मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उत्पत्ति एवं सामान्य परिचय
- इस राजवंश का नाम इसके प्रतापी संस्थापक 'गुहिल' के नाम पर गुहिल वंश पड़ा। कालांतर में इसी राजवंश को 'गहलोत' वंश के नाम से भी जाना जाने लगा।
- यह विश्व का एकमात्र ऐसा राजवंश है जिसने एक ही क्षेत्र (मेवाड़) पर सबसे लंबे समय तक शासन किया। इस वंश के शासकों को सम्मानपूर्वक 'हिंदुआ सूरज' कहा जाता है।
- मेवाड़ के राजचिह्न पर अंकित वाक्य है— "जो दृढ़ राखे धर्म को, ताहि रखे करतार"।
- गुहिल वंश की उत्पत्ति के संबंध में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कर्नल जेम्स टॉड और श्यामलदास इन्हें गुजरात के वल्लभी नगर के शासकों से संबंधित मानते हैं।
- डॉ. डी.आर. भंडारकर ने आहड़ अभिलेख के आधार पर इन्हें ब्राह्मणों की संतान माना है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा और मुहणोत नैणसी ने भी इस मत का समर्थन किया है।
- अबुल फजल इन्हें ईरान के बादशाह नौशेरवाँ आदिल का वंशज बताता है, जबकि डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा और मुहणोत नैणसी ने इन्हें विशुद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय माना है।
- मुहणोत नैणसी और कर्नल जेम्स टॉड ने गुहिलों की कुल 24 शाखाओं का उल्लेख किया है।
गुहिल / गुहादित्य
- डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार, गुहिल ने लगभग 566 ई. में मेवाड़ क्षेत्र में इस राजवंश की नींव रखी थी, इसलिए इन्हें गुहिल वंश का संस्थापक माना जाता है।
- कर्नल जेम्स टॉड के विवरण के अनुसार, यह वल्लभी के राजा शिलादित्य और रानी पुष्पावती का पुत्र था। इसका जन्म एक गुफा (गुहा) में हुआ था और नागर ब्राह्मणों ने इसका पालन-पोषण किया, इसी कारण इसका नाम गुहादित्य या गुहिल पड़ा।
- इस प्रारंभिक शासक के प्राप्त सिक्के आगरा से मिले हैं। विभिन्न शिलालेखों से ज्ञात होता है कि गुहिल के बाद शील, अपराजित, भर्तृभट्ट, अल्लट, नरवाहन, शक्तिकुमार और विजय सिंह आदि शासक हुए।
बप्पा रावल (734 - 753 ई.)
- गुहिल के बाद इस वंश का प्रथम सबसे प्रतापी शासक बप्पा रावल हुआ। कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में बप्पा रावल को 'विप्र' (ब्राह्मण) कहकर संबोधित किया गया है।
- इन्होंने 'हिंदुआ सूरज' की गौरवशाली उपाधि धारण की थी।
- डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार, इनका वास्तविक नाम 'कालबोज' था और 'बप्पा रावल' इनकी उपाधि थी। वहीं, 'रणकपुर प्रशस्ति' में भ्रमवश बप्पा रावल और कालबोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है।
- प्रसिद्ध इतिहासकार सी.वी. वैद्य ने बप्पा रावल के सैन्य कौशल को देखते हुए उन्हें 'चार्ल्स मार्टेल' (फ्रांसीसी सेनापति) कहा है।
- राजप्रशस्ति के अनुसार, बप्पा रावल ने 734 ई. में चित्तौड़ के मौर्य शासक 'मान मोरी' को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार किया और मेवाड़ राज्य की सुदृढ़ स्थापना की। इन्होंने 'नागदा' को अपनी पहली राजधानी बनाया था।
- मुहणोत नैणसी और कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार, बप्पा रावल को यह राज्य पाशुपत संप्रदाय के गुरु 'हारीत ऋषि' के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ था।
- इन्होंने कैलाशपुरी (उदयपुर) में गुहिल वंश के कुलदेवता 'एकलिंग जी' (भगवान शिव) के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। ये एकलिंग जी को ही मेवाड़ का वास्तविक शासक मानते थे और स्वयं को उनका दीवान मानकर शासन करते थे।
- राजस्थान में सर्वप्रथम सोने के सिक्के चलाने का श्रेय बप्पा रावल को ही जाता है। इनके समय का 115 ग्रेन का एक स्वर्ण सिक्का प्राप्त हुआ है, जिस पर शिव, नंदी, त्रिशूल, कामधेनु आदि के चित्र अंकित हैं।
- बप्पा रावल की समाधि/मंदिर नागदा में स्थित है।
अल्लट (951 - 953 ई.)
- विभिन्न ख्यातों और ऐतिहासिक साक्ष्यों में इन्हें 'आलू रावल' के नाम से भी जाना जाता है।
- इन्होंने नागदा के साथ-साथ 'आहड़' को अपनी दूसरी राजधानी बनाया और वहाँ एक प्रसिद्ध वराह मंदिर का निर्माण करवाया।
- मेवाड़ के इतिहास में सबसे पहले सुव्यवस्थित 'नौकरशाही' (प्रशासनिक व्यवस्था) का गठन करने का श्रेय अल्लट को ही दिया जाता है।
- इन्होंने शक्तिशाली राष्ट्रकूटों को युद्ध में पराजित किया था और कूटनीतिक संबंध बनाते हुए हूण राजकुमारी 'हरिया देवी' के साथ विवाह किया था।
शक्तिकुमार (977 - 993 ई.)
- इनके शासनकाल में मालवा के परमार शासक मुंज ने आक्रमण कर मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी आहड़ को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। इस विनाश के कारण शक्तिकुमार को पुनः नागदा को अपनी राजधानी बनाना पड़ा।
- कालांतर में परमार शासक भोज ने चित्तौड़ दुर्ग में प्रसिद्ध 'त्रिभुवन नारायण मंदिर' का निर्माण करवाया था।
- शक्तिकुमार के उत्तराधिकारी अंबाप्रसाद हुए। प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ 'पृथ्वीराज विजय' के अनुसार, अजमेर के चौहान राजा वाक्पतिराज द्वितीय ने अंबाप्रसाद को युद्ध में पराजित किया था।
कर्णसिंह / रणसिंह
- इन्होंने अपनी सुरक्षा और सैन्य दृष्टि से आहोर के पर्वत पर एक मजबूत किले का निर्माण करवाया था।
- रणसिंह के दो पुत्र हुए— क्षेमसिंह और राहप। यहीं से गुहिल राजवंश दो प्रमुख ऐतिहासिक शाखाओं में विभाजित हो गया। क्षेमसिंह ने 'रावल शाखा' की शुरुआत की और राहप ने सिसोदा ग्राम बसाकर 'राणा शाखा' (सिसोदिया) का आरंभ किया।
- रावल शाखा के क्षेमसिंह के दो पुत्र हुए— कुमारसिंह और सामंतसिंह प्रथम। सामंतसिंह का विवाह अजमेर के प्रतापी चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान द्वितीय की बहन पृथ्वीबाई से हुआ था।
- नाडोल (जालोर) के चौहान शासक कीर्तिपाल चौहान (कीतू) ने सामंतसिंह को पराजित कर मेवाड़ पर अधिकार कर लिया था।
- मेवाड़ छिन जाने के बाद सामंतसिंह ने 1178 ई. में 'वागड़ क्षेत्र' (डूंगरपुर-बांसवाड़ा) में जाकर एक नवीन गुहिल राजवंश की स्थापना की। इसी सामंतसिंह ने 1192 ई. के प्रसिद्ध तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की ओर से लड़ते हुए अपना बलिदान दिया था।
- बाद में सामंतसिंह के भाई मथनसिंह (कुमारसिंह) ने कीर्तिपाल चौहान को युद्ध में पराजित कर मेवाड़ पर पुनः अधिकार कर लिया और रावल शाखा के शासन को सुरक्षित रखा।
जैत्रसिंह (1213 - 1250 ई.)
- इन्होंने परमारों को अंतिम रूप से पराजित कर चित्तौड़गढ़ पर स्थायी अधिकार कर लिया और नागदा के स्थान पर चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की नई राजधानी बनाया।
- भूताला का युद्ध (1227 ई.): यह ऐतिहासिक युद्ध जैत्रसिंह और दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इल्तुतमिश की सेना के मध्य लड़ा गया, जिसमें जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को बुरी तरह पराजित कर खदेड़ दिया। इस विजय का प्रामाणिक उल्लेख जयसिंह सूरि के प्रसिद्ध ग्रंथ 'हम्मीर मदमर्दन' में मिलता है।
- फारसी इतिहासकार फरिश्ता की पुस्तक 'तारीख-ए-फरिश्ता' में भी इल्तुतमिश के चित्तौड़ पर हुए इस असफल आक्रमण का स्पष्ट जिक्र मिलता है।
- 1248 ई. में इन्होंने दिल्ली के एक और सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद की सेना को भी करारी शिकस्त दी थी।
- जैत्रसिंह की इन महान और निरंतर सैन्य सफलताओं के पीछे उनके दो वीर सेनापतियों— बालक और मदन का सबसे प्रमुख योगदान था।
- चीरवा अभिलेख में इनकी वीरता का यशोगान करते हुए लिखा गया है कि जैत्रसिंह इतने शक्तिशाली शासक थे कि मालवा, गुजरात, मारवाड़ तथा दिल्ली के सुल्तान भी उन्हें पराजित नहीं कर सके।
- प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इन्हें 'रण रसिक' (युद्ध का प्रेमी) तथा डॉ. दशरथ शर्मा ने इन्हें 'मेवाड़ की नव शक्ति का संचारक' कहकर सम्मानित किया है।
तेजसिंह (1250 - 1273 ई.)
- इनके शासनकाल में 1260 ई. में चित्रकार कमलचंद्र द्वारा 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' नामक महत्वपूर्ण ग्रंथ चित्रित किया गया। यह मेवाड़ चित्रकला शैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ माना जाता है (जो ताड़पत्र पर चित्रित किया गया था)।
- दिल्ली सल्तनत के शक्तिशाली और क्रूर सुल्तान बलबन ने मेवाड़ पर आक्रमण किया था, परंतु तेजसिंह ने उस आक्रमण को पूर्णतः विफल कर दिया।
- तेजसिंह की रानी जैतल देवी ने चित्तौड़ दुर्ग में प्रसिद्ध 'श्याम पार्श्वनाथ मंदिर' का निर्माण करवाया था।
- इन्होंने अपने पराक्रम के बल पर 'उमापतिवार लब्ध प्रौढ़प्रताप', 'परमभट्टारक', 'महाराजाधिराज' और 'परमेश्वर' जैसी अत्यंत गौरवशाली राजशाही उपाधियाँ धारण की थीं।
रावल रतनसिंह (1301 - 1303 ई.)
