जीव जगत: शैवाल, ब्रायोफाइट, टेरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म

ादप जगत या वनस्पति जगत (Kingdom Plantae) के अंतर्गत उन सभी बहुकोशिकीय, यूकेरियोटिक जीवों का अध्ययन किया जाता है जिनमें प्रकाश-संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल उपस्थित होता है। आर.एच. व्हिटेकर (1969) द्वारा प्रस्तावित पाँच जगत वर्गीकरण प्रणाली (Five Kingdom System) के बाद से पादप जगत की परिभाषा में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं। पूर्व में कवक (Fungi), मोनेरा और प्रोटिस्टा के उन सदस्यों को जिनमें कोशिका भित्ति पाई जाती थी, पादप जगत में रखा जाता था, किंतु अब उन्हें इससे अलग कर दिया गया है।

1. वर्गीकरण प्रणाली का इतिहास और विकास

पादप जगत के वर्गीकरण को समझने के लिए समय-समय पर विभिन्न प्रणालियों का उपयोग किया गया है:

(A) कृत्रिम वर्गीकरण प्रणाली (Artificial Classification System):
  • यह प्रणाली मुख्य रूप से आकारिकी गुणों (Morphological characters) जैसे कि जीव की प्रकृति, रंग, पत्तियों की संख्या और आकृति पर आधारित थी।
  • प्रस्तावक: कैरोलस लिनिअस (Carolus Linnaeus)।
  • आधार: यह मुख्यतः कायिक गुणों या 'पुमंग' (Androecium) की संरचना पर आधारित थी।
  • कमियाँ:
    • इसने बहुत ही समीप संबंध वाली स्पीशीज को अलग कर दिया क्योंकि यह बहुत कम गुणों पर आधारित थी।
    • इसमें कायिक (Vegetative) और लैंगिक (Sexual) गुणों को समान महत्व दिया गया, जो उचित नहीं है क्योंकि कायिक गुण पर्यावरण के अनुसार आसानी से बदल जाते हैं।
(B) प्राकृतिक वर्गीकरण प्रणाली (Natural Classification System):
  • यह प्रणाली जीवों के बीच प्राकृतिक संबंधों और केवल बाह्य गुणों के साथ-साथ भीतरी गुणों (Internal features) पर भी आधारित है।
  • भीतरी गुण: इसमें परा-रचना (Ultrastructure), शारीर (Anatomy), भ्रूण विज्ञान (Embryology) और पादप रसायन (Phytochemistry) को आधार बनाया गया।
  • प्रस्तावक: जॉर्ज बेंथम (George Bentham) तथा जोसेफ डाल्टन हूकर (Joseph Dalton Hooker)।
(C) जातिवृत्तीय वर्गीकरण प्रणाली (Phylogenetic Classification System):
  • यह प्रणाली विभिन्न जीवों के बीच 'विकासवादी संबंधों' (Evolutionary relationships) पर आधारित है।
  • सिद्धांत: इसके अनुसार एक ही टैक्सॉन (Taxon) के सदस्य के पूर्वज एक ही रहे होंगे। वर्तमान में यह प्रणाली सर्वाधिक मान्य है।

2. आधुनिक वर्गिकी की अन्य शाखाएँ (Google Added Insights)

जहाँ जीवाश्म प्रमाण उपलब्ध नहीं होते, वहाँ निम्नलिखित आधुनिक प्रणालियों का उपयोग किया जाता है:

  • संख्यात्मक वर्गिकी (Numerical Taxonomy): इसे अब कंप्यूटर के उपयोग द्वारा किया जाता है। इसमें सभी अवलोकनीय गुणों को संख्या और कोड दिए जाते हैं और डेटा को संसाधित किया जाता है। इससे प्रत्येक गुण को समान महत्व मिलता है।
  • कोशिका वर्गिकी (Cytotaxonomy): यह कोशिका वैज्ञानिक सूचनाओं जैसे गुणसूत्रों की संख्या, संरचना और व्यवहार (Meiosis/Mitosis) पर आधारित है।
  • रसायन वर्गिकी (Chemotaxonomy): पादपों के रासायनिक घटकों (जैसे DNA अनुक्रम, प्रोटीन, क्रिस्टल आदि) का उपयोग कर भ्रांतियों को दूर करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

3. पादप जगत का वर्गीकरण (प्रमुख समूह)

आधुनिक वनस्पति विज्ञान के अनुसार पादप जगत को निम्नलिखित पाँच समूहों में विभाजित किया गया है, जिनका विवरण इस अध्याय के आगामी भागों में है:

  • शैवाल (Algae): क्लोरोफिल युक्त, सरल और थैलायड संरचना वाले जीव। नोट: साइनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) अब शैवाल नहीं हैं, वे 'मोनेरा' का हिस्सा हैं।
  • ब्रायोफाइटा (Bryophytes): पादप जगत के उभयचर।
  • टेरिडोफाइटा (Pteridophytes): प्रथम संवहनी (Vascular) पौधे।
  • जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms): नग्न बीज वाले पौधे।
  • एंजियोस्पर्म (Angiosperms): पुष्पी पौधे जिनमें बीज फल के अंदर ढके होते हैं।

4. महत्वपूर्ण तथ्य (NCERT Update 2025-26)

  • कोशिका भित्ति का प्रभाव: पहले कवक, मोनेरा और प्रोटिस्टा को उनकी कोशिका भित्ति के कारण पादप माना जाता था, किंतु उनके पोषण और कोशिका संगठन के आधार पर उन्हें अब अलग जगतों में रखा गया है।
  • Cyanobacteria का स्थान: जिन्हें पहले नील-हरित शैवाल कहा जाता था, वे अब स्पष्ट रूप से 'बैक्टीरिया' (मोनेरा) के अंतर्गत आते हैं।

1. आधुनिक वर्गीकरण पद्धतियाँ (Modern Taxonomic Systems)

वर्तमान समय में वर्गीकरण केवल बाह्य लक्षणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विकासवादी इतिहास और सूक्ष्म वैज्ञानिक सूचनाओं पर आधारित है।

(A) जातिवृत्तीय वर्गीकरण तंत्र (Phylogenetic Classification System):
  • यह तंत्र विभिन्न जीवों के बीच विकासीय संबंधों (Evolutionary relationships) पर आधारित है।
  • यह इस मान्यता पर टिका है कि एक ही 'टैक्सॉन' (Taxon) के जीवों के पूर्वज एक ही थे।
  • यह पद्धति विशेष रूप से तब उपयोगी होती है जब जीवों के संबंध में कोई भी जीवाश्मी प्रमाण (Fossil evidence) उपलब्ध नहीं होता।
(B) संख्यात्मक वर्गिकी (Numerical Taxonomy):
  • इसे अब सरलता से कंप्यूटरीकृत किया जा सकता है।
  • यह सभी अवलोकनीय गुणों (Observable traits) पर आधारित है।
  • इसमें सजीवों के सभी लक्षणों को एक नंबर और एक विशेष कोड दिया जाता है, जिसके बाद डेटा को प्रोसेस किया जाता है।
  • लाभ: इससे एक ही समय में सैकड़ों गुणों को ध्यान में रखा जा सकता है और प्रत्येक गुण को समान महत्व मिलता है।
(C) कोशिका वर्गिकी (Cytotaxonomy):
  • यह कोशिका वैज्ञानिक सूचनाओं पर आधारित है।
  • इसमें क्रोमोसोम (गुणसूत्र) की संख्या, उनकी संरचना और व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
(D) रसायन वर्गिकी (Chemotaxonomy):
  • यह पादपों के रासायनिक कारकों (Chemical constituents) का उपयोग करती है।
  • इसका उपयोग आजकल वर्गिकीविद भ्रांतियों को दूर करने के लिए व्यापक रूप से कर रहे हैं।

2. शैवाल (Algae): परिचय एवं आवास

शैवाल क्लोरोफिल-युक्त, सरल, थैलायड और स्वपोषी जीव हैं। ये मुख्य रूप से जलीय जीव हैं, जो अलवणीय जल और समुद्री जल दोनों में पाए जाते हैं।

  • विविध आवास: ये नमी युक्त पत्थरों, मिट्टी और लकड़ी में भी पाए जाते हैं।
  • सहजीवन (Symbiosis): कुछ शैवाल कवक के साथ मिलकर 'लाइकन' (Lichen) बनाते हैं और कुछ प्राणियों के साथ भी पाए जाते हैं (जैसे स्लॉथ रीछ के बालों पर)।
  • आकार और माप:
    • कॉलोनी के रूप में: वॉल्वॉक्स (Volvox)।
    • तंतुमयी (Filamentous) रूप में: यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) और स्पाइरोगैरा (Spirogyra)।
    • विशालकाय रूप: केल्प (Kelp) जैसे शैवाल बहुत बड़े और विशाल होते हैं।

3. शैवाल में जनन (Reproduction in Algae)

