़' कहा जाता था। (नोट: महाराणा प्रताप के समय प्रधानमंत्री भामाशाह थे)।
    • प्रतापगढ़: यह पद पड़लिया परिवार में वंशानुगत था।
  • अन्य राज्यों में पद का नाम:
    • जयपुर: मुसाहिब
    • कोटा व बूंदी: फौजदार दीवान
    • बीकानेर व भरतपुर: मुख्त्यार
    • मारवाड़, मेवाड़ व जैसलमेर: प्रधान

(B) दीवान

यह प्रशासनिक तंत्र का मुखिया होता था। जिन राज्यों में 'प्रधान' का पद नहीं था, वहां दीवान ही प्रधान का कार्य करता था।

  • मुख्य कार्य: वित्त और राजस्व संबंधी मामलों पर नियंत्रण रखना तथा राज्य की आमदनी बढ़ाकर खर्चों की पूर्ति करना।
  • अधीनस्थ कर्मचारी: रोकड़िया, मुंशी, पोतदार और कारखाने के दारोगा।
  • विशेषताएँ:
    • सभी महत्वपूर्ण पत्रों को शासक के समक्ष प्रस्तुत करना।
    • इसकी अपनी स्वतंत्र मुहर होती थी।
    • कर्मचारियों की पदोन्नति (Promotion) और स्थानान्तरण (Transfer) में इसकी सहमति आवश्यक थी।
    • इस पद पर सामान्यतः गैर-राजपूत जाति के योग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता था।
  • देश दीवान: जब दीवान राज्य प्रशासन की पूरी बागडोर संभाल लेता था, तो उसे 'देश दीवान' कहा जाता था।
  • प्रमुख कार्यालय:
    • दीवान-ए-हजूरी: यहाँ सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज सुरक्षित रखे जाते थे।
    • महकमा ए-बकायात: यह लगान दरें तय करने, बकाया वसूली करने और खजाने की जमा आदि के दिशा-निर्देश जारी करता था।

(C) बख्शी

प्रधान या दीवान के बाद यह दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पदाधिकारी होता था। यह सैन्य विभाग का अध्यक्ष (Commander of the Military Department) होता था।

  • कार्य: सेना का वेतन बांटना, रसद की व्यवस्था करना, सेना में अनुशासन बनाए रखना, प्रशिक्षण देना तथा घायल सैनिकों और पशुओं के उपचार व सुरक्षा का प्रबंध करना।
  • विशेषता: यह राजा का अत्यधिक विश्वासपात्र होता था और गुप्त मंत्रणाओं में भाग लेता था।
  • अधीनस्थ अधिकारी: खबरनवीस, नायब बख्शी, किलेदार, मुसरिफ, हवलदार और दारोगा-ए-तोपखाना।
  • विभिन्न राज्यों में नाम:
    • जयपुर: इसे बख्शीदेश, बख्शी परगना और बख्शी जागीर के रूप में बांटा गया था।
    • जोधपुर (मारवाड़): फौज बख्शी। (महाराजा बख्तसिंह के काल में 'प्यादबख्शी' नामक एक नया पद सृजित किया गया था)।

(D) खानसामां

यह दीवान के अधीन कार्य करता था और राजपरिवार के सर्वाधिक निकट व प्रभावशाली अधिकारियों में से एक था।

  • कार्य: राजकीय निर्माण कार्य, वस्तुओं का क्रय (खरीद), और राजकीय विभागों के सामानों की खरीद तथा संग्रह करना।
  • विभिन्न राज्यों में नाम:
    • उदयपुर: प्राचीन परंपरा के अनुसार इसे 'पाकाध्यक्ष' कहा जाता था।
    • जयपुर: खान सामान।

(E) शिकदार / कोतवाल

यह नगर प्रशासन का मुख्य अधिकारी होता था (परगने का मुख्य अधिकारी नहीं)। यह नगर कोतवाल के समकक्ष था।

  • मुख्य कार्य: नगर का प्रशासन संभालना, चोरी-डकैती का पता लगाना, बाजार में वस्तुओं के मूल्य निर्धारित करना, नाप-तौल पर नियंत्रण रखना, रात्रि गश्त (Night Patrol) लगाना और साधारण झगड़ों का निपटारा करना।
  • विभिन्न राज्यों में स्थिति:
    • जोधपुर (मारवाड़): नगर की सुरक्षा और शांति का दायित्व शिकदार का था, जो बाद में मुगल प्रभाव के कारण 'कोतवाल' कहलाने लगा।
    • मेवाड़: यहाँ शिकदार शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है; नगर प्रशासन का अधिकारी प्रारंभ से ही 'कोतवाल' होता था।

1. मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था: एक परिचय

मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन राजस्थान में रियासतों के उदय से लेकर 1818 ई. में अंग्रेजों के साथ हुई संधियों तक किया जाता है।

  • शासन का स्वरूप: राजस्थान में बड़ी रियासतें थीं जिन पर मुग़ल सूबा व्यवस्था का गहरा प्रभाव था (मुगलों ने राजस्थान को 17 सूबों में विभाजित किया था)।
  • प्रशासन के मूल स्तम्भ: यह व्यवस्था मुख्य रूप से तीन स्तम्भों पर टिकी थी:
    1. सामान्य एवं सैनिक प्रशासन
    2. न्याय प्रशासन
    3. भू-राजस्व प्रशासन
  • शासन का आधार: सम्पूर्ण शासन तंत्र राजा और सामंत वर्ग पर आधारित था।

2. राजा (शासक) और युवराज

(A) राजा (The King)

मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था का मुख्य केंद्र राजा स्वयं होता था, जिसमें समस्त प्रशासनिक, सैनिक व न्यायिक शक्तियां निहित होती थीं।

  • प्रमुख उपाधियां: महाराजाधिराज, परमभट्टारक, राज राजेश्वर, नृपेन्द्र आदि।
  • दैवीय संकल्पना: शासक स्वयं को ईश्वर का अंश या प्रतिनिधि मानते थे।
  • दीवान की प्रथा: कई शासक अपने आराध्य देव को राज्य का वास्तविक स्वामी मानते थे और स्वयं को उनका दीवान मानकर शासन करते थे।
    • मेवाड़ के शासक: एकलिंगजी के दीवान।
    • जयपुर के शासक: गोविन्द देवजी के दीवान।
  • प्रमुख कर्तव्य: धर्म की रक्षा करना, प्रजा का पालन करना, न्याय करना, दुष्टों को दंड देना, सैन्य संचालन करना और शासन के नियम-कायदे निर्धारित करना।
  • विशेषाधिकार: आखेट (शिकार) करना, दरबार लगाना, उत्सवों पर शाही सवारी निकालना, तुलादान करना, राजसूय यज्ञ करना, और अपराधियों को क्षमा दान देना।
  • नियंत्रण: राजा पूरी तरह से निरंकुश नहीं होता था। मंत्रिमंडल, स्थानीय शासन संस्थाएं, सामंत वर्ग, धर्म शास्त्रों की मर्यादाएं और जनसमूह उसकी शक्तियों को नियंत्रित करते थे।