- इन्होंने सिंहल द्वीप (श्रीलंका) के शासक गंधर्वसेन की पुत्री राजकुमारी पद्मिनी से विवाह किया था। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, 'हीरामन तोते' द्वारा रावल रतनसिंह को पद्मिनी के अद्वितीय सौंदर्य की जानकारी दी गई थी।
- अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण: मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा 1540 ई. में अवधी भाषा में रचित प्रसिद्ध ऐतिहासिक महाकाव्य 'पद्मावत' में इस भीषण आक्रमण का मुख्य कारण रानी पद्मिनी को प्राप्त करने की लालसा बताया गया है। एक तांत्रिक 'राघव चेतन' ने ही अलाउद्दीन को पद्मिनी के सौंदर्य के बारे में भड़काया था।
- 28 जनवरी, 1303 ई. को अलाउद्दीन खिलजी एक विशाल सेना के साथ दिल्ली से चित्तौड़ के लिए रवाना हुआ और 8 महीने के लंबे घेरे के बाद 26 अगस्त, 1303 ई. को उसने चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर पूर्णतः अधिकार कर लिया। इस आक्रमण के समय प्रसिद्ध फारसी इतिहासकार अमीर खुसरो भी उसके साथ मौजूद था।
- इसी समय 'चित्तौड़ का प्रथम साका' (और राजस्थान का दूसरा साका) संपन्न हुआ। इसमें रावल रतनसिंह के नेतृत्व में राजपूत योद्धाओं ने केसरिया किया और रानी पद्मिनी ने 1600 क्षत्राणियों के साथ अग्नि में कूदकर जौहर किया।
- इस ऐतिहासिक संघर्ष में रानी पद्मिनी के काका और भाई— 'गोरा और बादल' अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- विजय के पश्चात् अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ में लगभग 30,000 निर्दोष नागरिकों का भयानक कत्लेआम करवाया (जिसका स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक 'खजाइन-उल-फुतूह' में किया है)।
- अलाउद्दीन ने अपने पुत्र 'खिज्र खाँ' को चित्तौड़ का प्रशासक नियुक्त किया और चित्तौड़ का नाम बदलकर 'खिज्राबाद' रख दिया।
- अलाउद्दीन ने चित्तौड़गढ़ की तलहटी में एक मकबरा बनवाया, जिसमें 1310 ई. का एक फारसी शिलालेख लगा है। इस शिलालेख में अलाउद्दीन खिलजी को 'उस समय का सूर्य, ईश्वर की छाया और संसार का रक्षक' कहकर महिमामंडित किया गया है।
- 1316 ई. में अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् 1316 ई. से 1326 ई. तक जालोर का 'मालदेव सोनगरा' (मूँछाला मालदेव) चित्तौड़ का प्रशासक रहा।
- रावल रतनसिंह मेवाड़ के गुहिल वंश की 'रावल शाखा के अंतिम शासक' सिद्ध हुए।
राणा हम्मीर (1326 - 1364 ई.)
- ये 'सिसोदा ठिकाने' के जागीरदार अरिसिंह के पुत्र थे और मेवाड़ की 'राणा अथवा सिसोदिया शाखा के प्रथम शासक' बने।
- राणा हम्मीर ने 1326 ई. में मालदेव सोनगरा के पुत्रों को पराजित कर चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर लिया और गुहिल वंश की पुनर्स्थापना की।
- सिसोदा ग्राम के जागीरदार होने के कारण इन्हें 'सिसोदिया' कहा गया और यहीं से संपूर्ण गुहिल वंश 'सिसोदिया वंश' के नाम से विश्व-विख्यात हो गया।
- चूँकि हम्मीर राणा शाखा के राजपूत थे, इसलिए इनके बाद मेवाड़ के सभी प्रतापी शासक अपने नाम के आगे 'राणा या महाराणा' लगाने लगे।
- उपाधियाँ: संकटकाल में मेवाड़ को स्वतंत्र कराने के कारण इन्हें 'मेवाड़ का उद्धारक' कहा जाता है। इसके अलावा 'कुंभलगढ़ प्रशस्ति' में इन्हें 'विषमघाटी पंचानन' (विकट आक्रमणों में शेर के समान) की सर्वोच्च उपाधि दी गई है।
- सिंगोली का युद्ध: यह ऐतिहासिक युद्ध बाँसवाड़ा के समीप सिंगोली नामक स्थान पर लड़ा गया, जिसमें राणा हम्मीर ने दिल्ली के शक्तिशाली सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की शाही सेना को बुरी तरह पराजित किया था।
- इन्होंने अपनी कुलदेवी के सम्मान में चित्तौड़ दुर्ग के भीतर 'अन्नपूर्णा माता' (बरवड़ी माता) के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था।
महाराणा खेता / क्षेत्रसिंह (1364 - 1382 ई.)
- ये राणा हम्मीर के पुत्र व उत्तराधिकारी थे। इन्होंने मालवा के शासक दिलावर खाँ गौरी को युद्ध में पराजित कर अपनी वीरता का परिचय दिया था।
- इसी युद्ध के साथ ही इतिहास-प्रसिद्ध 'मेवाड़-मालवा संघर्ष' (जो आगे चलकर कई पीढ़ियों तक चला) का विधिवत आरंभ हुआ था।
- महाराणा खेता ने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर अजमेर, जहाजपुर (भीलवाड़ा), मांडल तथा छप्पन के मैदान (बाँसवाड़ा-प्रतापगढ़) के विस्तृत क्षेत्रों को जीतकर अपने मेवाड़ साम्राज्य में मिला लिया था और राज्य का बहुत विस्तार किया था।
महाराणा लाखा / लक्षसिंह (1382 - 1421 ई.)
- ये राणा हम्मीर के पौत्र व महाराणा खेता के पुत्र थे। इन्होंने बूंदी के राव बैरसिंह हाड़ा को मेवाड़ का प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए विवश किया था।
- इनके शासनकाल में मेवाड़ के 'जावर' क्षेत्र में चाँदी व जस्ते की खानों का पता लगा, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हुई।
- एक 'पिछू' (छीतरमल) नामक चिड़ीमार बंजारे ने अपने बैल की याद में उदयपुर में प्रसिद्ध 'पिछोला झील' का निर्माण करवाया था।
- इन्होंने मारवाड़ के राव चूंडा राठौड़ की पुत्री हंसाबाई (रणमल की बहन) से वृद्धावस्था में इस शर्त पर विवाह किया कि हंसाबाई का पुत्र ही मेवाड़ का अगला महाराणा बनेगा।
- इस शर्त के कारण इनके ज्येष्ठ पुत्र कुंवर चूंडा ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और मेवाड़ का राज्य त्यागने की प्रतिज्ञा की, इसी कारण कुंवर चूंडा को 'मेवाड़ का भीष्म पितामह' कहा जाता है।
- इनके प्रमुख दरबारी विद्वान झोटिंग भट्ट और धनेश्वर भट्ट थे।
- महाराणा लाखा के साथ ही बूंदी के नकली दुर्ग (मिट्टी का किला) की प्रसिद्ध कथा जुड़ी हुई है, जिसकी रक्षा करते हुए बूंदी के कुम्भा हाड़ा ने अपना बलिदान दिया था।
महाराणा मोकल (1421 - 1433 ई.)
- ये महाराणा लाखा और हंसाबाई के पुत्र थे।
- इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग में स्थित 'त्रिभुवन नारायण मंदिर / समिद्धेश्वर मंदिर' (मूलतः परमार शासक भोज द्वारा निर्मित) का जीर्णोद्धार करवाया, इसलिए इस मंदिर को अब 'मोकल का मंदिर' भी कहा जाता है।
- इन्होंने कैलाशपुरी में 'एकलिंग जी के मंदिर के परकोटे' का निर्माण पूरा करवाया।
- रामपुरा का युद्ध (1428 ई.): भीलवाड़ा के रामपुरा में इन्होंने नागौर के शासक फिरोज खाँ को युद्ध में पराजित किया।
- जिलवाड़ा का युद्ध (1433 ई.): इस युद्ध में इन्होंने गुजरात के शासक अहमदशाह को पराजित किया।
- इसी जिलवाड़ा (झीलवाड़ा) नामक स्थान पर गुजरात अभियान के दौरान, मेवाड़ी सरदार चाचा और मेरा (महपा पंवार के साथ मिलकर) ने महाराणा मोकल की हत्या कर दी।
महाराणा कुम्भा (1433 - 1468 ई.)