शैवाल तीन प्रकार से जनन करते हैं: कायिक, अलैंगिक और लैंगिक।

(A) कायिक जनन (Vegetative Reproduction):
  • यह मुख्य रूप से विखंडन (Fragmentation) विधि द्वारा होता है।
  • प्रत्येक खंड टूटकर एक नया 'थैलस' बना लेता है।
(B) अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction):
  • यह विभिन्न प्रकार के बीजाणुओं द्वारा होता है।
  • सबसे सामान्य बीजाणु 'जूस्पोर' (Zoospores) होते हैं।
  • इनमें कशाभिक (Flagella) होते हैं, जिसके कारण ये चलायमान (Motile) होते हैं। अंकुरण के बाद इनसे नए पौधे बनते हैं।
(C) लैंगिक जनन (Sexual Reproduction):
  • इसमें दो युग्मकों (Gametes) का संलयन होता है। इसे तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
  • समयुग्मकी (Isogamous): जब दोनों युग्मक माप में समान हों।
    • फ्लैजिला युक्त और समान माप: यूलोथ्रिक्स
    • फ्लैजिला विहीन लेकिन समान माप: स्पाइरोगैरा
  • असमयुग्मकी (Anisogamous): जब विभिन्न माप वाले दो युग्मक संलयित होते हैं (जैसे यूडोरिना की कुछ स्पीशीज)।
  • विषमयुग्मकी (Oogamous): इसमें एक बड़ा, अचल (स्थैतिक) मादा युग्मक होता है और एक छोटा, चलायमान नर युग्मक होता है। उदाहरण: वॉल्वॉक्स और फ्यूकस

4. शैवाल का आर्थिक महत्व एवं उपयोगिता

शैवाल मनुष्य और पर्यावरण के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।

  • CO2 स्थिरीकरण: पृथ्वी पर प्रकाश-संश्लेषण के दौरान होने वाले कुल कार्बन डाइऑक्साइड स्थिरीकरण का लगभग आधा भाग शैवाल द्वारा किया जाता है।
  • ऑक्सीजन का स्तर: ये अपने पर्यावरण में घुली हुई ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाते हैं।
  • प्राथमिक उत्पादक: ये ऊर्जा के प्राथमिक उत्पादक हैं और जलीय प्राणियों के खाद्य चक्र का मुख्य आधार हैं।
  • भोजन के रूप में: पोरफाइरा (Porphyra), लैमिनेरिया (Laminaria) और सरगासम (Sargassum) जैसी समुद्र की 70 स्पीशीज भोजन के रूप में उपयोग की जाती हैं।
  • व्यवसायिक उत्पाद:
    • एल्जिन (Algin): समुद्री भूरे शैवाल से प्राप्त जल धारण करने वाला पदार्थ।
    • कैरागीन (Carrageen): लाल शैवाल से प्राप्त व्यावसायिक उत्पाद।
    • अगर (Agar): जेलीडियम (Gelidium) और ग्रेसिलेरिया (Gracilaria) से प्राप्त होता है, जिसका उपयोग सूक्ष्मजीवों के संवर्धन और आइसक्रीम/जेली बनाने में किया जाता है।
  • अंतरिक्ष यात्रा: क्लोरेला (Chlorella) एक एककोशिकीय प्रोटीन युक्त शैवाल है, जिसका उपयोग अंतरिक्ष यात्री भोजन के रूप में करते हैं।

1. शैवाल की पारिस्थितिक और आर्थिक उपयोगिता

शैवाल न केवल जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के आधार हैं, बल्कि मानवीय अर्थव्यवस्था में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

(A) पारिस्थितिक महत्व:
  • ऑक्सीजन का स्तर: प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा शैवाल अपने आस-पास के पर्यावरण में घुली हुई ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) के स्तर को बढ़ा देते हैं।
  • प्राथमिक उत्पादक: ये ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं जो समस्त जलीय प्राणियों के खाद्य चक्र (Food Cycles) का आधार बनते हैं।
(B) भोजन के रूप में उपयोग:
  • समुद्र की लगभग 70 प्रजातियाँ भोजन के रूप में उपयोग की जाती हैं। इनमें मुख्य रूप से पोरफायरा (Porphyra), लैमिनेरिया (Laminaria) और सरगासम (Sargassum) शामिल हैं।
  • एककोशिकीय शैवाल: क्लोरेला (Chlorella) और स्पिरुलाइना (Spirulina) में प्रोटीन की प्रचुर मात्रा होती है। इनका उपयोग अंतरिक्ष यात्री (Space Travelers) पूरक भोजन के रूप में करते हैं।
(C) व्यावसायिक उपयोग:
  • हाइड्रोकोलॉइड्स (जल धारण करने वाले पदार्थ): कुछ समुद्री भूरे और लाल शैवाल भारी मात्रा में हाइड्रोकोलॉइड का उत्पादन करते हैं।
    • कैरागीन (Carrageen): यह लाल शैवाल से प्राप्त किया जाता है।
    • एल्जिन (Algin): यह भूरे शैवाल से प्राप्त होता है।
  • अगर-अगर (Agar): यह जेलीडियम (Gelidium) और ग्रेसिलेरिया (Gracilaria) नामक शैवाल से प्राप्त होता है। इसका उपयोग सूक्ष्मजीवों के संवर्धन (Culture), आइसक्रीम और जेली बनाने में किया जाता है।