(B) युवराज (The Crown Prince)

शासन व्यवस्था में राजा के बाद युवराज (महाराज कुमार) का स्थान सबसे महत्वपूर्ण होता था।

  • उत्तराधिकार की समस्या: बहुविवाह प्रथा के कारण राजा के कई पुत्र होते थे और उत्तराधिकार का कोई स्पष्ट नियम नहीं था, जिससे अक्सर भाइयों में संघर्ष होता था (जैसे महाराणा रायमल के पुत्रों पृथ्वीराज, जयमल और सांगा के बीच)।
  • उत्तराधिकार का चयन: सामान्यतः ज्येष्ठ (सबसे बड़े) पुत्र को ही शासक बनाया जाता था। परंतु, कभी-कभी राजा अपनी प्रिय रानी के प्रभाव में आकर ज्येष्ठ पुत्र के स्थान पर छोटे पुत्र को उत्तराधिकारी घोषित कर देता था (जैसे महाराणा उदयसिंह ने ज्येष्ठ पुत्र प्रताप की जगह जगमाल को उत्तराधिकारी बनाया था)।
  • सामंतों की भूमिका: यदि शासक का निर्णय अनुचित होता था, तो सामंत वर्ग उसका विरोध करता था (जैसे जगमाल के मामले में सामंतों ने विरोध कर महाराणा प्रताप को शासक बनाया)।
  • संन्यास की परंपरा: कभी-कभी शासक अपने जीवनकाल में ही सुयोग्य पुत्र को राज्य की बागडोर सौंपकर संन्यास ले लेते थे।
    • प्रतिहार शासक भोजदेव ने नागभट्ट को।
    • जैत्रसिंह ने हम्मीरदेव चौहान को।
    • अजयराज चौहान ने अर्णोराज को।

3. मंत्रिमंडल (Council of Ministers)

मुगलों के आगमन से पूर्व के ग्रंथों और शिलालेखों में राजा की सहायता के लिए एक मंत्रिमंडल का उल्लेख मिलता है।

  • नियुक्ति और कार्यकाल: मंत्रियों की नियुक्ति राजा अपनी स्वेच्छा से करता था। उनका वेतन और कार्यकाल पूरी तरह से राजा की इच्छा पर निर्भर करता था।
  • स्थिति: मंत्री केवल राजा के सलाहकार होते थे; राजा उनकी सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं था। सदस्यों का चयन उनके वंश, जाति और योग्यता के आधार पर होता था।

(A) पूर्व मध्यकाल के प्रमुख अधिकारी:

  • सन्धिविग्रहिक: विदेश मंत्री। यह सभी आदेशों और विदेश से संबंधित पत्रों को तैयार करता था और कई भाषाओं/लिपियों का ज्ञाता होता था।
  • अक्षपटलिक: यह राज्य की आय-व्यय का ब्यौरा और भूमि अनुदानों का लेखा-जोखा रखता था।
  • भाण्डारिक (भण्डारी): यह राजकोष का मुख्य अधिकारी था, जो खजाने और रसद का कार्य देखता था। बाद में यह पद वंशानुगत हो गया।
  • अन्य अधिकारी: महापुरोहित (धार्मिक कार्य), भिषगाधिराज (राज वैद्य), बंदीपति (कविता पाठ करने वाला), और नैमित्तिक (राजकीय ज्योतिषी)।

4. मध्यकाल के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी

(A) प्रधान / प्रधानमंत्री

यह मंत्रिमंडल का सबसे महत्वपूर्ण पद था और केंद्र में राजा के बाद सर्वोच्च अधिकारी होता था। इसे मुख्यमंत्री या 'मंत्री प्रवर' भी कहा जाता था।

  • कार्य: राजा का मुख्य सलाहकार होना और शासन संचालन, सैन्य तथा न्याय संबंधी कार्यों में राजा की सहायता करना।
  • विभिन्न राज्यों में स्थिति:
    • मारवाड़: महाराजा विजयसिंह के समय कुछ अंतराल को छोड़कर यह पद कूँपावतों के पास रहा। महाराजा मानसिंह के समय यह पोखरण के ठाकुर के पास था।
    • मेवाड़: यह पद सलूम्बर के रावत के पास वंशानुगत रूप से था और इसे 'भांजगढ़' कहा जाता था। (नोट: महाराणा प्रताप के समय प्रधानमंत्री भामाशाह थे)।
    • प्रतापगढ़: यह पद पड़लिया परिवार में वंशानुगत था।
  • अन्य राज्यों में पद का नाम:
    • जयपुर: मुसाहिब
    • कोटा व बूंदी: फौजदार दीवान
    • बीकानेर व भरतपुर: मुख्त्यार
    • मारवाड़, मेवाड़ व जैसलमेर: प्रधान

(B) दीवान

यह प्रशासनिक तंत्र का मुखिया होता था। जिन राज्यों में 'प्रधान' का पद नहीं था, वहां दीवान ही प्रधान का कार्य करता था।

  • मुख्य कार्य: वित्त और राजस्व संबंधी मामलों पर नियंत्रण रखना तथा राज्य की आमदनी बढ़ाकर खर्चों की पूर्ति करना।
  • अधीनस्थ कर्मचारी: रोकड़िया, मुंशी, पोतदार और कारखाने के दारोगा।
  • विशेषताएँ:
    • सभी महत्वपूर्ण पत्रों को शासक के समक्ष प्रस्तुत करना।
    • इसकी अपनी स्वतंत्र मुहर होती थी।
    • कर्मचारियों की पदोन्नति (Promotion) और स्थानान्तरण (Transfer) में इसकी सहमति आवश्यक थी।
    • इस पद पर सामान्यतः गैर-राजपूत जाति के योग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता था।
  • देश दीवान: जब दीवान राज्य प्रशासन की पूरी बागडोर संभाल लेता था, तो उसे 'देश दीवान' कहा जाता था।
  • प्रमुख कार्यालय:
    • दीवान-ए-हजूरी: यहाँ सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज सुरक्षित रखे जाते थे।
    • महकमा ए-बकायात: यह लगान दरें तय करने, बकाया वसूली करने और खजाने की जमा आदि के दिशा-निर्देश जारी करता था।

(C) बख्शी

प्रधान या दीवान के बाद यह दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पदाधिकारी होता था। यह सैन्य विभाग का अध्यक्ष (Commander of the Military Department) होता था।