- ये महाराणा मोकल और रानी सौभाग्यवती के पुत्र थे। इन्होंने मेवाड़ से राठौड़ों का अत्यधिक प्रभाव समाप्त किया और चित्तौड़गढ़ एवं कुंभलगढ़ को अपनी शक्ति का मुख्य केंद्र बनाया।
- 'कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति' में महाराणा कुम्भा की अनेक गौरवशाली उपाधियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं: अभिनव भरताचार्य (संगीत का परम ज्ञान होने के कारण), हिंदू सुरत्राण (हिंदुओं का रक्षक शासक), छाप गुरु (छापामार/गुरिल्ला युद्ध में निपुण), हाल गुरु (पहाड़ी दुर्गों का निर्माता), राणे रासो (साहित्यकारों को आश्रय देने के कारण), टोडरमल (संगीत की 3 विधाओं में पारंगत), नाटकराज कर्ता (4 नाटकों का रचयिता) और चाप गुरु (धनुर्विद्या में पारंगत)।
- इनके अलावा इन्हें राणा राय, राजगुरु, दान गुरु, शैल गुरु, नरपति, अश्वपति और गजपति आदि उपाधियाँ भी प्राप्त थीं।
- कविराज श्यामलदास के ग्रंथ 'वीर विनोद' के अनुसार, महाराणा कुम्भा ने मेवाड़ के 84 दुर्गों में से सर्वाधिक 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था (जैसे- कुंभलगढ़, बसंती दुर्ग, भौमट दुर्ग, मचान दुर्ग, अचलगढ़ दुर्ग आदि)।
- कुंभलगढ़ दुर्ग: इस अजेय दुर्ग का मुख्य शिल्पी (वास्तुकार) मंडन था। इस दुर्ग के सबसे ऊँचे भाग 'कटारगढ़' (अंतर्दुर्ग) को 'मेवाड़ की आँख' कहा जाता है, जो कुम्भा का निजी निवास था। इतिहासकार अबुल फजल ने इसके बारे में लिखा है कि "यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर की पगड़ी गिर जाती है।"
- प्रमुख मंदिर निर्माण: इन्होंने चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और अचलगढ़ तीनों दुर्गों में 'कुंभश्याम मंदिर' का निर्माण करवाया। इसके अलावा विष्णु मंदिर और बदनोर (भीलवाड़ा) में 'कुशाल माता मंदिर' बनवाया।
- इनके काल में 1439 ई. में धरणक शाह (धन्ना सेठ) द्वारा मथाई नदी के किनारे प्रसिद्ध 'रणकपुर जैन मंदिर' (पाली) का निर्माण करवाया गया।
- प्रमुख दरबारी विद्वान:
- मंडन: इसने देव मूर्ति प्रकरण, प्रासाद मंडन, राजवल्लभ, रूप मंडन, वास्तु मंडन, वास्तु शास्त्र और कोदंड मंडन (धनुर्विद्या पर) आदि ग्रंथों की रचना की।
- नाथा: यह मंडन का भाई था, इसने 'वास्तु मंजरी' ग्रंथ लिखा।
- गोविंद: यह मंडन का पुत्र था, इसने 'उद्धार धोरणी', 'द्वार दीपिका' और 'कलानिधि' की रचना की।
- अन्य विद्वान: मुनि सुंदर सूरि, टिल्ला भट्ट, जय शेखर, भुवन कीर्ति, सोम सुंदर, जयचंद्र सूरि, और सोमदेव।
- महाराणा कुम्भा की स्वयं की रचनाएँ: संगीत राज (5 भागों में विभक्त सबसे सिरमौर ग्रंथ), संगीत मीमांसा, संगीत रत्नाकर की टीका, चंडी शतक की टीका, और गीत गोविंद पर 'रसिकप्रिया' नामक रसिक टीका।
महाराणा कुम्भा के प्रमुख सैन्य अभियान व कूटनीति
- सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): कुम्भा ने मालवा के शासक महमूद खिलजी प्रथम को युद्ध में बुरी तरह पराजित कर बंदी बना लिया। इस महान विजय के उपलक्ष्य में इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग में 9 मंजिला 'विजय स्तंभ' (कीर्ति स्तंभ) का निर्माण करवाया। इसकी 'कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति' की रचना कवि अत्रि ने शुरू की और उनके पुत्र महेश ने इसे पूरा किया।
- आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.): यह ऐतिहासिक संधि मारवाड़ के राव जोधा और महाराणा कुम्भा के बीच हंसाबाई की मध्यस्थता से हुई। इसमें 'सोजत' (पाली) को मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा मान लिया गया। इसके तहत जोधा की पुत्री शृंगारदेवी का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल से हुआ।
- कुम्भा ने नागौर पर आक्रमण कर वहाँ के शासक शम्स खाँ को पराजित कर अधिकार किया।
- चंपानेर की संधि (1456 ई.): यह संधि मालवा के शासक महमूद खिलजी प्रथम और गुजरात के शासक कुतुबुद्दीन के मध्य महाराणा कुम्भा को हराने के लिए हुई थी। लेकिन 1457 ई. (बदनोर के युद्ध) में कुम्भा ने इन दोनों की संयुक्त सेना को भी बुरी तरह पराजित कर दिया।
- इन्होंने सिरोही के शासक सहसमल को पराजित कर आबू पर अधिकार कायम कर लिया था।
उदा / उदयकरण (मेवाड़ का पितृहंता)
- अपने जीवन के अंतिम समय में महाराणा कुम्भा 'उन्माद रोग' से ग्रसित हो गए थे।
- 1468 ई. में कुम्भा के ही ज्येष्ठ पुत्र उदा (उदयकरण) ने कुंभलगढ़ दुर्ग के कटारगढ़ में 'मामदेव कुंड' के पास कुम्भा की हत्या कर दी। इसी कारण उदा को 'मेवाड़ का पितृहंता शासक' कहा जाता है।
- कुम्भा की हत्या के बाद उदा मेवाड़ का शासक बना, लेकिन मेवाड़ी सरदारों ने उसे स्वीकार नहीं किया।
- दाड़िमपुर का युद्ध: यह युद्ध पितृहंता उदा और उसके छोटे भाई रायमल के मध्य लड़ा गया। इसमें उदा बुरी तरह पराजित हुआ।
- पराजय के बाद उदा भागकर मालवा (मांडू) की ओर चला गया, जहाँ आकाशीय बिजली गिरने से उसकी मृत्यु हो गई।
महाराणा लाखा / लक्षसिंह (1382 - 1421 ई.)
- ये राणा हम्मीर के पौत्र व महाराणा खेता के पुत्र थे। इन्होंने बूंदी के राव बैरसिंह हाड़ा को मेवाड़ का प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए विवश किया था।
- इनके शासनकाल में मेवाड़ के 'जावर' क्षेत्र में चाँदी व जस्ते की खानों का पता लगा, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हुई।
- एक 'पिछू' (छीतरमल) नामक चिड़ीमार बंजारे ने अपने बैल की याद में उदयपुर में प्रसिद्ध 'पिछोला झील' का निर्माण करवाया था।
- इन्होंने मारवाड़ के राव चूंडा राठौड़ की पुत्री हंसाबाई (रणमल की बहन) से वृद्धावस्था में इस शर्त पर विवाह किया कि हंसाबाई का पुत्र ही मेवाड़ का अगला महाराणा बनेगा।
- इस शर्त के कारण इनके ज्येष्ठ पुत्र कुंवर चूंडा ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और मेवाड़ का राज्य त्यागने की प्रतिज्ञा की, इसी कारण कुंवर चूंडा को 'मेवाड़ का भीष्म पितामह' कहा जाता है।
- इनके प्रमुख दरबारी विद्वान झोटिंग भट्ट और धनेश्वर भट्ट थे।
- महाराणा लाखा के साथ ही बूंदी के नकली दुर्ग (मिट्टी का किला) की प्रसिद्ध कथा जुड़ी हुई है, जिसकी रक्षा करते हुए बूंदी के कुम्भा हाड़ा ने अपना बलिदान दिया था।
महाराणा मोकल (1421 - 1433 ई.)
- ये महाराणा लाखा और हंसाबाई के पुत्र थे।
- इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग में स्थित 'त्रिभुवन नारायण मंदिर / समिद्धेश्वर मंदिर' (मूलतः परमार शासक भोज द्वारा निर्मित) का जीर्णोद्धार करवाया, इसलिए इस मंदिर को अब 'मोकल का मंदिर' भी कहा जाता है।
- इन्होंने कैलाशपुरी में 'एकलिंग जी के मंदिर के परकोटे' का निर्माण पूरा करवाया।
- रामपुरा का युद्ध (1428 ई.): भीलवाड़ा के रामपुरा में इन्होंने नागौर के शासक फिरोज खाँ को युद्ध में पराजित किया।
- जिलवाड़ा का युद्ध (1433 ई.): इस युद्ध में इन्होंने गुजरात के शासक अहमदशाह को पराजित किया।
- इसी जिलवाड़ा (झीलवाड़ा) नामक स्थान पर गुजरात अभियान के दौरान, मेवाड़ी सरदार चाचा और मेरा (महपा पंवार के साथ मिलकर) ने महाराणा मोकल की हत्या कर दी।
महाराणा कुम्भा (1433 - 1468 ई.)