2. क्लोरोफाइसी (Chlorophyceae): हरे शैवाल

क्लोरोफाइसी वर्ग के सदस्यों को सामान्यतः 'हरा शैवाल' (Green Algae) कहा जाता है। इनकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(A) शारीरिक संरचना और वर्णक:
  • ये जीव एककोशिकीय, कॉलोनीमयी (Colonial) अथवा तंतुमयी (Filamentous) हो सकते हैं।
  • रंग: इनमें क्लोरोफिल 'a' तथा 'b' की प्रधानता होती है, जिसके कारण इनका रंग हरी घास की तरह दिखाई देता है।
  • क्लोरोप्लास्ट: इनके वर्णक स्पष्ट क्लोरोप्लास्ट में स्थित होते हैं। क्लोरोप्लास्ट का आकार भिन्न-भिन्न जातियों में अलग हो सकता है जैसे: डिस्कनुमा, प्लेट की तरह, जालिकाकार (Reticulate), कप के आकार का, सर्पिल (Spiral) अथवा रिबन के आकार का।
[attachment_0](attachment) (B) संचित भोजन और कोशिका भित्ति:
  • पायरीनॉइड (Pyrenoids): अधिकांश सदस्यों के क्लोरोप्लास्ट में एक या अधिक पायरीनॉइड पाए जाते हैं। इनमें स्टार्च के साथ-साथ प्रोटीन भी संचित होता है।
  • अन्य संचित भोजन: कुछ शैवाल तेल की बूंदों (Oil droplets) के रूप में भी भोजन का संचय करते हैं।
  • कोशिका भित्ति: इनकी कोशिका भित्ति कठोर होती है, जो दो परतों से बनी होती है:
    • भीतरी सतह: सेलुलोज (Cellulose) की बनी होती है।
    • बाहरी सतह: पेक्टोज (Pectose) की बनी होती है।
[attachment_1](attachment) (C) जनन (Reproduction):
  • कायिक जनन: तंतु के टूटने (विखंडन) अथवा विभिन्न प्रकार के बीजाणुओं के बनने से होता है।
  • अलैंगिक जनन: यह कशाभिकायुक्त (Flagellated) जूस्पोर (Zoospores) द्वारा होता है, जिनका निर्माण 'जूस्पोरेन्जिया' में होता है।
  • लैंगिक जनन: इसमें युग्मकों का संलयन होता है, जो 'समयुग्मकी' (Isogamous), 'असमयुग्मकी' (Anisogamous) अथवा 'विषमयुग्मकी' (Oogamous) प्रकार का हो सकता है।

3. शैवाल के तीनों वर्गों का तुलनात्मक विश्लेषण

शैवाल को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है: क्लोरोफाइसी, फियोफाइसी और रोडोफाइसी। इनके मुख्य लक्षण नीचे दिए गए हैं:

1. क्लोरोफाइसी (हरे शैवाल):
  • प्रमुख वर्णक: क्लोरोफिल a और b।
  • संचित भोजन: स्टार्च।
  • कोशिका भित्ति: सेलुलोज।
  • कशाभिका (Flagella): संख्या 2 से 8, समान लंबाई और शीर्ष (Apical) पर स्थित।
  • आवास: ताज़ा जल (अलवण जल), खारा जल और लवणीय जल।
2. फियोफाइसी (भूरे शैवाल):
  • प्रमुख वर्णक: क्लोरोफिल a, c और

    1. फियोफाइसी (Phaeophyceae): भूरे शैवाल

    फियोफाइसी वर्ग के शैवाल मुख्य रूप से समुद्री आवासों में पाए जाते हैं। इनके माप और आकार में अत्यधिक भिन्नता देखी जाती है।