  • कार्य: सेना का वेतन बांटना, रसद की व्यवस्था करना, सेना में अनुशासन बनाए रखना, प्रशिक्षण देना तथा घायल सैनिकों और पशुओं के उपचार व सुरक्षा का प्रबंध करना।
  • विशेषता: यह राजा का अत्यधिक विश्वासपात्र होता था और गुप्त मंत्रणाओं में भाग लेता था।
  • अधीनस्थ अधिकारी: खबरनवीस, नायब बख्शी, किलेदार, मुसरिफ, हवलदार और दारोगा-ए-तोपखाना।
  • विभिन्न राज्यों में नाम:
    • जयपुर: इसे बख्शीदेश, बख्शी परगना और बख्शी जागीर के रूप में बांटा गया था।
    • जोधपुर (मारवाड़): फौज बख्शी। (महाराजा बख्तसिंह के काल में 'प्यादबख्शी' नामक एक नया पद सृजित किया गया था)।

(D) खानसामां

यह दीवान के अधीन कार्य करता था और राजपरिवार के सर्वाधिक निकट व प्रभावशाली अधिकारियों में से एक था।

  • कार्य: राजकीय निर्माण कार्य, वस्तुओं का क्रय (खरीद), और राजकीय विभागों के सामानों की खरीद तथा संग्रह करना।
  • विभिन्न राज्यों में नाम:
    • उदयपुर: प्राचीन परंपरा के अनुसार इसे 'पाकाध्यक्ष' कहा जाता था।
    • जयपुर: खान सामान।

(E) शिकदार / कोतवाल

यह नगर प्रशासन का मुख्य अधिकारी होता था (परगने का मुख्य अधिकारी नहीं)। यह नगर कोतवाल के समकक्ष था।

  • मुख्य कार्य: नगर का प्रशासन संभालना, चोरी-डकैती का पता लगाना, बाजार में वस्तुओं के मूल्य निर्धारित करना, नाप-तौल पर नियंत्रण रखना, रात्रि गश्त (Night Patrol) लगाना और साधारण झगड़ों का निपटारा करना।
  • विभिन्न राज्यों में स्थिति:
    • जोधपुर (मारवाड़): नगर की सुरक्षा और शांति का दायित्व शिकदार का था, जो बाद में मुगल प्रभाव के कारण 'कोतवाल' कहलाने लगा।
    • मेवाड़: यहाँ शिकदार शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है; नगर प्रशासन का अधिकारी प्रारंभ से ही 'कोतवाल' होता था।

(F) अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी

अधिकारी का पद प्रमुख कार्य / विशेषता
वकील (Vakil) मुगलों के शाही दरबार में राज्य का प्रतिनिधि। मुगल दरबार की सूचनाएं भेजना और पड़ोसी राज्यों से कूटनीतिक संबंध बनाना।
मीर मुंशी मारवाड़ में कूटनीतिक पत्र-व्यवहार करने वाला अधिकारी। महाराजा मानसिंह के समय यह केवल फारसी में पत्र-व्यवहार करता था और ब्रिटिश एजेंटों की तरह प्रतिनिधित्व करता था।
खजांची राजकीय कोष (खजाने) का हिसाब-किताब रखने वाला अधिकारी। (मेवाड़ में प्रारंभ में 'कोषपति')।
किलेदार किले की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी अधिकारी, जो अपने पास पर्याप्त सैनिक रखता था।
ड्योढ़ीदार महल की सुरक्षा, देखरेख, और निरीक्षण का दायित्व। शासक से मिलने आने वालों पर नज़र रखना।
पुरोहित राज्य के धार्मिक कार्यों, उत्सवों, त्योहारों और पर्वों को संपन्न करवाना। कभी-कभी पड़ोसी राज्यों में महत्वपूर्ण संदेश देना। (मारवाड़ में पुरोहित के अलावा राजव्यास और बारहठ का भी महत्व था)।

5. धर्मार्थ विभाग एवं अन्य छोटे विभाग

(A) धर्मार्थ विभाग (महकमा अण्यार्थ)

इसका कार्य मंदिरों, गरीबों, अनाथों, विधवाओं और निःसहायों आदि को राजकीय अनुदान देना था।

  • उदयपुर: दानाध्यक्ष
  • कोटा: हाकिम पुण्य
  • जयपुर: हाकिम खैरात

(B) अन्य छोटे-मोटे विभाग व उनके अधिकारी

  • हाकिया-ए-नवीस: सूचना भेजने वाला अधिकारी।
  • दरोगा-ए-डाक चौकी: डाक व्यवस्था का प्रबंधक।
  • दरोगा-ए-सायर: चुंगी (टैक्स) वसूली करने वाला।
  • दरोगा-ए-फराशखाना: सामान विभाग का प्रमुख।
  • मुशरिफ: वित्त विभाग का सचिव।
  • दरोगा-ए-नक्कारखाना: बाजे और नंगाड़ों के विभाग का अधिकारी।
  • महाप्रतिहार: राजदरबार में अनुशासन बनाए रखने वाला अधिकारी।
  • अन्य: दरोगा-ए-जवाहरखाना, दरोगा-ए-आबदार, दरोगा-ए-शिकारखाना आदि।

6. राजकीय आदेश एवं पत्र-व्यवहार

मध्यकालीन प्रशासन में विभिन्न प्रकार के राजकीय आदेशों और पत्र-व्यवहार के लिए विशिष्ट शब्दावली का प्रयोग होता था:

शब्दावली विवरण
फरमान मुगल बादशाह द्वारा जारी किया गया आदेश।
परवाना राजा द्वारा अपने अधीनस्थ को जारी किया गया आदेश।
हस्बुल हुक्म मुगल सम्राट के आदेश पर राजपूताना में शाही पदाधिकारियों द्वारा जारी किए गए कागजात।
अर्जदाश्त राजपूत शासकों द्वारा बादशाह या शहजादों को भेजा जाने वाला लिखित प्रार्थना-पत्र।
मन्सूर बादशाह की मौजूदगी में शहजादे द्वारा जारी किया गया आदेश।
रूक्का राज्य के अधिकारियों के मध्य होने वाला पत्र-व्यवहार।
खरीता एक राजा का दूसरे राजा के साथ किया जाने वाला पत्र-व्यवहार।
निशान शाही परिवार के किसी सदस्य द्वारा मनसबदार को अपनी मुहर के साथ जारी किया गया आदेश।
सनद मुगल बादशाह द्वारा अपने अधीनस्थ को जागीर प्रदान करने की लिखित स्वीकृति।

7. प्रांतीय एवं ग्राम प्रशासन

(A) प्रांतीय शासन

पूर्व मध्यकाल में राज्य ग्राम, मण्डल और दुर्ग जैसी इकाइयों में बंटा था, जिनके अधिकारी क्रमशः ग्रामीक, मण्डलपति और दुर्गाधिपति होते थे। मुगल प्रभाव के कारण इन इकाइयों को परगना कहा जाने लगा। मारवाड़ में भाटी गोविन्ददास ने मुगल पद्धति के अनुसार 'शिक' और 'परगना' व्यवस्था लागू की।

परगना अधिकारी (मुख्य अधिकारी):