- ये महाराणा मोकल और रानी सौभाग्यवती के पुत्र थे। इन्होंने मेवाड़ से राठौड़ों का अत्यधिक प्रभाव समाप्त किया और चित्तौड़गढ़ एवं कुंभलगढ़ को अपनी शक्ति का मुख्य केंद्र बनाया।
- 'कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति' में महाराणा कुम्भा की अनेक गौरवशाली उपाधियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं: अभिनव भरताचार्य (संगीत का परम ज्ञान होने के कारण), हिंदू सुरत्राण (हिंदुओं का रक्षक शासक), छाप गुरु (छापामार/गुरिल्ला युद्ध में निपुण), हाल गुरु (पहाड़ी दुर्गों का निर्माता), राणे रासो (साहित्यकारों को आश्रय देने के कारण), टोडरमल (संगीत की 3 विधाओं में पारंगत), नाटकराज कर्ता (4 नाटकों का रचयिता) और चाप गुरु (धनुर्विद्या में पारंगत)।
- इनके अलावा इन्हें राणा राय, राजगुरु, दान गुरु, शैल गुरु, नरपति, अश्वपति और गजपति आदि उपाधियाँ भी प्राप्त थीं।
- कविराज श्यामलदास के ग्रंथ 'वीर विनोद' के अनुसार, महाराणा कुम्भा ने मेवाड़ के 84 दुर्गों में से सर्वाधिक 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था (जैसे- कुंभलगढ़, बसंती दुर्ग, भौमट दुर्ग, मचान दुर्ग, अचलगढ़ दुर्ग आदि)।
- कुंभलगढ़ दुर्ग: इस अजेय दुर्ग का मुख्य शिल्पी (वास्तुकार) मंडन था। इस दुर्ग के सबसे ऊँचे भाग 'कटारगढ़' (अंतर्दुर्ग) को 'मेवाड़ की आँख' कहा जाता है, जो कुम्भा का निजी निवास था। इतिहासकार अबुल फजल ने इसके बारे में लिखा है कि "यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर की पगड़ी गिर जाती है।"
- प्रमुख मंदिर निर्माण: इन्होंने चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और अचलगढ़ तीनों दुर्गों में 'कुंभश्याम मंदिर' का निर्माण करवाया। इसके अलावा विष्णु मंदिर और बदनोर (भीलवाड़ा) में 'कुशाल माता मंदिर' बनवाया।
- इनके काल में 1439 ई. में धरणक शाह (धन्ना सेठ) द्वारा मथाई नदी के किनारे प्रसिद्ध 'रणकपुर जैन मंदिर' (पाली) का निर्माण करवाया गया।
- प्रमुख दरबारी विद्वान:
- मंडन: इसने देव मूर्ति प्रकरण, प्रासाद मंडन, राजवल्लभ, रूप मंडन, वास्तु मंडन, वास्तु शास्त्र और कोदंड मंडन (धनुर्विद्या पर) आदि ग्रंथों की रचना की।
- नाथा: यह मंडन का भाई था, इसने 'वास्तु मंजरी' ग्रंथ लिखा।
- गोविंद: यह मंडन का पुत्र था, इसने 'उद्धार धोरणी', 'द्वार दीपिका' और 'कलानिधि' की रचना की।
- अन्य विद्वान: मुनि सुंदर सूरि, टिल्ला भट्ट, जय शेखर, भुवन कीर्ति, सोम सुंदर, जयचंद्र सूरि, और सोमदेव।
- महाराणा कुम्भा की स्वयं की रचनाएँ: संगीत राज (5 भागों में विभक्त सबसे सिरमौर ग्रंथ), संगीत मीमांसा, संगीत रत्नाकर की टीका, चंडी शतक की टीका, और गीत गोविंद पर 'रसिकप्रिया' नामक रसिक टीका।
महाराणा कुम्भा के प्रमुख सैन्य अभियान व कूटनीति
- सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): कुम्भा ने मालवा के शासक महमूद खिलजी प्रथम को युद्ध में बुरी तरह पराजित कर बंदी बना लिया। इस महान विजय के उपलक्ष्य में इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग में 9 मंजिला 'विजय स्तंभ' (कीर्ति स्तंभ) का निर्माण करवाया। इसकी 'कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति' की रचना कवि अत्रि ने शुरू की और उनके पुत्र महेश ने इसे पूरा किया।
- आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.): यह ऐतिहासिक संधि मारवाड़ के राव जोधा और महाराणा कुम्भा के बीच हंसाबाई की मध्यस्थता से हुई। इसमें 'सोजत' (पाली) को मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा मान लिया गया। इसके तहत जोधा की पुत्री शृंगारदेवी का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल से हुआ।
- कुम्भा ने नागौर पर आक्रमण कर वहाँ के शासक शम्स खाँ को पराजित कर अधिकार किया।
- चंपानेर की संधि (1456 ई.): यह संधि मालवा के शासक महमूद खिलजी प्रथम और गुजरात के शासक कुतुबुद्दीन के मध्य महाराणा कुम्भा को हराने के लिए हुई थी। लेकिन 1457 ई. (बदनोर के युद्ध) में कुम्भा ने इन दोनों की संयुक्त सेना को भी बुरी तरह पराजित कर दिया।
- इन्होंने सिरोही के शासक सहसमल को पराजित कर आबू पर अधिकार कायम कर लिया था।
उदा / उदयकरण (मेवाड़ का पितृहंता)
- अपने जीवन के अंतिम समय में महाराणा कुम्भा 'उन्माद रोग' से ग्रसित हो गए थे।
- 1468 ई. में कुम्भा के ही ज्येष्ठ पुत्र उदा (उदयकरण) ने कुंभलगढ़ दुर्ग के कटारगढ़ में 'मामदेव कुंड' के पास कुम्भा की हत्या कर दी। इसी कारण उदा को 'मेवाड़ का पितृहंता शासक' कहा जाता है।
- कुम्भा की हत्या के बाद उदा मेवाड़ का शासक बना, लेकिन मेवाड़ी सरदारों ने उसे स्वीकार नहीं किया।
- दाड़िमपुर का युद्ध: यह युद्ध पितृहंता उदा और उसके छोटे भाई रायमल के मध्य लड़ा गया। इसमें उदा बुरी तरह पराजित हुआ।
- पराजय के बाद उदा भागकर मालवा (मांडू) की ओर चला गया, जहाँ आकाशीय बिजली गिरने से उसकी मृत्यु हो गई।
महाराणा रायमल (1473 - 1509 ई.)
- इनके तीन प्रमुख पुत्र पृथ्वीराज, जयमल और सांगा (संग्राम सिंह) थे। इनकी पुत्री आनंदा बाई का विवाह सिरोही के जगमाल के साथ हुआ था।
- ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज का विवाह टोडा के राव सुरताण की पुत्री 'तारा' के साथ हुआ था। पृथ्वीराज ने अपनी पत्नी तारा के नाम पर ही अजमेर के किले का नाम 'तारागढ़' रखा था।
- पृथ्वीराज को उसकी तेज धावक क्षमता के कारण इतिहास में 'उड़ना राजकुमार' के नाम से जाना जाता है। इसकी हत्या इसके बहनोई जगमाल ने विष (जहर) पिलाकर कर दी थी।
- दूसरे पुत्र जयमल की हत्या उसके दुर्व्यवहार के कारण टोडा के राव सुरताण ने कर दी थी।
- उत्तराधिकार के आरंभिक संघर्ष में भाइयों से पराजित होकर सांगा ने अजमेर के 'करमचंद पंवार' के पास अज्ञातवास में शरण ली थी।
- महाराणा रायमल ने कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए 'राम' और 'शंकर' नामक तालाबों का निर्माण करवाया और चित्तौड़ दुर्ग में 'अद्भुतजी के मंदिर' का निर्माण करवाया।
- इनकी रानी शृंगार देवी (राव जोधा की पुत्री) ने चित्तौड़ में प्रसिद्ध 'घोसुंडी की बावड़ी' का निर्माण करवाया था।
महाराणा सांगा / संग्राम सिंह (1509 - 1528 ई.)
- प्रमुख उपाधियाँ: राजपूताने के सभी शासकों को एक झंडे के नीचे लाने के कारण इन्हें 'हिंदूपथ' तथा शरीर पर 80 घाव होने के कारण कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें 'सैनिक भग्नावशेष' (सैनिक का अंश) की उपाधि दी थी।
- समकालीन शासक: इनके समय दिल्ली में सिकंदर लोदी, इब्राहिम लोदी व बाबर; मालवा में नासिरुद्दीन खिलजी व महमूद खिलजी द्वितीय; और गुजरात में महमूद बेगड़ा व मुजफ्फर शाह द्वितीय का शासन था।
- खातौली का युद्ध (1517 ई., कोटा): सांगा ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को बुरी तरह पराजित किया (इस युद्ध में लोदी ने स्वयं भाग लिया था)।
- बाड़ी का युद्ध (1518 ई., धौलपुर): सांगा ने पुनः इब्राहिम लोदी की सेना को हराया, जिसका नेतृत्व मियां हुसैन और मियां माखन कर रहे थे।
- गागरोन का युद्ध (1519 ई., झालावाड़): सांगा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय को पराजित कर बंदी बना लिया था। 1520 ई. में सांगा ने गुजरात के शासक को भी पराजित किया।
- बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई., भरतपुर): सांगा की सेना ने बाबर की सेना को बुरी तरह खदेड़कर पराजित किया।
- खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई.): यह ऐतिहासिक युद्ध भरतपुर की रूपवास तहसील में लड़ा गया। इस युद्ध में बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया।
- खानवा युद्ध से पूर्व बाबर की कूटनीति: काबुल के ज्योतिषी मोहम्मद शरीफ ने बाबर की हार की भविष्यवाणी की थी। सेना में जोश भरने के लिए बाबर ने जोशीला भाषण दिया, युद्ध को 'जिहाद' (धर्मयुद्ध) घोषित किया और मुस्लिम व्यापारियों पर लगने वाला 'तमगा कर' (चुंगी) हटा दिया।
- युद्ध पद्धति व तोपखाना: खानवा के युद्ध में बाबर ने 'तुलुगमा युद्ध पद्धति' और तोपखाने का प्रयोग किया। उसके तोपखाने के अध्यक्ष मुस्तफा कमाल और उस्ताद अली थे। बाबर की सेना का नेतृत्व हुमायूँ और मेंहदी ख्वाजा कर रहे थे।
- पाती परवन प्रथा: युद्ध से पूर्व राणा सांगा ने इस प्राचीन राजपूत प्रथा को पुनर्जीवित किया और राजपूताने के सभी हिंदू शासकों को मुगलों के विरुद्ध युद्ध में आमंत्रित किया।
- सांगा के पक्ष में लड़े प्रमुख शासक/सरदार: आमेर से पृथ्वीराज कछवाहा, मारवाड़ से मालदेव (राव गांगा का पुत्र), बीकानेर से कल्याणमल (राव जैतसी का पुत्र), मेड़ता से वीरमदेव, चंदेरी से मेदिनीराय, ईडर से भारमल, वागड़ से उदयसिंह, और जगनेर से अशोक परमार शामिल हुए।
- मुस्लिम सेनापति: मेवात का हसन खाँ मेवाती और इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी सांगा के पक्ष में लड़े।
- राजचिह्न धारण: खानवा के युद्ध में सांगा के गंभीर रूप से घायल होने पर, काठियावाड़ (सादड़ी) के 'झाला अज्जा' ने उनका राजचिह्न व मुकुट धारण कर युद्ध का नेतृत्व किया (गोगुंदा के झाला सज्जा भी उपस्थित थे)।
- घायल सांगा को मारवाड़ के राव मालदेव युद्धभूमि से निकालकर 'बसवा' (दौसा) ले गए। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें रणथम्भौर ले जाया गया।
- मृत्यु व समाधि: चंदेरी के युद्ध (1528 ई.) में सहायता के लिए जाते समय 'कालपी' (उत्तर प्रदेश) नामक स्थान पर उनके ही कुछ सरदारों ने उन्हें विष दे दिया। 30 जनवरी 1528 ई. को बसवा (दौसा) में सांगा की मृत्यु हुई, जहाँ उनका स्मारक (चबूतरा) बना है।
- सांगा का अंतिम संस्कार मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में किया गया, जहाँ अशोक परमार द्वारा निर्मित '8 खंभों की छतरी' स्थित है।
- उत्तराधिकारी व परिवार: सांगा के सबसे बड़े पुत्र भोजराज का विवाह मेड़ता के रतनसिंह की पुत्री मीराबाई से हुआ था। सांगा के अन्य पुत्र रतनसिंह द्वितीय, विक्रमादित्य और उदयसिंह थे।
- इतिहासकारों का मत: बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि "सांगा ने अपने देश की रक्षा में एक आँख, एक हाथ और एक पैर खो दिया।" कर्नल टॉड के अनुसार 7 उच्च श्रेणी के राजा, 9 राव और 104 सरदार सदैव सांगा की सेवा में उपस्थित रहते थे। हरविलास शारदा ने इन्हें मेवाड़ का सर्वाधिक प्रतापी शासक बताया।
महाराणा रतनसिंह (1528 - 1531 ई.)