    (A) संरचना और वर्णक:
    • आकार: ये सरल शाखित और तंतुमयी (जैसे- एक्टोकार्पस) से लेकर अत्यधिक सघन शाखित (जैसे- केल्प) तक हो सकते हैं। केल्प की ऊँचाई 100 मीटर तक पहुँच सकती है।
    • वर्णक: इनमें क्लोरोफिल a, c, कैरोटिनॉइड और जैन्थोफिल पाए जाते हैं।
    • रंग: इनका रंग जैतूनी हरे से लेकर भूरे रंग के विभिन्न शेड तक होता है। यह रंग जैन्थोफिल वर्णक 'फ्यूकोजैन्थिन' की मात्रा पर निर्भर करता है।
    • कोशिका संरचना: इनकी कोशिका भित्ति सेलुलोज की बनी होती है, जिसके बाहर एल्जिन (Algin) का जिलेटिनी स्तर होता है। इनके प्रोटोप्लास्ट में रिक्तिका (Vacuole) और केंद्रक प्रमुखता से पाए जाते हैं।
    • पादप शरीर: इनका शरीर प्रायः तीन भागों में विभक्त होता है: 'होल्डफास्ट' (Holdfast - जो इसे आधार से जोड़ता है), एक 'वृंत' (Stipe) और एक पत्ती जैसा प्रकाश-संश्लेषी अंग 'फ्रोंड' (Frond)।
    (B) जनन (Reproduction):
    • कायिक जनन: विखंडन (Fragmentation) विधि द्वारा होता है।
    • अलैंगिक जनन: यह नाशपाती के आकार वाले द्वि-कशाभिक (Biflagellate) जूस्पोर द्वारा होता है। इनके कशाभिका (Flagella) असमान होते हैं और पार्श्वीय रूप से जुड़े रहते हैं।
    • लैंगिक जनन: यह समयुग्मकी, असमयुग्मकी या विषमयुग्मकी हो सकता है। युग्मकों का संगम जल में या अंडधानी (Oogonium) में होता है। इनके युग्मक 'पाइरीफोर्म' (Pyrus - नाशपाती आकार) के होते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: एक्टोकार्पस (Ectocarpus), डिक्टयोटा (Dictyota), लैमिनेरिया (Laminaria), सरगासम (Sargassum) और फ्यूकस (Fucus)।

    2. रोडोफाइसी (Rhodophyceae): लाल शैवाल

    इन्हें लाल शैवाल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका रंग लाल वर्णक r-फाइकोएरिथ्रिन के कारण होता है।

    (A) आवास और संरचना:
    • आवास: ये अधिकांशतः समुद्र के गर्म क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ये पानी की सतह पर (जहाँ प्रकाश अधिक है) और समुद्र की गहराई (जहाँ प्रकाश कम है) दोनों जगह मिलते हैं।
    • शारीरिक बनावट: इनका थैलस प्रायः बहुकोशिकीय होता है और कुछ की संरचना अत्यंत जटिल होती है।
    • संचित भोजन: भोजन 'फ्लोरिडियन स्टार्च' के रूप में संचित होता है। इसकी संरचना एमाइलोपेक्टिन (Amylopectin) और ग्लाइकोजन (Glycogen) के बहुत समान होती है।
    (B) जनन:
    • कायिक जनन: विखंडन द्वारा।
    • अलैंगिक जनन: अचल (Non-motile) बीजाणुओं द्वारा।
    • लैंगिक जनन: अचल युग्मकों द्वारा विषमयुग्मकी (Oogamous) विधि से। निषेचन के पश्चात इनमें जटिल विकास (Post-fertilization development) होता है।
    • प्रमुख उदाहरण: पॉलीसल्फोनिआ (Polysiphonia), पोरफायरा (Porphyra), ग्रेसिलेरिया (Gracilaria) और जेलीडियम (Gelidium)।

    3. ब्रायोफाइटा (Bryophyta): पादप जगत के उभयचर

    ब्रायोफाइटा में मॉस (Moss) और लिवरवर्ट (Liverworts) शामिल हैं। ये प्रायः पहाड़ियों के नम और छायादार क्षेत्रों में उगते हैं।

    (A) प्रमुख विशेषताएँ:
    • पादप जगत के उभयचर (Amphibians of Plant Kingdom): इन्हें यह इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये भूमि पर जीवित रह सकते हैं, लेकिन लैंगिक जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं।
    • पादप शरीर: इनका शरीर शैवाल की तुलना में अधिक विभेदित होता है। यह थैलस जैसा होता है और आधार से मूलाभास (Rhizoids) द्वारा जुड़ा रहता है। मूलाभास एककोशिकीय या बहुकोशिकीय हो सकते हैं।
    • अनुपस्थित अंग: इनमें वास्तविक जड़, तना या पत्तियां नहीं होतीं, बल्कि उनके समान संरचनाएं होती हैं।
    • युग्मकोद्भिद (Gametophyte): इनका मुख्य पादप शरीर अगुणित (Haploid) होता है जो युग्मक उत्पन्न करता है।
    (B) जनन अंग और निषेचन:
    • नर अंग: इसे पुंधानी (Antheridium) कहते हैं, जो द्वि-कशाभिक पुमंग (Biflagellate antherozoids) उत्पन्न करता है।
    • मादा अंग: इसे स्त्रीधानी (Archegonium) कहते हैं। यह फ्लास्क के आकार की होती है और एक अंडा उत्पन्न करती है।
    • निषेचन प्रक्रिया: पुमंग पानी में छोड़े जाते हैं और स्त्रीधानी के संपर्क में आकर अंडे से संलयित होकर युग्मनज (Zygote) बनाते हैं।
    • बीजाणुद्भिद (Sporophyte): युग्मनज तुरंत विभाजित होकर स्पोरोफाइट बनाता है। स्पोरोफाइट स्वतंत्र नहीं होता, बल्कि प्रकाश-संश्लेषी युग्मकोद्भिद (Gametophyte) से जुड़ा रहता है और उससे पोषण प्राप्त करता है।
    (C) आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व:
    • भोजन: कुछ मॉस शाकाहारी स्तनधारियों और पक्षियों के लिए भोजन का स्रोत हैं।
    • ईंधन: स्फैगनम (Sphagnum) की कुछ प्रजातियां 'पीट' (Peat) प्रदान करती हैं, जिसका उपयोग ईंधन के रूप में होता है।
    • पैकिंग सामग्री: पानी रोकने की उच्च क्षमता के कारण स्फैगनम का उपयोग सजीव पदार्थों के परिवहन और पैकिंग में किया जाता है।
    • मृदा संरक्षण: मॉस मिट्टी पर एक सघन परत बना देते हैं, जिससे वर्षा की बूंदें मिट्टी को सीधे हानि नहीं पहुँचातीं और मृदा अपरदन (Soil erosion) रुकता है।
    • पारिस्थितिक अनुक्रमण: लाइकेन के साथ मॉस चट्टानों पर उगने वाले पहले जीव हैं, जो चट्टानों को अपघटित कर अन्य पौधों के उगने योग्य बनाते हैं।