  • मेवाड़, मारवाड़ व बीकानेर: हाकिम (सीधे महाराजा द्वारा नियुक्त; शासकीय और न्याय संबंधी कार्यों का सर्वोच्च अधिकारी)।
  • जयपुर: फौजदार।
  • कोटा: हवालगिर।

फौजदार:

यह परगने का दूसरा उच्च अधिकारी और पुलिस व सेना का अध्यक्ष होता था।

  • कार्य: परगने की सुरक्षा, और राजस्व वसूली में हाकिम, अमलगुजार, अमीन तथा आमिल की सहायता करना।
  • विशेष: बड़ा अपराध होने पर फौजदार या ठाकुर स्वयं डाकुओं के विरुद्ध अभियान पर जाते थे (मारवाड़ में इसे 'बाहर चढ़ना' कहते थे)।
  • अधीनस्थ: थानेदार (चोर-डाकुओं का पता लगाने वाले)।

हाकिम के सहायक: खजान्ची, शिकदार, कानूनगो, शहना, सायर दरोगा आदि (ये वैतनिक होते थे या फसली अनाज के बदले सेवा देते थे)।

(B) ग्राम प्रशासन

राज्य की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई गांव (मौजा) थी।

  • मौजे के प्रकार: असली (पुराने बसे गांव) और दाखिली (नए बसे गांव)।
  • ग्राम मुखिया: पूर्व मध्यकाल में ग्रामिक, जो बाद में पटवारी कहलाया।
  • पटवारी के सहयोगी: कनवारिया (खेत रक्षक), तफेदार (राज्य के भाग का लेखा-जोखा रखने वाला), तोलावाटी (उपज तौलने वाला), शहना (राज्य का भाग निश्चित करने वाला प्रबंधक), चौकीदार (मीणा व बावरी)।
  • स्थायी स्थानीय अधिकारी: चौधरी या पटेल (प्रशासन और जनता के बीच की कड़ी; कर्तव्य- शांति स्थापित करना और कर वसूली में सहयोग देना)।
  • ग्राम पंचायतें: मराठा आक्रमणों के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था बिगड़ने पर ग्राम पंचायतों का महत्व बढ़ा। ये न्याय, झगड़ों का निपटारा, और धार्मिक व सामाजिक कार्य करती थीं।
  • जाति पंचायत: जाति से संबंधित समस्याओं, विवाह संबंधी झगड़ों, और जाति के सदस्यों के अनुचित व्यवहार की जांच व दंड का कार्य करती थीं।
  • स्वशासन: ग्राम पंचायतों और जाति पंचायतों के निर्णयों को राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त थी, और गांव काफी हद तक स्वशासित थे।

8. सामंती व्यवस्था (Feudal System)

(A) उदय और स्वरूप

  • उदय काल: सामंती व्यवस्था के उदय काल को लेकर विभिन्न मत हैं (जैसे छठी सदी, गुप्तकाल के बाद, 4वीं सदी में प्रारंभ और 11वीं-12वीं में विकसित)। अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि यह गुप्तकाल में प्रारंभ हुई और राजपूतों के शासन के साथ इसका स्वरूप विकसित हुआ।
  • स्वरूप: यह एक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था थी। डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, इसमें एक राजा होता था और उसी के वंशज या सहयोगी उसके साथी बने रहते थे।
  • आधार: यह व्यवस्था शासक के वंश और रक्त संबंधों (Blood Relations) पर आधारित थी। सामंत राज्य की रीढ़ की हड्डी माने जाते थे।
  • उत्तराधिकार और जागीर: बड़ा भाई राजा बनता था, और छोटे भाइयों को जीवन-यापन के लिए वंशानुगत जागीर दी जाती थी। जागीर का मालिक 'सामंत' कहलाता था। (शर्त: शासक की आज्ञा की अवहेलना करने पर जागीर छीनी जा सकती थी)।
  • राजा-सामंत संबंध: सामंतों की दृष्टि में शासक कुल का प्रधान (मुखिया) होता था, और वे उसके सहयोगी (भाई-बंधु) होते थे, न कि उसके अधीन सेवक। राजा सामंतों को 'भाईजी' या 'काकाजी' और सामंत राजा को 'बापजी' कहकर संबोधित करते थे।
  • यूरोपीय व्यवस्था से तुलना: कर्नल जेम्स टॉड ने इसकी तुलना यूरोपीय सामंती प्रणाली से की, लेकिन दोनों में अंतर था। यूरोपीय व्यवस्था में संबंध स्वामी और सेवक के थे, जबकि राजस्थान में यह भाई-बंधु (सहयोगी) के थे। राजस्थान का किसान जमीन का स्वामी था, यूरोप का किसान राजा का दास (सर्फ)।
  • मुगल प्रभाव के बाद परिवर्तन: मुगल प्रभाव के बाद राजा-सामंत संबंध भाई-बंधु के न रहकर स्वामी और सेवक जैसे होने लगे।

(B) सामंतों के विशेषाधिकार एवं कर्तव्य

  • दायित्व: कर वसूलना, अपनी जागीर में न्याय करना, और शांति व्यवस्था बनाए रखना।
  • दरबार में उपस्थिति: राजा के जन्मदिवस, होली, दीपावली, दशहरा आदि पर आयोजित दरबार में उपस्थित होना अनिवार्य था।
  • नियुक्ति: शासन के महत्वपूर्ण पदों पर सामान्यतः सामंतों की ही नियुक्ति की जाती थी।
  • प्रतिबंधित अधिकार: सामंतों को मृत्युदंड देने, सिक्के ढालने, अपराधी का अंग-भंग करने, और किसी अन्य राज्य से युद्ध या संधि करने का अधिकार नहीं था।
  • ताजीम (सम्मान): सामंत के दरबार में आने पर शासक खड़े होकर उसका अभिवादन करता था।
    • इकहरी ताजीम: राजा केवल सामंत के आने पर खड़ा होता था।
    • दोहरी ताजीम: सामंत के आने और जाने, दोनों समय राजा खड़े होकर अभिवादन करता था।
  • बाँह पसाव और हाथ का करब: ये ताजीम के विशेष रूप थे, जो दाम देकर नहीं बल्कि प्राणों के बलिदान जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं के बदले मिलते थे।
    • बाँह पसाव: जब सामंत महाराजा के समक्ष अचकन के पल्ले को छूता था, तब महाराजा उसके कंधे पर हाथ रखता था।
    • हाथ का करब: महाराजा सामंत के कंधे पर हाथ लगाकर अपने हाथ को अपनी छाती तक ले जाता था।
  • सैनिक सहायता: आवश्यकता पड़ने पर सामंत राज्य को सैनिक सहायता देते थे। यह युद्धकालीन और शांतिकालीन, दो प्रकार की होती थी।
  • सैनिक सेवा का निर्धारण (रेख के आधार पर):
    • मारवाड़: 1000 रुपये की रेख (वार्षिक आय) पर 1 घुड़सवार, 750 रुपये पर 1 शूतरसवार (ऊंट सवार), 500 रुपये पर 1 पैदल सिपाही।
    • जयपुर: 1000 की आय पर 1 सवार व 1 पैदल सैनिक, 500 की आय पर 1 सवार।
    • मेवाड़: 1000 की आय पर 2 घुड़सवार और 4 पैदल सैनिकों की तीन महीने के लिए सेवा।
    • जैसलमेर: कम आय के कारण जागीरदारों को सैनिक नहीं देने पड़ते थे; यदि सेवा ली जाती थी तो राज्य सैनिकों को वेतन देता था।