- ये महाराणा सांगा और रानी धनबाई के पुत्र थे जो सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ के शासक बने।
- ये 1531 ई. में बूंदी के जंगलों में 'अहेरिया उत्सव' (शिकार उत्सव) के दौरान बूंदी के शासक सूरजमल हाड़ा के साथ हुए आपसी विवाद और युद्ध में लड़ते हुए मारे गए।
महाराणा विक्रमादित्य (1528 - 1536 ई.)
- ये महाराणा सांगा और हाड़ी रानी कर्णावती (कर्मवती) के पुत्र थे। अल्पायु होने के कारण राजकाज में इनकी मुख्य संरक्षिका रानी कर्णावती ही थीं।
- इनके शासनकाल में गुजरात के मुस्लिम शासक 'बहादुर शाह' ने चित्तौड़ पर दो बार (1533 ई. तथा 1534 ई. में) भयंकर आक्रमण किया।
- 1534 ई. के दूसरे आक्रमण से पूर्व, रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी थी, परंतु हुमायूँ ने समय पर कोई सहायता नहीं की।
- बहादुर शाह के लंबे घेरे के बाद 1535 ई. में चित्तौड़ का पतन हुआ। यह 'चित्तौड़गढ़ का दूसरा साका' था। इसमें रानी कर्णावती के नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने जौहर किया तथा देवलिया (प्रतापगढ़) के 'रावत बाघसिंह' के नेतृत्व में राजपूतों ने केसरिया किया।
- विक्रमादित्य ने अपनी भाभी मीराबाई को विष देकर और अन्य तरीकों से दो बार मारने का असफल प्रयास किया था। इससे दुखी होकर मीराबाई वृंदावन चली गईं, जहाँ उन्होंने संत रविदास (रैदास) को अपना गुरु बनाया।
- 1536 ई. में कुंवर पृथ्वीराज (उड़ना राजकुमार) की दासी 'पुतल दे' के दासी-पुत्र बनवीर ने धोखे से विक्रमादित्य की हत्या कर दी।
- बनवीर ने छोटे कुंवर उदयसिंह को भी मारने का प्रयास किया, परंतु स्वामीभक्त पन्नाधाय ने अपने ही पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह के प्राण बचाए।
- पन्नाधाय ने 'कीरत बारी' (पत्तल उठाने वाला) की सहायता से उदयसिंह को सुरक्षित कुंभलगढ़ दुर्ग पहुँचाया। उस समय कुंभलगढ़ का किलेदार 'आशा देवपुरा' था, जिसने उदयसिंह को शरण दी।
बनवीर (1536 - 1540 ई.)
- इसने विक्रमादित्य की हत्या कर चित्तौड़ पर अवैध रूप से अधिकार कर लिया था।
- इसने चित्तौड़ दुर्ग में 'नौलखा महल' (नौकोठा महल) और अपनी इष्टदेवी 'तुलजा भवानी का मंदिर' बनवाया।
- बाद में मारवाड़ के राव मालदेव की सैन्य सहायता से उदयसिंह ने बनवीर को (मावली के युद्ध में) पराजित कर मार डाला और चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर लिया।
महाराणा उदयसिंह (1537 - 1572 ई.)
- ये महाराणा सांगा और रानी कर्णावती के सबसे छोटे पुत्र थे। बनवीर से बचाकर पन्नाधाय ने इन्हें कीरत बारी की सहायता से कुंभलगढ़ (आशा देवपुरा के पास) पहुँचाया था, जहाँ 1537 ई. में इनका राज्याभिषेक हुआ।
- 1543 ई. में जब अफगान शासक शेरशाह सूरी ने आक्रमण किया, तो उदयसिंह ने युद्ध के बजाय चित्तौड़ दुर्ग की चाबियाँ शेरशाह को सौंपकर उसका प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। शेरशाह ने चित्तौड़ में ख्वास खाँ को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया। इस प्रकार उदयसिंह अफगानों की अधीनता स्वीकार करने वाले मेवाड़ के पहले शासक बने।
- हरमाड़ा का युद्ध (1557 ई.): यह युद्ध 'रंगराय' नामक वेश्या को लेकर उदयसिंह और अजमेर के हाकिम हाजी खाँ (पठान) के मध्य लड़ा गया था।
- 1559 ई. में इन्होंने 'उदयपुर' नामक नया नगर बसाया और वहाँ 'उदयसागर झील' का निर्माण करवाया।
- अकबर का आक्रमण (1567-68 ई.): अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया क्योंकि उदयसिंह ने मालवा के शासक बाज बहादुर और मेड़ता के जयमल राठौड़ को अपने यहाँ शरण दी थी।
- आक्रमण के समय उदयसिंह किले की रक्षा का भार अपने वीर सेनापतियों— जयमल और फत्ता (फतेहसिंह) को सौंपकर गोगुंदा/गिरवा की पहाड़ियों (उदयपुर) में सुरक्षित चले गए।
- चित्तौड़ किले की टूटी हुई दीवार की मरम्मत करवाते समय जयमल राठौड़, अकबर की 'संग्राम' नामक बंदूक की गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए।
- घायल जयमल ने अपने भतीजे कल्ला राठौड़ (जिन्हें चार हाथों वाले लोकदेवता कहा जाता है) के कंधों पर बैठकर भयंकर युद्ध किया।
- जयमल राठौड़ और फत्ता सिसोदिया बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। फत्ता की पत्नी रानी फूल कंवर के नेतृत्व में क्षत्राणियों ने जौहर किया। यह 'चित्तौड़ का तीसरा साका' था।
- फरवरी 1568 ई. में अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर अधिकार कर लिया और भीषण कत्लेआम करवाया।
- अकबर जयमल और फत्ता की अद्भुत वीरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने आगरा के दुर्ग के बाहर उनकी गजारूढ़ (हाथी पर सवार) पाषाण मूर्तियाँ लगवाईं। (इन वीरों की मूर्तियाँ बीकानेर के जूनागढ़ दुर्ग के बाहर भी स्थापित हैं)।
- मृत्यु: 28 फरवरी 1572 ई. को होली के दिन गोगुंदा में उदयसिंह का देहांत हो गया, वहीं उनकी छतरी बनी हुई है।
- कर्नल जेम्स टॉड ने इनके बारे में एक प्रसिद्ध टिप्पणी की है: "यदि सांगा और प्रताप के बीच में उदयसिंह न होता, तो मेवाड़ के इतिहास के पन्ने अधिक उज्ज्वल होते।"
महाराणा प्रताप (1572 - 1597 ई.)
- जन्म: 9 मई 1540 ई. (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, विक्रम संवत् 1597) को कुंभलगढ़ दुर्ग के अंतर्दुर्ग कटारगढ़ के 'बादल महल' (जूनी कचहरी) में हुआ था।
- माता-पिता: इनके पिता महाराणा उदयसिंह और माता जयवंता बाई सोनगरा (पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री) थीं।
- उपनाम: मेवाड़ के पर्वतीय (भील) क्षेत्रों में इन्हें प्यार से 'कीका' (छोटा बच्चा) कहा जाता था। इतिहास में इन्हें 'मेवाड़ केसरी' और 'हिंदुआ सूरज' के नाम से भी जाना जाता है।
- रानियाँ: इनकी पटरानी अजबदे पंवार (बिजोलिया के रामरख पंवार की पुत्री) थीं। अन्य प्रमुख रानी फूल कंवर (मारवाड़ के मालदेव के पुत्र राम की पुत्री) थीं।
- राजमहल की क्रांति: महाराणा उदयसिंह ने अपनी प्रिय रानी भटियाणी के प्रभाव में आकर प्रताप की जगह अपने छोटे पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। परंतु उदयसिंह के निधन के बाद, मेवाड़ के प्रमुख सरदारों (जैसे- कृष्णदास चूंडावत) और प्रताप के नाना अखैराज सोनगरा ने जगमाल को गद्दी से हटाकर राणा प्रताप को मेवाड़ का शासक बनाया। इसी घटना को 'राजमहल की क्रांति' कहा जाता है।
- राज्याभिषेक:
- प्रथम (अनौपचारिक) राज्याभिषेक: 28 फरवरी 1572 ई. को होली के दिन गोगुंदा (महादेव बावड़ी) में हुआ।
- विधिवत राज्याभिषेक: बाद में कुंभलगढ़ दुर्ग में पूरे राजसी समारोह के साथ इनका विधिवत राज्याभिषेक हुआ, जिसमें मारवाड़ के निर्वासित शासक राव चंद्रसेन भी उपस्थित हुए थे।
- प्रमुख पशु: महाराणा प्रताप के विश्व-प्रसिद्ध घोड़े का नाम 'चेतक' था। इनके प्रमुख हाथियों के नाम रामप्रसाद और लूणा थे।
- अकबर द्वारा भेजे गए 4 शांति-प्रस्तावक (शिष्टमंडल):
- जलाल खाँ कोरची (नवंबर 1572)
- मानसिंह कच्छवाहा (जून 1573) - सदाशिव रचित 'राजरत्नाकर' और रणछोड़ भट्ट रचित 'अमरकाव्यम् वंशावली' के अनुसार प्रताप ने मानसिंह का स्वागत उदयसागर झील की पाल पर किया था।
- भगवंत दास (अक्टूबर 1573)
- टोडरमल (दिसंबर 1573)
हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध (18 जून 1576 ई.)