    1. लिवरवर्ट (Liverworts)

    लिवरवर्ट्स मुख्य रूप से नम और छायादार स्थानों जैसे नदियों के किनारे, दलदली क्षेत्रों, गीली मिट्टी और पेड़ों की छालों पर उगते हैं।

    (A) संरचना:
    • पादप शरीर: इनका शरीर 'थैलासाभ' (Thalloid) होता है, जैसा कि मारकेन्शिया में देखा जाता है। थैलस पृष्ठाधर (Dorsiventral) होते हैं और अधःस्तर (Substrate) से बिल्कुल चिपके रहते हैं।
    • पत्तीदार सदस्य: कुछ सदस्यों में तने जैसी संरचना पर दो कतारों में छोटी-छोटी पत्ती जैसी संरचनाएँ पाई जाती हैं।
    (B) जनन (Reproduction):
    • अलैंगिक जनन: यह थैलस के विखंडन या विशेष संरचना 'तजेमा' (Gemma) द्वारा होता है। जेमा हरी, बहुकोशिकीय अलैंगिक कलियाँ हैं, जो छोटे पात्रों 'जेमा कप' (Gemma cups) में स्थित होती हैं। ये पैतृक पादप से अलग होकर नया पौधा बनाती हैं।
    • लैंगिक जनन: नर और मादा अंग या तो एक ही थैलस पर या अलग-अलग थैलस पर विकसित होते हैं।
    • बीजाणुद्भिद (Sporophyte): इसमें तीन भाग होते हैं - पाद (Foot), सीटा (Seta) और कैप्सूल (Capsule)। कैप्सूल के अंदर मियोसिस (Meiosis) के बाद बीजाणु (Spores) बनते हैं, जो अंकुरित होकर मुक्तजीवी युग्मकोद्भिद बनाते हैं।

    2. मॉस (Moss)

    मॉस के जीवन चक्र की प्रभावी अवस्था युग्मकोद्भिद (Gametophyte) होती है, जिसकी दो स्पष्ट अवस्थाएँ हैं:

    (A) जीवन चक्र की अवस्थाएँ:
    • प्रथम तंतु (Protonema): यह बीजाणु (Spore) से सीधे विकसित होने वाली पहली अवस्था है। यह विसर्पी, हरा, शाखित और तंतुमयी होता है।
    • पत्तीदार अवस्था (Leafy Stage): यह प्रथम तंतु से 'पार्श्वीय कली' के रूप में उत्पन्न होती है। इसमें एक सीधा, पतला तना और उस पर सर्पिल रूप में लगी पत्तियाँ होती हैं। यह बहुकोशिकीय शाखित मूलाभास (Rhizoids) द्वारा मिट्टी से जुड़ा रहता है।
    (B) जनन और विकास:
    • कायिक जनन: द्वितीयक प्रथम तंतु के विखंडन और मुकुलन (Budding) द्वारा।
    • लैंगिक जनन: पुंधानी (Antheridia) और स्त्रीधानी (Archegonia) पत्तीदार प्ररोह की चोटी पर स्थित होते हैं।
    • स्पोरोफाइट: निषेचन के बाद युग्मनज से स्पोरोफाइट विकसित होता है, जो पाद, सीटा और कैप्सूल में विभेदित रहता है। मॉस का स्पोरोफाइट लिवरवर्ट की तुलना में अधिक विकसित होता है। इसमें बीजाणु विकिरण (Spore dispersal) की विस्तृत प्रणाली होती है।
    • प्रमुख उदाहरण: फ्यूनेरिया (Funaria), पॉलिट्राइकम (Polytrichum) और स्फैगनम (Sphagnum)।