(C) रेख, शुल्क और कर

  • रेख (सामंतों की वार्षिक उपज का अनुमान):
    • पट्टा रेख: राजा द्वारा दी गई जागीर के पट्टे में उल्लेखित अनुमानित वार्षिक आय। (शुरुआत: महाराजा सूरसिंह के समय, 1595-1616 ई.)।
    • भरतु रेख: वह वास्तविक रकम जो जागीरदार पट्टा रेख के आधार पर राज्य के खजाने में जमा करवाता था (यह सदैव पट्टा रेख से कम या बराबर होती थी)।
  • तागीरात: मारवाड़ के शासक अजीतसिंह के समय सामंतों से लिया जाने वाला कर।
  • उत्तराधिकार शुल्क: सामंत की मृत्यु पर राज्य जागीर को अस्थायी रूप से जब्त कर लेता था। नए उत्तराधिकारी से शुल्क वसूलने के बाद नया पट्टा जारी किया जाता था।
    • मारवाड़: पहले पेशकशी, महाराजा अजीतसिंह के समय से हुकूमनामा। (सर्वप्रथम मोटा राजा उदयसिंह ने पेशकशी प्रचलित किया)।
    • मेवाड़: खालसा और तलवार बँधाई
    • जयपुर: नजराना (राज्याभिषेक, त्योहार, या राजा के बड़े पुत्र की पहली शादी पर)।
  • अन्य कर:
    • न्योतकर: राजकुमारी की शादी के समय लिया जाने वाला कर।
    • गनीम बराड़: युद्ध के समय लिया जाने वाला कर।
  • अपवाद: जैसलमेर एकमात्र रियासत थी जहाँ सामंतों से उत्तराधिकार शुल्क नहीं लिया जाता था।

(D) सामंतों की श्रेणियाँ (विशेषकर मारवाड़ राज्य में)

मारवाड़ राज्य में सामंतों को पद, प्रतिष्ठा, दरबार में सम्मान और बैठने की स्थिति के आधार पर चार मुख्य श्रेणियों में बांटा गया था:

  1. राजवी: राजा के छोटे भाई और निकट संबंधी। इन्हें जीवन-यापन के लिए जागीर दी जाती थी और ये तीन पीढ़ी तक रेख, चाकरी और हुकुमनामा आदि से मुक्त रहते थे।
  2. सरदार: इनकी कई उपश्रेणियाँ थीं (जैसे इकहरी ताजीम, दोहरी ताजीम, बाँह पसाव आदि)।
    • सिरायत: प्रथम श्रेणी के सरदार (प्रारंभ में 8, बाद में 12)। दरबार में इनका स्थान राजा के पास सबसे आगे होता था।
    • मिसलें: दरबार में बैठने की पंक्तियाँ - दायीं मिसल (रणमल के वंशज) और बायीं मिसल (जोधा के वंशज)।
    • बैठने का अधिकार: दायीं पंक्ति में सबसे पहले आऊवा के चम्पावत ठाकुर को, बायीं पंक्ति में रीया के मेड़तिया ठाकुर को बैठने का अधिकार था।
    • सम्मान: सिरायत सरदारों को दोहरी ताजीम प्राप्त थी।
  3. गनायत: वे सामंत जिन्हें राज परिवार से वैवाहिक संबंधों के कारण जागीर मिली या जो राठौड़ राज्य स्थापित होने से पहले क्षेत्र के स्वामी थे और बाद में अधीनता स्वीकार की।
  4. मुत्सद्दी: राज्य प्रशासन में कार्य करने के बदले में जागीर प्राप्त करने वाले (जागीर केवल सेवाकाल तक ही रहती थी)।

विशेष अधिकार:

  • राजतिलक का अधिकार: मारवाड़ में बगड़ी के जैतावत ठाकुर को (तलवार से अंगूठा चीरकर रक्त से टीका करना)।
  • वंशावली उद्घोषणा: मारवाड़ में मुंदियाड़ के बारहठ ठाकुर को वंशावली की उद्घोषणा का अधिकार था।

1. राजस्थान के विभिन्न राज्यों में सामंतों की श्रेणियाँ

(A) मेवाड़ राज्य में सामंतों की श्रेणियाँ

महाराणा अमरसिंह द्वितीय ने मेवाड़ के सामंतों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था: सोलह, बत्तीस और गोल के सरदार। इस व्यवस्था को 'अमरशाही रेख' कहा जाता था।

  • उमराव (प्रथम श्रेणी के सरदार / सोलह):
    • महाराणा अमरसिंह द्वितीय ने इनकी संख्या 16 निश्चित की थी (जो बाद में बढ़कर 24 हो गई, लेकिन बैठने की संख्या 16 ही रही)।
    • शिष्टाचार: ये अपने से नीची बैठक वाले को अपने से ऊपर बैठते हुए देखना सहन नहीं करते थे।
    • सम्मान: इन्हें ताजीम, बाँह पसाव तथा हाथ का कुरब आदि सम्मान प्राप्त था।
    • बैठक: महाराणा के दाहिने हाथ की बैठक को 'बड़ी ओल' और बायीं तरफ की बैठक को 'कुँवरों की ओल' कहते थे।
  • सलूम्बर के ठाकुर के विशेषाधिकार:
    • यह मेवाड़ के प्रथम श्रेणी के ठिकानों में प्रमुख था।
    • इन्हें राज्य का 'प्रधान' पद वंशानुगत प्राप्त था।
    • महाराणा द्वारा दी गई जागीर के पट्टे पर सलूम्बर ठाकुर की मुहर लगती थी; महाराणा की मृत्यु पर वे स्वयं मातमपुर्सी के लिए सलूम्बर जाते थे।
    • अन्य अधिकार: महाराणा की अनुपस्थिति में प्रशासन चलाना, नए महाराणा की कमर में तलवार बाँधना और युद्ध के समय 'हरावल' (सेना का अग्रिम भाग) में रहने का विशेषाधिकार।
  • शोक निवारण: नए महाराणा के गद्दी पर बैठने पर उनके 'शोक निवारण' की रस्म बेदला के राव द्वारा सम्पन्न की जाती थी। (अपवाद: बेदला का राव और उत्तराधिकारी राजकुमार अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होते थे)।
  • कर व्यवस्था (छटून्द और तलवार बँधाई):
    • छटून्द: सामंत अपनी जागीर की वार्षिक आय का छठा हिस्सा (1/6 भाग) राज्य को देता था।
    • छूट: आमेट, भीण्डर, गोगुन्दा, देवगढ़, बनेड़ा व शाहपुरा के सामन्त 'तलवार बँधाई' कर से मुक्त थे।