- यह युद्ध राजसमंद जिले के हल्दीघाटी (खमनौर) नामक स्थान पर लड़ा गया। (इतिहासकार डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार यह युद्ध 21 जून 1576 ई. को हुआ था)।
- रणनीति एवं पड़ाव: अकबर ने इस युद्ध की व्यूह रचना अजमेर के 'मैगजीन दुर्ग' (अकबर का किला) में बनाई थी। मुगल सेनापति मानसिंह ने मोलेला गाँव (राजसमंद) में अपना पड़ाव डाला। वहीं, राणा प्रताप ने कुंभलगढ़ दुर्ग में अपनी योजना बनाई और अपना पड़ाव लोसिंग गाँव में डाला।
- सेना का नेतृत्व (प्रताप का पक्ष):
- हरावल (सेना का अग्रिम भाग): इसका नेतृत्व अफगान सेनापति हकीम खाँ सूरी ने किया।
- चंदावल (सेना का पिछला भाग): इसका नेतृत्व भील सरदार राणा पूंजा ने किया।
- अन्य प्रमुख वीर: रामशाह तोमर (ग्वालियर), झाला बीदा (मानसिंह), झाला मानसिंह, मानसिंह सोनगरा, कृष्णदास चूंडावत, भीमसिंह डोडिया, रावत सांगा आदि।
- सेना का नेतृत्व (मुगल पक्ष): हरावल का नेतृत्व सैयद हाशिम ने किया। मुख्य सेनापति मानसिंह के साथ आसफ खाँ, जगन्नाथ कच्छवाहा और मुहम्मद बख्शी रफी उपस्थित थे।
- आँखों देखा हाल: इस युद्ध में एकमात्र मुगल इतिहासकार 'अब्दुल कादिर बदायूँनी' उपस्थित था, जिसने अपनी पुस्तक 'मुन्तखब-उत-तवारीख' में हल्दीघाटी युद्ध का आँखों देखा वर्णन किया है।
- हल्दीघाटी युद्ध के अन्य नाम:
- मेवाड़ की थर्मोपल्ली: कर्नल जेम्स टॉड ने कहा।
- खमनौर का युद्ध: अबुल फजल ने कहा।
- गोगुंदा का युद्ध: बदायूँनी ने कहा।
- युद्ध की प्रमुख घटनाएँ:
- जब युद्ध में राणा प्रताप मुगलों से घिर गए और घायल हो गए, तब बड़ी सादड़ी के झाला बीदा ने प्रताप का राजचिह्न और मुकुट धारण कर लिया ताकि प्रताप सुरक्षित निकल सकें।
- युद्ध के दौरान मानसिंह के हाथी (मर्दाना) पर प्रहार करते समय राणा प्रताप का घोड़ा चेतक बुरी तरह घायल हो गया। युद्धभूमि से बाहर निकलते समय एक बरसाती नाले को पार करने के बाद चेतक की मृत्यु हो गई।
- बलीचा गाँव (राजसमंद) में वीर चेतक की समाधि (छतरी) बनी हुई है।
हल्दीघाटी के बाद के संघर्ष व अभियान
- भामाशाह का सहयोग: हल्दीघाटी युद्ध के बाद जब प्रताप के पास धन की कमी हो गई, तब चूलिया ग्राम में भामाशाह (पाली निवासी) और उनके भाई ताराचंद ने अपनी सारी निजी संपत्ति महाराणा को सौंप दी। इसी कारण भामाशाह को 'मेवाड़ का उद्धारक' और दानवीर कहा जाता है।
- शाहबाज खाँ के आक्रमण: अकबर ने अपने सेनापति शाहबाज खाँ को प्रताप के विरुद्ध तीन बार भेजा:
- 15 अक्टूबर 1577
- 15 दिसंबर 1578 (3 अप्रैल 1578 को शाहबाज खाँ ने कुंभलगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया था)।
- मई 1580 (यह अभियान असफल रहा)।
- राणा प्रताप ने बाद में कुंभलगढ़ पर पुनः अधिकार कर भान सोनगरा को किलेदार नियुक्त किया।
दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई.)
- इस ऐतिहासिक युद्ध में महाराणा प्रताप और उनके पुत्र कुंवर अमरसिंह ने मुगल थानेदार सुल्तान खाँ (अकबर का काका) का वध कर दिवेर पर अधिकार कर लिया।
- कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को प्रताप के शौर्य व 'गौरव का प्रतीक' और 'मेवाड़ का मैराथन' कहकर पुकारा है।
अंतिम अभियान और नई राजधानी
- दिसंबर 1584 ई. में अकबर ने जगन्नाथ कच्छवाहा के नेतृत्व में प्रताप के विरुद्ध अपना अंतिम सैन्य अभियान भेजा, जो पूर्णतः असफल रहा। (जगन्नाथ कच्छवाहा की मृत्यु मांडलगढ़ में हुई, जहाँ उनकी 32 खंभों की छतरी बनी है)।
- 1585 ई. से 1597 ई. के शांति काल में प्रताप ने चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोड़कर लगभग संपूर्ण मेवाड़ पर पुनः अधिकार कर लिया था।
- 1585 ई. में प्रताप ने लूणा चावंडिया को पराजित कर 'चावंड' पर अधिकार किया और इसे अपनी नई (संकटकालीन) राजधानी बनाया।
साहित्य, कला और स्थापत्य
- दरबारी विद्वान:
- चक्रपाणि मिश्र: इन्होंने 'विश्ववल्लभ', 'मुहूर्तमाला', 'व्यवहारादर्श' और 'राज्याभिषेक पद्धति' नामक ग्रंथों की रचना की।
- जैन मुनि हेमरत्न सूरि: इन्होंने 'गोरा-बादल', 'पद्मिनी चरित्र चौपाई' आदि की रचना की।
- चित्रकला: प्रताप के समय में ही मेवाड़ में 'चावंड चित्रकला शैली' का जन्म हुआ। इनके प्रमुख चित्रकार निसारुद्दीन (नासिरुद्दीन) थे।
- मंदिर निर्माण: इन्होंने चावंड में 'चामुंडा देवी' और बदराणा में 'हरिहर मंदिर' का निर्माण करवाया।
मृत्यु एवं समाधि
- 19 जनवरी 1597 ई. को चावंड में धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय आंतरिक चोट लगने के कारण महाराणा प्रताप का देहांत हो गया।
- उनका अंतिम संस्कार चावंड के पास बांडोली (उदयपुर) में किया गया, जहाँ खेजड़ बाँध की पाल पर उनकी '8 खंभों की छतरी' बनी हुई है।
- कर्नल टॉड ने उनके सम्मान में लिखा है: "आल्प्स पर्वत के समान अरावली में कोई भी ऐसी घाटी नहीं, जो प्रताप के किसी न किसी वीर कार्य, उज्ज्वल विजय या उससे अधिक कीर्तियुक्त पराजय से पवित्र न हुई हो।"
महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597 - 1620 ई.)
- ये महाराणा प्रताप और महारानी अजबदे पंवार के पुत्र थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद इन्होंने मेवाड़ का शासन सँभाला।
- 1599 ई. में अकबर ने जहाँगीर (सलीम) के नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना मेवाड़ भेजी, जिसे मेवाड़ की वीर सेना ने 'उंटाला' (वल्लभनगर) नामक स्थान पर भयंकर युद्ध में पराजित कर खदेड़ दिया।
- जहाँगीर के दिल्ली का बादशाह बनते ही 1605 ई. में उसने शहजादा परवेज, आसफ खाँ, जफर बेग एवं सगर (प्रताप का भाई) के नेतृत्व में मेवाड़ को अपने अधीन करने का प्रयास किया, परंतु उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।
- इसके बाद जहाँगीर ने मेवाड़ को झुकाने के लिए निरंतर सैन्य अभियान भेजे— 1608 ई. में महावत खाँ, 1609 ई. में अब्दुल्ला, 1612 ई. में राजा बासू और 1613 ई. में मिर्ज़ा अजीज कोका के नेतृत्व में। ये सभी सेनापति पूर्णतः असफल रहे।
- अंततः 1613 ई. में जहाँगीर स्वयं अजमेर आया और अपने पुत्र खुर्रम (शाहजहाँ) को एक विशाल सेना देकर मेवाड़ अभियान का नेतृत्व सौंपा। खुर्रम ने मेवाड़ में भारी कत्लेआम, लूटपाट और खेतों में आगजनी की।
- मुगल-मेवाड़ संधि (5 फरवरी 1615 ई.): सरदारों के भारी दबाव और राज्य की जर्जर आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह ऐतिहासिक संधि संपन्न हुई। इस संधि पर मुगलों की तरफ से खुर्रम (शाहजहाँ) व मेवाड़ की ओर से महाराणा अमरसिंह प्रथम ने हस्ताक्षर किए थे।
- अमरसिंह प्रथम के शासनकाल को मेवाड़ की 'चावंड चित्रकला शैली का स्वर्णकाल' माना जाता है (इसी समय प्रसिद्ध चित्रकार निसारुद्दीन ने रागमाला चित्रित की थी)।
- मुगलों से संधि के बाद ग्लानिवश अमरसिंह ने राजकाज अपने पुत्र कर्णसिंह को सौंप दिया और एकांतवास में चले गए। 26 जनवरी 1620 ई. को उदयपुर के निकट आहड़ में इनका देहांत हो गया।
- 'आहड़ की महासतियों' में बनी सबसे पहली छतरी अमरसिंह प्रथम की ही है। आहड़ को 'मेवाड़ के महाराणाओं का शाही श्मशान' भी कहा जाता है।
महाराणा कर्णसिंह (1620 - 1628 ई.)
- इन्होंने उदयपुर की पिछोला झील के मध्य 'जग मंदिर' (महलों) का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया था।
- मुगल विद्रोह के दौरान 1623 ई. में शहजादे खुर्रम (शाहजहाँ) को इन्हीं जग मंदिरों में शरण दी गई थी। शाहजहाँ ने यहाँ 'गफूर बाबा की मजार' का निर्माण करवाया था। (माना जाता है कि इन्ही महलों से प्रेरणा लेकर शाहजहाँ ने बाद में ताजमहल बनवाया था)।
- इन्होंने उदयपुर के राजमहलों में 'दिलखुश महल' और 'कर्ण विलास' नामक भव्य महलों का निर्माण करवाया।
- कर्णसिंह मुगलों के आंतरिक मामलों (दरबारी राजनीति) में रुचि लेने वाले मेवाड़ के प्रथम शासक थे।
महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628 - 1652 ई.)