    3. टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

    विकास की दृष्टि से ये स्थल पर उगने वाले सर्वप्रथम पौधे हैं जिनमें संवहन ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) पाए जाते हैं। जीवाश्म रिकॉर्ड के अनुसार ये 350 मिलियन वर्ष पूर्व प्रभावी वनस्पति थे।

    (A) संरचनात्मक विशेषताएँ:
    • मुख्य पादप शरीर: इनका मुख्य शरीर बीजाणुद्भिद (Sporophyte) होता है, जिसमें वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं।
    • पत्तियाँ: पत्तियाँ छोटी (लघुपर्ण) जैसे सिलैजिनेला में, या बड़ी (वृहत्पर्ण) जैसे फर्न में हो सकती हैं।
    • शंकु (Strobili/Cones): कुछ टेरिडोफाइट्स (जैसे सिलैजिनेला, इक्विसीटम) में बीजाणुपर्ण सघन होकर 'शंकु' बनाते हैं।
    (B) युग्मकोद्भिद और निषेचन:
    • प्रोथैलस (Prothallus): बीजाणु अंकुरित होकर एक छोटा, बहुकोशिकीय, प्रकाश-संश्लेषी थैलस बनाते हैं जिसे 'प्रोथैलस' कहते हैं। इसे उगने के लिए ठंडा, गीला और छायादार स्थान चाहिए।
    • निषेचन: निषेचन के लिए जल की अनिवार्यता होती है। पुमंग पानी के माध्यम से स्त्रीधानी तक पहुँचते हैं, जहाँ युग्मनज का निर्माण होता है।
    (C) विषमबीजाणुकता और बीज स्वभाव (Seed Habit):
    • समबीजाणुक: अधिकांश टेरिडोफाइट्स में एक ही प्रकार के बीजाणु बनते हैं।
    • विषमबीजाणुक (Heterosporous): सिलैजिनेला और साल्वीनिया में दो प्रकार के बीजाणु बनते हैं - वृहद (मादा) और लघु (नर)।
    • महत्व: मादा युग्मकोद्भिद का पैतृक स्पोरोफाइट पर टिका रहना और उसमें भ्रूण का विकास होना 'बीज स्वभाव' (Seed Habit) की ओर एक महत्वपूर्ण विकासवादी कदम माना जाता है।
    (D) टेरिडोफाइटा का वर्गीकरण:
    • साइलोप्सिडा: उदाहरण - साइलोटम (Psilotum)।
    • लाइकोप्सिडा: उदाहरण - सिलैजिनेला (Selaginella) और लाइकोपोडियम।
    • स्फीनोप्सिडा: उदाहरण - इक्विसीटम (Equisetum)।
    • टीरोप्सिडा: उदाहरण - ड्रायोप्टेरिस (Dryopteris), टेरिस और एडिएन्टम।

    1. जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms)

    'जिम्नोस्पर्म' शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों 'जिम्नोस' (Gymnos = अनावृत/नग्न) और 'स्पर्मा' (Sperma = बीज) से मिलकर बना है। इसका अर्थ है- नग्न बीज वाले पौधे