(B) बीकानेर राज्य में सामंतों की श्रेणियाँ

  • पट्टा प्रणाली: महाराजा रायसिंह ने सामंतों की सेवाओं और अधिकारों को निश्चित कर उन्हें नियंत्रित करने के लिए 'पट्टा प्रणाली' आरम्भ की थी।
  • तीन मुख्य श्रेणियाँ:
    1. राव बीका के वंशज।
    2. बीका के भाई व चाचा के वंशज।
    3. स्थानीय व परदेशी (बाहरी) अधीनस्थ सामन्त।
  • प्रथम व द्वितीय श्रेणी के सामंत 'आसामीदार/चाकर/पट्टायत' कहलाते थे और इन्हें जागीरें वंशानुगत प्राप्त होती थीं।
  • तृतीय श्रेणी में वे सामंत थे जो बीकानेर राज्य की स्थापना से पूर्व विद्यमान थे (राठौड़ों की अधीनता स्वीकार की)। परदेशी ठाकुरों में भाटी व साँखला प्रमुख थे।

(C) जयपुर राज्य में सामंतों की श्रेणियाँ

  • बारह कोटड़ी: कछवाहा शासक पृथ्वीराज के 17 पुत्रों में से 12 पुत्रों के नाम से स्थायी जागीरें चलीं, जो 'बारह कोटड़ी' कहलाईं (जैसे- नाथावत, खंगारोत, सुल्तानोत आदि)।
  • कोटड़ी: जयपुर राज्य के राजपूत अपने निवास स्थान को महल या हवेली के स्थान पर 'कोटड़ी' कहलाने को सम्मानसूचक मानते थे।
  • राजावत: राजावतों का सबसे अधिक महत्व था, जिनका जयपुर महाराजा से निकट का सम्बन्ध था।
  • दो मुख्य श्रेणियाँ:
    1. ताजीमी सरदार: महाराजा को नजर भेंट करने पर महाराजा स्वयं खड़े होकर उसे स्वीकार करते थे। इन्हें पैरों में सोना पहनने का अधिकार था। (खास रूक्का भेजकर बुलाना और सिरोपाव देकर विदा करना)।
    2. खास चौकी।

(D) कोटा और जैसलमेर राज्य में सामंतों की श्रेणियाँ

  • कोटा: दो श्रेणियाँ थीं - देशथी (राज्य में रहकर सेवा करने वाले) और हजूरथी (मुगल सेवा में रहने वाले)। 36 ताजीमी सरदार थे, जिनमें 8 हाड़ा राजपूतों की जागीरें 'कोटड़ी या कोटड़ियात' कहलाती थीं।
  • जैसलमेर: महारावल हरराय के समय मिसलें बनीं - डाबी (बायीं) मिसल और जीवणी (दायीं) मिसल। यहाँ सामंतों से मृत्यु पर उत्तराधिकार शुल्क (कमर बँधाई) नहीं लिया जाता था, बल्कि नए उत्तराधिकारी को राजा की ओर से 'सिरोपाव' दिया जाता था।

2. अन्य सामंत श्रेणियाँ एवं सिरोपाव (सम्मान)

(A) अन्य सामंत श्रेणियाँ

  • भोमिया जागीरदार (भोमिया ग्रामत): सीमांत क्षेत्र या गाँव की सुरक्षा हेतु बलिदान के बदले दी गई भूमि। यह वंशानुगत होती थी और हासल व लाग (करों) से मुक्त होती थी। इन्हें केवल नाममात्र का 'भोमबराड़' राज्य को देना पड़ता था।
  • ग्रासिया सामंत: निश्चित सैनिक सेवा के बदले पट्टे या सनद से दी गई भूमि। इस भूमि को 'जूनी जागीर' भी कहते थे।

(B) सिरोपाव (Siropav)

परिभाषा: राजस्थान की रियासतों में कवियों, सेनापतियों, सामंतों व श्रेष्ठ व्यक्तियों को राजा और राज दरबार की तरफ से दिया जाने वाला सम्मान/पुरस्कार।

  • पुरस्कार: विशेष वस्त्र, आभूषण व नकद रुपये।
  • प्रकार: हाथी, घोड़ा, पालकी, सादा, कण्ठी, कड़ा व दुसाला, और मदील सिरोपाव।
  • सर्वोच्च पुरस्कार: मारवाड़ राज्य में 'हाथी सिरोपाव' सर्वोच्च पुरस्कार था।

3. भू-राजस्व व्यवस्था (Land Revenue System)

मध्यकाल में राज्य की आर्थिक व्यवस्था का मुख्य आधार कृषि एवं कृषि राजस्व था।

(A) स्वामित्व के आधार पर भूमि का विभाजन

भूमि का प्रकार स्वामित्व / नियंत्रण मुख्य विशेषता
खालसा सीधे राज्य के अधिकार में प्रबन्धक दीवान था; देखरेख 'हवालदार' करता था।
हवाला राज्य नियंत्रण देखरेख 'हवालदार' करता था।
जागीर जागीरदार/सामन्त का स्वामित्व जागीरदार को निश्चित वार्षिक कर खजाने में जमा करवाना होता था। (फारसी शब्द)।
भोम (भूमबाव) भोमियों का अधिकार राज्य की सेवा के बदले दी गई कर-मुक्त भूमि। पैतृक अधिकार।
सासण (माफी जागीर) मंदिर, मस्जिद, चारण, कवि, ब्राह्मण दान में दी जाने वाली पूर्णतः कर मुक्त भूमि।
जीविका रानियों व निकट सम्बन्धियों को जीवन-यापन (भरण-पोषण) के लिए दी गई भूमि।
जूनी जागीर भाई-बन्धु व निकट रिश्तेदार जब्त की गई जागीर के बदले भरण-पोषण के लिए दी गई भूमि।
डोहली मंदिर, मठ या धार्मिक स्थान दान में दी गई भूमि।
ईनाम राजा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले को धारक 'ईनामदार' कहलाता था।
चरणौता (गोचर) ग्राम पंचायत का सामूहिक अधिकार पशुओं के चरने हेतु छोड़ी गई चारागाह भूमि।
मुश्तरका जागीरदार व राज्य में बंटी हुई मारवाड़ के कुछ गाँव जिनकी आय बँटी हुई थी।