- इनके शासनकाल में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने हस्तक्षेप करते हुए मेवाड़ रियासत के हिस्से— प्रतापगढ़ और शाहपुरा को मेवाड़ से पृथक् कर उन्हें स्वतंत्र रियासतों की मान्यता दे दी थी, ताकि मेवाड़ की शक्ति कम की जा सके।
- इन्होंने पिछोला झील में स्थित 'जग मंदिर महलों' का निर्माण कार्य पूर्ण करवाया। यह निर्माण प्रसिद्ध वास्तुकार भाणा और उसके पुत्र मुकुंद की देखरेख में हुआ था।
- इन्होंने उदयपुर में पंचायतन शैली का एक अत्यंत भव्य 'जगदीश मंदिर' (जगन्नाथ राय मंदिर) बनवाया, जिसे 'सपनों में बना मंदिर' भी कहा जाता है।
- इसी जगदीश मंदिर में 'जगन्नाथ राय प्रशस्ति' उत्कीर्ण है, जिसके रचयिता कृष्ण भट्ट थे।
- इन्होंने उदयपुर में 'मोहन मंदिर' और 'रूप सागर तालाब' का निर्माण करवाया। जगतसिंह की धाय माँ नौजूबाई ने उदयपुर में 'धाय मंदिर' (धायपीर का मंदिर) का निर्माण करवाया था।
- महाराणा जगतसिंह प्रथम के शासनकाल को 'मेवाड़ चित्रकला शैली का स्वर्णकाल' माना जाता है।
- इन्होंने कला और चित्रकारों को संरक्षण देने के लिए राजमहल में 'चितेरों की ओवरी' (तस्वीराँ रो कारखानो) नामक एक राजकीय कला विद्यालय (चित्रशाला विभाग) की स्थापना की थी।
महाराणा राजसिंह (1652 - 1680 ई.)
- इनका राज्याभिषेक 10 अक्टूबर 1652 को हुआ। शासक बनते ही मुगल बादशाह शाहजहाँ ने इन्हें 5000 का मनसब प्रदान किया था।
- उपाधि: इन्होंने अपने सैन्य कौशल और वीरता के कारण 'विजय कटकातू' (सेनाओं को जीतने वाला) की उपाधि धारण की थी।
- शासक बनते ही इन्होंने 1615 ई. की मुगल-मेवाड़ संधि की शर्तों का उल्लंघन करते हुए चित्तौड़गढ़ दुर्ग की मरम्मत करवाने का कार्य शुरू किया। इस पर शाहजहाँ ने सादुल्ला खाँ के नेतृत्व में सेना भेजकर राजसिंह द्वारा करवाए गए नव-निर्माण को तुड़वा दिया था।
- मुगल शहजादों (दारा शिकोह और औरंगजेब) के मध्य हुए उत्तराधिकार संघर्ष में राजसिंह ने कूटनीति से काम लिया और पूर्णतः तटस्थ रहे।
- टीका दौड़: राजसिंह ने 'टीका दौड़' उत्सव के बहाने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और बाहरी मुगल ठिकानों (टोडा, मालपुरा, टोंक, चाकसू, लालसोट) पर हमले कर लाखों रुपये की संपत्ति लूटी तथा मेवाड़ के खोए हुए क्षेत्रों पर पुनः अधिकार कर लिया।
- औरंगजेब से संबंध: प्रारंभ में औरंगजेब ने शासक बनते ही राजसिंह को 6000 का मनसब तथा ग्यासपुरा, डूंगरपुर और बाँसवाड़ा के परगने दिए थे।
- चारुमती विवाद: किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से विवाह को लेकर राजसिंह और औरंगजेब के मध्य विवाद हुआ। मुस्लिम शासक से धर्म रक्षार्थ राजसिंह ने चारुमती से विवाह किया। इसी कारण राजसिंह और मुगलों के मध्य 'देसूरी की नाल' (राजसमंद) में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में राजसिंह की तरफ से सलूम्बर के रतनसिंह चूंडावत (हाड़ी रानी के पति) ने मुगलों को रोककर विजय प्राप्त की।
- जजिया कर का विरोध: जब औरंगजेब ने 1679 ई. में हिंदुओं पर पुनः 'जजिया कर' लगाया, तो राजपूताने में केवल महाराणा राजसिंह ने ही पत्र लिखकर इसका कड़ा विरोध किया था।
- मारवाड़ की सहायता: मुगल-मारवाड़ संघर्ष (30 वर्षीय युद्ध) में राजसिंह ने मारवाड़ के अजीतसिंह और वीर दुर्गादास राठौड़ को मुगलों के विरुद्ध शरण दी तथा उनके निर्वाह के लिए 'केलवा की जागीर' प्रदान की।
- स्थापत्य व निर्माण कार्य:
- अकाल राहत कार्यों के तहत गोमती नदी के पानी को रोककर प्रसिद्ध 'राजसमंद झील' का निर्माण करवाया। इस झील की नींव 'घेवर माता' द्वारा रखी गई थी।
- इन्होंने 'राजनगर' (वर्तमान राजसमंद) नामक नया नगर बसाया।
- उदयपुर में अम्बामाता मंदिर बनवाया तथा ब्राह्मणों को 'रत्नों का तुलादान' किया।
- इनकी रानी रामरस दे ने उदयपुर में 'त्रिमुखी बावड़ी' (जया बावड़ी) का निर्माण करवाया।
- मुगलों से मूर्तियों को बचाकर लाए गए पुजारियों को शरण दी और नाथद्वारा में 'श्रीनाथजी मंदिर' तथा कांकरोली में 'द्वारिकाधीश मंदिर' का भव्य निर्माण करवाया।
- साहित्य एवं दरबारी विद्वान:
- इनके प्रमुख दरबारी विद्वान रणछोड़ भट्ट तैलंग थे, जिन्होंने 'राजप्रशस्ति महाकाव्य' (विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति जो राजसमंद झील की 25 काली शिलाओं पर उत्कीर्ण है) तथा 'अमरकाव्य वंशावली' की रचना की।
- सदाशिव ने 'राजरत्नाकर', भट्ट मुकुंद ने 'राजसिंहाष्टक', किशोरदास ने 'राजप्रकाश', कवि मान ने 'राजविलास' और लाल भट्ट ने 'राजसिंह प्रभावर्णनम्' ग्रंथ लिखे। (प्रसिद्ध ग्रंथ 'खुमाण रासो' की रचना दलपत विजय ने की थी)।
- 1680 ई. में कुंभलगढ़ दुर्ग (ओडा ग्राम) में विष दिए जाने के कारण इनका निधन हो गया।
महाराणा जयसिंह (1680 - 1698 ई.)
- राजसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब और जयसिंह के मध्य 24 जून 1681 ई. को 'दूसरी मेवाड़-मुगल संधि' संपन्न हुई।
- इन्होंने गोमती नदी के पानी को रोककर 'जयसमंद झील' (ढेबर झील) का निर्माण करवाया। यह राजस्थान की सबसे बड़ी मीठे पानी की कृत्रिम झील है।
महाराणा अमरसिंह द्वितीय (1698 - 1710 ई.)
- इनके शासनकाल की सबसे प्रमुख घटना 1708 ई. का 'देबारी समझौता' है, जो मेवाड़, मारवाड़ (अजीतसिंह) और आमेर (सवाई जयसिंह) के मध्य मुगलों के विरुद्ध हुआ था।
- इस समझौते की शर्त के तहत अमरसिंह द्वितीय ने अपनी पुत्री 'चंद्रकुँवरी' का विवाह आमेर के सवाई जयसिंह से किया था।
महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय (1710 - 1734 ई.)
- इनके शासनकाल में मराठों ने पहली बार मेवाड़ में प्रवेश किया और चौथ (कर) वसूलना प्रारंभ किया।
- इन्होंने उदयपुर में फतहसागर झील के किनारे प्रसिद्ध 'सहेलियों की बाड़ी' का निर्माण करवाया।
- सीसारमा गाँव (उदयपुर) में 'वैद्यनाथ का मंदिर' बनवाया और वहाँ 'वैद्यनाथ प्रशस्ति' उत्कीर्ण करवाई। इन्होंने उदयपुर के जगदीश मंदिर का पुनर्निर्माण भी करवाया।
- मेवाड़ चित्रकला शैली के प्रसिद्ध ग्रंथ 'कलीला-दमना' का चित्रांकन भी इन्हीं के शासनकाल में हुआ था।
महाराणा जगतसिंह द्वितीय (1734 - 1751 ई.)
- मराठा आक्रमणों से राजपूताने को बचाने के लिए 17 जुलाई 1734 ई. को आयोजित ऐतिहासिक 'हुरड़ा सम्मेलन' (भीलवाड़ा) की अध्यक्षता महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने ही की थी।
- इनके समय पेशवा बाजीराव प्रथम मेवाड़ आया और उसने मेवाड़ से चौथ (मराठा कर) वसूली का समझौता किया।
- इन्होंने अपने भांजे (सवाई जयसिंह के पुत्र) माधोसिंह को जयपुर की गद्दी दिलाने के लिए जयपुर के उत्तराधिकार संघर्ष (राजमहल/बगरू युद्ध) में सैनिक हस्तक्षेप किया था।
- स्थापत्य कला: इन्होंने पिछोला झील के मध्य प्रसिद्ध 'जगनिवास महलों' (वर्तमान लेक पैलेस) का निर्माण करवाया।
- इनके दरबारी विद्वान नेकराम ने 'जगत विलास' नामक ग्रंथ की रचना की।
- इनके शासनकाल (1739 ई.) में ही विदेशी अफगान आक्रमणकारी नादिरशाह ने दिल्ली पर भयानक आक्रमण और लूटपाट की थी।
- जगतसिंह द्वितीय के बाद क्रमशः प्रतापसिंह द्वितीय (1751-1754 ई.) और राजसिंह द्वितीय (1754-1761 ई.) मेवाड़ के शासक बने।
महाराणा अरिसिंह द्वितीय (1761 - 1773 ई.)
- मेवाड़ के कुछ बागी सरदारों ने राजमाता झाली से उत्पन्न पुत्र रतनसिंह को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर विद्रोह कर दिया था।
- अरिसिंह ने अपने विरोधियों का दमन करते हुए बागोर के सरदार नाथसिंह एवं सलूम्बर के रावत जोधसिंह की हत्या करवा दी थी।
- इनके पश्चात् इनके उत्तराधिकारी महाराणा हम्मीर द्वितीय (1773-1778 ई.) शासक बने।
महाराणा भीमसिंह (1778 - 1828 ई.)