    (A) प्रमुख विशेषताएँ:
    • बीजांड (Ovules): इनमें बीजांड अंडाशय भित्ति से ढके हुए नहीं होते और निषेचन से पूर्व तथा बाद में भी अनावृत (Exposed) ही रहते हैं। निषेचन के बाद विकसित बीज ढके हुए नहीं होते।
    • आवास और आकार: ये मध्यम या लंबे वृक्ष तथा झाड़ियाँ होती हैं। सिकुआ (Sequoia) या रेड वुड ट्री (Red wood tree) सबसे लंबा जिम्नोस्पर्म वृक्ष है।
    (B) जड़, तना और पत्तियाँ:
    • जड़: प्रायः मूसला जड़ (Tap root) होती है।
      • कवक मूल (Mycorrhiza): पाइनस (Pinus) की जड़ें कवक के साथ सहयोग कर लेती हैं।
      • प्रवाल मूल (Coralloid Roots): साइकस (Cycas) की छोटी विशिष्ट जड़ें नाइट्रोजन स्थिर करने वाले साइनोबैक्टीरिया (Nostoc, Anabaena) के साथ सहयोग करती हैं।
    • तना: यह अशाखित (जैसे साइकस) अथवा शाखित (जैसे पाइनस, सिड्रस) हो सकता है।
    • पत्तियाँ: ये अधिक ताप, नमी तथा वायु को सहन करने के लिए अनुकूलित होती हैं।
      • शंक्वाकार पौधे (Conifers): इनमें पत्तियाँ सुई की तरह (Needle-like) होती हैं, जिससे उनका सतही क्षेत्रफल कम हो जाता है।
      • अनुकूलन: इनकी मोटी क्यूटिकल (Cuticle) और गर्तिका रंध्र (Sunken Stomata) पानी की हानि को कम करने में मदद करते हैं।
    (C) जनन (Reproduction):
    • विषम बीजाणु (Heterosporous): ये अगुणित लघुबीजाणु (Microspores - नर) तथा गुरुबीजाणु (Megaspores - मादा) बनाते हैं।
    • शंकु (Cones): बीजाणुधानियाँ बीजाणुपर्ण पर स्थित होती हैं जो सर्पिल रूप से तने पर लगे रहते हैं और सघन शंकु बनाते हैं।
      • नर शंकु (Male Strobili): जिस पर लघुबीजाणुपर्ण तथा लघुबीजाणुधानी होती हैं। इससे 'परागकण' (Pollen grain) विकसित होते हैं।
      • मादा शंकु (Female Strobili): जिस पर गुरुबीजाणुपर्ण तथा गुरुबीजाणुधानी होती हैं।
    • एकलिंगी/उभयलिंगी: पाइनस में नर और मादा शंकु एक ही वृक्ष पर होते हैं (उभयलिंगी), जबकि साइकस में ये अलग-अलग वृक्षों पर होते हैं (एकलिंगी)।
    • निषेचन: बीजाणुधानी से परागकण बाहर निकलते हैं और हवा द्वारा बीजांड के छिद्र तक ले जाए जाते हैं। यहाँ परागनली बनती है जो स्त्रीधानी की ओर जाती है और शुक्राणु छोड़ देती है। निषेचन के बाद युग्मनज से भ्रूण और बीजांड से बीज बनते हैं।

    2. एंजियोस्पर्म (Angiosperms)

    एंजियोस्पर्म या पुष्पी पादप (Flowering Plants) पादप जगत का सबसे बड़ा वर्ग है। जिम्नोस्पर्म के विपरीत, यहाँ बीजांड और परागकण विशिष्ट रचना 'पुष्प' में विकसित होते हैं और बीज फलों के भीतर होते हैं।

    (A) प्रमुख विशेषताएँ:
    • आवास: इनका वासस्थान बहुत व्यापक है।
    • आकार: ये सूक्ष्मदर्शी वुल्फिया (Wolffia) से लेकर सबसे ऊँचे वृक्ष यूकेलिप्टस (Eucalyptus) (100 मीटर से अधिक) तक होते हैं।
    • आर्थिक महत्व: इनसे हमें भोजन, चारा, ईंधन, औषधियाँ तथा अन्य आर्थिक महत्व के उत्पाद प्राप्त होते हैं।
    (B) वर्गीकरण:
    • द्विबीजपत्री (Dicotyledons): इनके बीजों में दो बीजपत्र होते हैं (जैसे- चना, मटर, आम)।
    • एकबीजपत्री (Monocotyledons): इनके बीजों में केवल एक बीजपत्र होता है (जैसे- गेहूँ, मक्का, चावल)।
    (C) जनन (Reproduction):
    • पुष्प: यह इनका लैंगिक अंग है। इसमें नर अंग 'पुंकेसर' (Stamen) और मादा अंग 'स्त्रीकेसर' (Pistil) होते हैं।
    • द्विनिषेचन (Double Fertilization): यह एंजियोस्पर्म का अद्वितीय गुण है। एक नर युग्मक अंड कोशिका से और दूसरा द्वितीयक केंद्रक से संलयन करता है।

    3. सारांश (Summary of Plant Kingdom)

    पादप जगत में शैवाल, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म आते हैं।

    • शैवाल: क्लोरोफिल युक्त, सरल, थैलासाभ और मुख्यतः जलीय। तीन वर्ग: क्लोरोफाइसी, फियोफाइसी, रोडोफाइसी।
    • ब्रायोफाइटा: पादप जगत के उभयचर। मुख्य शरीर युग्मकोद्भिद (Gametophyte) होता है। दो वर्ग: लिवरवर्ट और मॉस।
    • टेरिडोफाइटा: प्रथम संवहनी पादप। मुख्य शरीर बीजाणुद्भिद (Sporophyte) होता है। बीजाणु अंकुरित होकर 'प्रोथैलस' बनाते हैं। निषेचन के लिए जल आवश्यक।
    • जिम्नोस्पर्म: नग्न बीज वाले पौधे। निषेचन के बाद बीज अनावृत रहते हैं। विषम बीजाणु होते हैं।
    • एंजियोस्पर्म: पुष्पी पादप जिनमें बीज फल के अंदर सुरक्षित रहते हैं। द्विनिषेचन इनका मुख्य लक्षण है।

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