(B) कृषि योग्य भूमि के प्रकार और काश्तकार

  • बारानी: केवल बरसात के पानी से होने वाली पैदावार।
  • चाही (सिंचित): सिंचाई के द्वारा होने वाली पैदावार।
  • मारवाड़ में काश्तकार: बापीदार (भूमि के स्थायी स्वामी, अकाल में भी बेदखल नहीं होते) और गैर बापीदार (अस्थायी/शिकमी काश्तकार)।
  • बपौती: किसानों के स्वामित्व वाली भूमि (मेवाड़ में इसे 'बफौती' कहा जाता था)।
  • दाखला: राजा व जागीरदार द्वारा किसानों को दिए गए पट्टे का राजकीय रजिस्टर में दर्ज विवरण।
  • जयपुर व कोटा में गाँव: जयपुर में गाँव असली और दाखिली में विभाजित थे। कोटा में असली और मजारा (मजारा किसान को भूमि बेचने का अधिकार नहीं था)।

4. भू-राजस्व निर्धारण की पद्धतियाँ

भू-राजस्व (लगान/भोग/हासिल) का निर्धारण भूमि की उत्पादन क्षमता के आधार पर होता था। (जैसे- बीकानेर में बारानी भूमि की दर से सिंचित भूमि की दर 'ड्योढ़ी' थी)। कर अनाज रूप में (भोग) या नकद रूप में (हिरण्य) लिया जाता था।

पद्धति का नाम विवरण
लाटा फसल कटने और साफ होने के बाद एकत्रित अनाज के ढेर को तौलकर/नापकर ठिकाने का हिस्सा लेना।
कूँता खड़ी फसल (खेत में) का अनुमान लगाकर राज्य/स्वामी का हिस्सा निश्चित करना।
बंटाई (गल्ला बक्शी/भाओली) सबसे प्राचीन प्रणाली; प्रायः उपज के 1/3 भाग पर राज्य का अधिकार। (प्रकार: खेत बंटाई, लंक बंटाई, रास बंटाई)।
बीघोड़ी मारवाड़ व बीकानेर में भूमि की उर्वरा के आधार पर प्रति बीघे पर लगे कर से राजस्व वसूलना।
जब्ती गन्ना, कपास, अफीम (नकदी फसलों) पर प्रति बीघा नकद कर। (टोडरमल द्वारा शुरू)।
मुकाता (ठेका) प्रत्येक खेत पर नकदी या अनाज के रूप में एक मुश्त राजस्व निश्चित करना।
इजारा प्रणाली राजस्व की ठेका प्रणाली, जिसमें सबसे अधिक बोली लगाने वाले को भूमि ठेके पर दी जाती थी।
डोरी / जब्ती डोरी से नापे गए बीघे का हिस्सा निर्धारित करके मालगुजारी वसूलना।
घुघरी / बीज घूघरी प्रति कुआँ निश्चित मात्रा, या राज्य द्वारा केवल बोये गए बीज के बराबर अनाज लेना।
साद प्रथा मेवाड़ में कर अदायगी का आश्वासन स्थानीय महाजन से लिया जाता था।

5. भू-राजस्व के अतिरिक्त अन्य कर (लाग-बाग)

भू-राजस्व के अलावा किसानों और जनता से विभिन्न प्रकार के अन्य कर भी वसूले जाते थे, जिन्हें लाग-बाग कहा जाता था:

कर का नाम विवरण / क्षेत्र
गृहकर (House Tax) मारवाड़: घर गिनती/घर बाब, कोटा: घर बराड़, मेवाड़: घर गिनती बराड़, जयपुर: घर की बिछौती, बीकानेर: धुआँ भाछ।
घासमरी विभिन्न प्रकार के चराई करों का सामूहिक नाम।
अंग लाग / अंगाकर प्रत्येक किसान के परिवार के प्रत्येक सदस्य से 1 रु. की दर से वसूली (मारवाड़ में मानसिंह के समय)।
फौज खर्च (खेड़ खर्च) युद्ध में जाते समय सेना के खर्च के नाम से वसूला जाने वाला कर (खालसा व जागीर क्षेत्र में)।
रूखवाली भाछ (रक्षा कर) बीकानेर में बागी ठाकुरों और लूट-खसोट से राज्य को बचाने के लिए सैनिक दायित्वों की पूर्ति हेतु।

1. मध्यकालीन राजस्थान की सैन्य व्यवस्था (Military System)

राजपूत शासकों की सैन्य व्यवस्था परंपरागत हथियारों (तलवार, भाला, गदा, ढाल) और चतुरंगिणी सेना (हाथी, घोड़े, ऊँट, रथ) पर आधारित थी। मुगलों के संपर्क में आने के बाद राजपूतों ने युद्ध में बारूद, तोपों और बंदूकों का प्रयोग भी शुरू कर दिया।

(A) सेना के मुख्य प्रकार

  • अहदी (Ahdi): यह राजा की अपनी निजी सेना (Bodyguards) होती थी, जो एक छोटी लेकिन अत्यधिक प्रशिक्षित टुकड़ी थी।
  • जमियत (Jamiyat): यह सामंतों की सेना थी, जो सामंतों द्वारा राज्य की सेवा के रूप में नियमित तौर पर राजा को उपलब्ध कराई जाती थी।

(B) सेना के विभिन्न अंग (Divisions of the Army)

  • अश्वरोही / घुड़सवार सेना:
    • बारगीर (Bargir): ये वे सैनिक थे जिन्हें राज्य की ओर से अस्त्र-शस्त्र और घोड़ा प्रदान किया जाता था।
    • सिलेदार (Siledar): ये सैनिक अपना साज-सामान और घोड़ा स्वयं जुटाते थे। इन्हें केवल युद्ध के समय भर्ती किया जाता था और इनका वेतन बारगीर से अधिक होता था।
    • वेतन का आधार: घोड़ों की नस्ल (जैसे- काल्डा सवार, ताजी सवार, रस्मी सवार) के आधार पर वेतन निर्धारित होता था।
  • शूतर सवार (ऊँट सवार सेना): पश्चिमी राजस्थान (रेगिस्तानी इलाकों) में ऊँट सवारों की संख्या अधिक होती थी। कोटा राज्य में घुड़सवार/ऊँट सेना को 'माधव रिसाला' और 'राज्य रिसाला' में विभाजित किया गया था।
  • पैदल सैनिक (प्यादे):
    • अहशमा सैनिक: ये स्थायी सैनिक थे जो मुख्य रूप से तीर-कमान और भाला का प्रयोग करते थे।
    • सेहबन्दी सैनिक: ये अस्थायी सैनिक होते थे, जिनका मुख्य कार्य भू-राजस्व (लगान) वसूली में अधिकारियों की मदद करना था।
  • हस्ति सेना (Elephantry): हाथियों के रखरखाव और प्रबंधन के लिए 'पीलखाना' नामक एक अलग विभाग होता था।

(C) तोपखाना (Artillery)

मुगलों के संपर्क के बाद तोपखाने का विकास हुआ। इसके प्रमुख अधिकारी को 'दरोगा-ए-तोपखाना' कहा जाता था। तोपें तीन प्रकार की होती थीं:

  • जिन्सी तोपें (रामचंगी): ये बहुत बड़ी और भारी तोपें होती थीं, जिनका उपयोग किलों की रक्षा के लिए किया जाता था।
  • दस्ती तोपें (हल्की तोपें): इन्हें आसानी से ले जाया जा सकता था। जैसे- नरनाल (सैनिकों की पीठ पर), गजनाल (हाथियों पर), और शुतरनाल (ऊँटों पर रखकर चलाई जाने वाली)।
  • रहकला: ये पहिए लगी तोपें थीं, जिन्हें बैलों द्वारा खींचा जाता था।

विशेष तथ्य: राजपूत सैनिक तोपची (Gunner) का कार्य करना अपनी शान के खिलाफ मानते थे। इसलिए तोप चलाने के लिए मुल्तान और गोंडवाना से प्रशिक्षित गोलंदाज (मुस्लिम तोपची) बुलाए जाते थे।

2. न्याय व्यवस्था (Judicial System)

मध्यकालीन राजस्थान में न्याय का मुख्य आधार प्राचीन धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ, रीति-रिवाज और लोकाचार थे।

(A) न्यायिक पदानुक्रम और अधिकारी

  • सर्वोच्च न्यायाधीश: राजा स्वयं न्याय का सर्वोच्च अधिकारी होता था। अंतिम अपील राजा के पास ही की जाती थी।
  • दीवान: हाकिम के फैसलों के विरुद्ध अपील दीवान के पास होती थी।
  • हाकिम: यह परगना स्तर पर दीवानी (Civil) और फौजदारी (Criminal) दोनों प्रकार के मामलों की सुनवाई करता था।
  • जागीरदार: जागीर क्षेत्र में न्याय का कार्य सामंत या जागीरदार द्वारा किया जाता था।
  • स्थानीय न्याय: गाँवों में छोटे-मोटे अपराधों और विवादों का निपटारा ग्राम पंचायतों (पंचकुल) तथा जातीय पंचायतों द्वारा किया जाता था।

(B) विभिन्न राज्यों के न्यायिक अधिकारी

राज्य न्यायिक अधिकारी / संस्था
मेवाड़ दण्डपति
बीकानेर व जोधपुर दरोगा-ए-अदालत
जयपुर राजा की अदालत को 'न्याय सभा' कहा जाता था; आमिल प्रतिदिन मुकदमे सुनता था।

(C) दण्ड विधान और कारावास

  • उस समय का दण्ड विधान अत्यधिक कठोर नहीं था। अपराधियों को सामान्यतः आर्थिक जुर्माना या देश निकाला (Exile) का दण्ड दिया जाता था।
  • मृत्यु दण्ड: यह केवल शासक (राजा) द्वारा विशेष और गंभीर परिस्थितियों में ही दिया जा सकता था; जागीरदारों को यह अधिकार नहीं था।
  • कारावास (जेल): मारवाड़ राज्य में कारावास (जेलखाने) को 'भाकसी' कहा जाता था।

3. भू-राजस्व के अतिरिक्त अन्य कर (लाग-बाग)

किसानों और आम जनता से भू-राजस्व के अलावा कई प्रकार के स्थानीय कर वसूले जाते थे, जिन्हें लाग-बाग कहा जाता था।

कर का नाम विवरण एवं संबंधित क्षेत्र
चैवरी कर / लाग किसानों द्वारा अपनी बेटी (या बेटे) के विवाह पर राज्य/ठिकाने को दिया जाने वाला कर। (जैसे बिजौलिया में कृष्ण सिंह द्वारा)।
कागळी या नाता कर विधवा के पुनर्विवाह पर लिया जाने वाला कर (जोधपुर)। इसे कोटा में नाता बराड़ और बीकानेर में नाता छेली कहते थे।
जकात / सायर / दाण जकात: बीकानेर में आयात-निर्यात कर। सायर: जोधपुर व जयपुर में सीमा शुल्क। दाण: मेवाड़ व जैसलमेर में माल के आयात-निर्यात पर कर।
मापा बीकानेर राज्य में वस्तुओं की बिक्री पर लगने वाला बिक्री कर (Sales Tax)।
राहदारी राज्य की सीमा या क्षेत्र से गुजरने वाले माल (Transit) पर लगने वाली चुंगी।
खारूता मेवाड़ राज्य में एक गाँव से दूसरे गाँव में माल ले जाने पर लिया जाने वाला आंतरिक कर।
लाकड़ कर जंगलों से जलाने की लकड़ियाँ प्राप्त करने पर राजकीय कर। इसे बीकानेर में 'काठ' और मेवाड़ में 'खड़लाकड़' कहते थे।
सिंगोटी पशुओं की बिक्री के समय राज्य द्वारा वसूली जाने वाली लाग।
जाजम लाग भूमि के विक्रय (बिक्री) पर वसूली जाने वाली लाग।
मलबा मारवाड़ में मालगुजारी के अतिरिक्त वसूला जाने वाला कर, जिसका उपयोग गाँव की सुरक्षा संबंधी खर्चों के लिए होता था।
दस्तूर जयपुर राज्य में पटेल, चौधरी, पटवारी आदि कर्मचारियों द्वारा किसानों से अवैध रूप से वसूली जाने वाली रकम।
छटून्द मेवाड़ राज्य में जागीरदार द्वारा अपनी कुल आय का 1/6 भाग शासक को देना।
लाग राज्य की सेना के पड़ाव (Camping) के समय गाँव के लोगों से वसूला जाने वाला कर।
अन्य स्थानीय कर मटक, बिछायत, और चू-सराई।

4. भू-प्रशासन से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली

राजस्व और भूमि प्रबंधन के दस्तावेजों के लिए विशिष्ट शब्दावली का प्रयोग होता था:

  • अड़सट्टा: जयपुर राज्य में भूमि संबंधी रिकॉर्ड (तोजी वरकों के रूप में)। इसमें परगनों, मौजों (गांवों), भूमि के प्रकार और पैदावार का विस्तृत वर्णन होता था।
  • खसरा / तजकीरा: भूमि संबंधी विस्तृत विवरण (रकबा, खतौनी आदि) का रिकॉर्ड।
  • दाखला: राजा या जागीरदारों द्वारा काश्तकारों को दिए गए भूमि के पट्टे का विवरण, जो राजकीय रजिस्टर में विधिवत दर्ज होता था।
  • याद्दाश्त: यह एक प्रकार का पट्टा था, जिसमें राजा द्वारा जागीरदार को जागीर स्वीकृत किए जाने का विवरण होता था।
  • छूट के कागद: शासक द्वारा करों (टैक्स) में दी गई छूट से संबंधित राजकीय बहियों में दर्ज पत्र या आदेश।
  • सहणा: भू-राजस्व में राज्य का भाग निश्चित करने वाला प्रबंधक या अधिकारी।
  • तफेदार: गाँव से वसूले जाने वाले भू-राजस्व (लगान) का हिसाब-किताब रखने वाला कर्मचारी।

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