- मराठों और पिंडारियों के आतंक से त्रस्त होकर इन्होंने 13 जनवरी 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायक संधि कर ली।
- इस ऐतिहासिक संधि पर मेवाड़ की ओर से आसींद (भीलवाड़ा) के ठाकुर अजीतसिंह और अंग्रेजों की ओर से चार्ल्स मेटकॉफ ने हस्ताक्षर किए थे।
- कृष्णा कुमारी विवाद: महाराणा भीमसिंह की पुत्री 'कृष्णा कुमारी' से विवाह को लेकर जयपुर (जगतसिंह द्वितीय) और जोधपुर (मानसिंह) के मध्य 1807 ई. में परबतसर (नागौर) के पास 'गिंगोली का युद्ध' हुआ था।
- अंततः 1810 ई. में अमीर खाँ पिंडारी और अजीतसिंह चूंडावत के भारी दबाव में आकर कृष्णा कुमारी को विष (जहर) दे दिया गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई और यह विवाद समाप्त हुआ।
- ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि के बाद 1818 ई. में कर्नल जेम्स टॉड मेवाड़ के पहले पॉलिटिकल एजेंट (P.A.) के रूप में उदयपुर आए थे।
- इनके उत्तराधिकारी महाराणा जवानसिंह (1828-1838 ई.) हुए।
महाराणा सरदारसिंह (1838 - 1842 ई.)
- महाराणा जवानसिंह के निःसंतान होने के कारण बागोर ठिकाने के सरदारसिंह को गोद लेकर मेवाड़ का शासक बनाया गया।
- इनके शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना 1841 ई. में 'मेवाड़ भील कोर' (Mewar Bhil Corps - MBC) का गठन है। इसका मुख्यालय खैरवाड़ा (उदयपुर) में रखा गया था। स्वतंत्रता के बाद 1950 ई. में इसका राजस्थान पुलिस विभाग में विलय कर दिया गया।
महाराणा स्वरूपसिंह (1842 - 1861 ई.)
- ये महाराणा सरदारसिंह के छोटे भाई थे, जिन्हें गोद लेकर शासक बनाया गया।
- ये 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों का खुल कर तन-मन-धन से साथ देने वाले (और नीमच के अंग्रेज परिवारों को पिछोला झील के जगमंदिर में शरण देने वाले) राजपूताना के पहले शासक थे।
- इन्होंने मेवाड़ में 'स्वरूपशाही सिक्के' चलाए। इन सोने-चाँदी के सिक्कों के एक ओर 'चित्रकूट उदयपुर' और दूसरी ओर अंग्रेजों को खुश करने के लिए 'दोस्ती लंदन' अंकित करवाया था।
- इन्होंने आकाशीय बिजली गिरने से क्षतिग्रस्त हुए चित्तौड़गढ़ के 'विजय स्तंभ' (कीर्ति स्तंभ) का जीर्णोद्धार करवाया था।
- इन्होंने मेवाड़ रियासत में 1853 ई. में 'डाकन प्रथा' (खेरवाड़ा में जे.सी. ब्रुक के समय), समाधि प्रथा और 1861 ई. में 'सती प्रथा' को गैर-कानूनी घोषित कर इन पर रोक लगाई थी।
- 1861 ई. में इनकी मृत्यु हुई। इनके शव के साथ इनकी पासवान 'एंजाबाई' सती हुई थीं, जो मेवाड़ के इतिहास में किसी महाराणा के साथ सती होने की अंतिम घटना मानी जाती है।
महाराणा शंभूसिंह (1861 - 1874 ई.)
- इन्हें भी बागोर ठिकाने से गोद लेकर मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया था।
- राज्याभिषेक के समय ये नाबालिग थे, इसलिए राज्य के सुचारू प्रबंध के लिए ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर टेलर की अध्यक्षता में एक 'रीजेंसी काउंसिल' (पंच सरदारी) की स्थापना की गई थी।
- मेवाड़ में अंग्रेजों द्वारा नई अदालतों की स्थापना और नए करों के विरोध में नगर सेठ चम्पालाल के नेतृत्व में 1864 ई. में उदयपुर में ऐतिहासिक हड़ताल हुई थी।
- शिक्षा के विकास के लिए 1863 ई. में उदयपुर में 'शंभूरत्न पाठशाला' की स्थापना की गई। इसके अलावा रियासत में खैरवाड़ा और नीमच तक पक्की सड़कों का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया गया।
- प्रसिद्ध इतिहासकार और कविराज श्यामलदास ने इन्हीं के शासनकाल में अपना विश्व-प्रसिद्ध ग्रंथ 'वीर विनोद' लिखना प्रारंभ किया था।
- तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड रिपन ने शंभूसिंह को खुश करने के लिए 1871 ई. में 'ग्रांड कमांडर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया' (GCSI) की उपाधि से सम्मानित किया था।
महाराणा सज्जनसिंह (1874 - 1884 ई.)
- ये भी बागोर ठिकाने के शक्तिसिंह के पुत्र थे, जिन्हें गोद लिया गया था।
- इन्होंने 14 फरवरी 1878 ई. को अंग्रेजों (ब्रिटिश सरकार) के साथ मेवाड़ रियासत का ऐतिहासिक 'नमक समझौता' किया था।
- नवंबर 1881 ई. में भारत के वायसराय लॉर्ड रिपन स्वयं चित्तौड़गढ़ आए और एक भव्य दरबार आयोजित कर महाराणा सज्जनसिंह को G.C.S.I. (Grand Commander of the Star of India) के खिताब से नवाजा।
- इन्होंने उदयपुर में 'सज्जन निवास' (गुलाब बाग) नामक अत्यंत सुंदर बाग लगवाया। चिकित्सा के लिए 'सज्जन अस्पताल' और 'वॉल्टर जनाना अस्पताल' का निर्माण करवाया तथा शिक्षा के लिए एक 'एजुकेशन कमेटी' बनाई।
- इनके समय में मेवाड़ रियासत में एक नया और आधुनिक 'भू-राजस्व बंदोबस्त' शुरू किया गया। साथ ही, 1881 ई. में मेवाड़ में पहली बार विधिवत जनगणना का कार्य प्रारंभ हुआ।
- राज्य के शासन प्रबंध और न्याय कार्य को सुदृढ़ करने के लिए इन्होंने 20 अगस्त 1880 ई. को 'महेंद्राज सभा' (इजलास खास) की स्थापना की।
- 1881 ई. में उदयपुर में 'सज्जन यंत्रालय' नामक छापाखाना (Printing Press) स्थापित कर वहाँ से 'सज्जन कीर्ति सुधारक' नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू करवाया। यह मेवाड़ का पहला समाचार पत्र था। ज्ञानवर्द्धन के लिए 'सज्जन वाणी विलास' पुस्तकालय की स्थापना की गई।
- 1877 ई. में लॉर्ड लिटन द्वारा आयोजित 'दिल्ली दरबार' में भाग लेने वाले सज्जनसिंह मेवाड़ के प्रथम शासक थे।
- आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती इन्हीं के शासनकाल (1882 ई.) में मेवाड़ आए थे। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' के द्वितीय संस्करण का लेखन कार्य उदयपुर के नौलखा महल (गुलाब बाग) में किया था।
महाराणा फतहसिंह (1883 - 1930 ई.)
- ये शिवरती (Shivrati) ठिकाने के महाराजा दलसिंह के पुत्र थे, जिन्हें नि:संतान महाराणा सज्जनसिंह के निधन के बाद गोद लेकर मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया था।
- इन्होंने अपने शासनकाल में राजपूत समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे— बहुविवाह, बाल विवाह एवं मृत्युभोज (मोसर) आदि में होने वाली फिजूलखर्ची पर कड़ाई से रोक लगाने के प्रयास किए।
- ब्रिटेन के राजकुमार 'ड्यूक ऑफ कनॉट' (Duke of Connaught) के मेवाड़ आगमन पर इन्होंने 1889 ई. में देवाली (Dewali) गाँव में उनके हाथों से एक बाँध की नींव रखवाई, जिसे 'कनॉट बाँध' कहा गया। यही बाँध आगे चलकर 'फतहसागर झील' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
- इनके शासनकाल में 1899 ई. (विक्रम संवत् 1956) में राजपूताना का सबसे भयंकर और विनाशकारी 'छप्पनिया अकाल' पड़ा था, जिसमें इन्होंने व्यापक स्तर पर राहत कार्य करवाए थे।
- भारत का प्रथम, सबसे लंबा चलने वाला और पूर्णतः अहिंसक 'बिजौलिया किसान आंदोलन' (1897 ई.) इन्हीं के शासनकाल में प्रारंभ हुआ था।
- राजपूताना के तत्कालीन ए.जी.जी. (A.G.G.) वॉल्टर के प्रयासों से 1889 ई. में राजपूतों में समाज सुधार हेतु अजमेर में 'वॉल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा' की स्थापना की गई थी।
- ब्रिटिश सरकार ने इन्हें खुश करने के लिए 'ऑर्डर ऑफ क्राउन ऑफ इंडिया' (GCIE) की सर्वोच्च ब्रिटिश उपाधि से सम्मानित किया था।
- चेतावणी रा चूंगट्या: 1903 ई. में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा आयोजित 'दिल्ली दरबार' (एडवर्ड सप्तम के सम्मान में) में शामिल होने जा रहे महाराणा फतहसिंह को प्रसिद्ध क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ ने डिंगल भाषा में 'चेतावणी रा चूंगट्या' (चेतावनी के चुटकी) नामक 13 सोरठे लिखकर भेजे थे।
- इन सोरठों को पढ़कर महाराणा फतहसिंह का स्वाभिमान जाग उठा और वे दिल्ली पहुँचकर भी दरबार में शामिल हुए बिना ही वापस उदयपुर लौट आए। (ये 1911 के द्वितीय दिल्ली दरबार में भी शामिल नहीं हुए थे)।
महाराणा भूपालसिंह (1930 - 1956 ई.)
- ये महाराणा फतहसिंह के पुत्र थे और मेवाड़ के महान गुहिल / सिसोदिया राजवंश के अंतिम शासक सिद्ध हुए।
- इन्हीं के शासनकाल में भारत स्वतंत्र हुआ और राजस्थान का ऐतिहासिक एकीकरण पूर्ण हुआ। इन्होंने 18 अप्रैल 1948 को 'संयुक्त राजस्थान' (एकीकरण के तीसरे चरण) के निर्माण पर हस्ताक्षर कर मेवाड़ रियासत का राजस्थान में विलय कर दिया था।
- एकीकरण के दौरान 30 मार्च 1949 (वृहद् राजस्थान के निर्माण के समय) को इन्हें राजस्थान का सर्वोच्च पद 'महाराजप्रमुख' प्रदान किया गया।
- ये राजस्थान के एकमात्र शासक थे जो आजीवन (1956 में अपनी मृत्यु तक) 'महाराजप्रमुख' के इस गौरवशाली पद पर आसीन रहे।