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gurjar prtihar

गुर्जर प्रतिहार वंश: उत्पत्ति एवं ऐतिहासिक स्रोत

  • प्राचीन उल्लेख: गुर्जर जाति का सर्वप्रथम प्रामाणिक उल्लेख चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के 'ऐहोल अभिलेख' में मिलता है।
  • नामकरण: 'गुर्जर-प्रतिहार' शब्द का स्पष्ट उल्लेख चंदेल वंश के शिलालेखों में प्राप्त होता है।
  • स्थापना व विस्तार: इस राजवंश की स्थापना छठी शताब्दी के द्वितीय चरण में उत्तर-पश्चिम भारत (विशेषकर राजपूताना और गुजरात क्षेत्र) में हुई थी।
  • अभिलेखीय साक्ष्य: नीलकण्ठ, राधनपुर, देवली तथा करहाड़ शिलालेखों में प्रतिहारों को स्पष्ट रूप से 'गुर्जर' कहा गया है। इसके अलावा स्कंद पुराण के 'पंच द्रविड़ों' में भी गुर्जरों का उल्लेख मिलता है।
  • विदेशी यात्रियों का विवरण: अरब यात्रियों ने इन्हें 'जुर्ज' कहा है। प्रसिद्ध अरबी यात्री अल-मसूदी ने गुर्जर-प्रतिहार राज्य को 'अल-गुर्जर' और यहाँ के राजा को 'बौरा' (Bora) कहकर संबोधित किया है।
  • उत्पत्ति के विभिन्न मत:
    • मिहिरभोज के 'ग्वालियर अभिलेख' में नागभट्ट को भगवान राम का प्रतिहार (द्वारपाल) एवं विशुद्ध क्षत्रिय बताया गया है।
    • इतिहासकार वी. ए. स्मिथ, जॉर्ज ब्यूहलर, और ए. एफ. आर. हॉर्नले जैसे विदेशी विद्वानों ने प्रतिहारों को हूणों की संतान माना है।
  • प्रमुख शाखाएँ: ख्यात लेखक मुहणोत नैणसी ने गुर्जर-प्रतिहारों की कुल '26 शाखाओं' का वर्णन किया है। इनमें मंडोर, जालोर, राजोगढ़, कन्नौज, उज्जैन और भड़ौच के गुर्जर-प्रतिहार सबसे अधिक प्रसिद्ध रहे।

मारवाड़ (मंडोर) का गुर्जर प्रतिहार वंश

  • संस्थापक: इस वंश की स्थापना छठी शताब्दी ईस्वी में हरिश्चंद्र (उपनाम - रोहिल्लद्धि) ने की थी। हरिश्चंद्र को गुर्जर-प्रतिहार वंश का आदिपुरुष / मूल पुरुष कहा जाता है।
  • राजधानी: इनकी प्रारंभिक राजधानी मंडोर (जोधपुर) थी।
  • ऐतिहासिक जानकारी: मंडोर के प्रतिहार वंश की प्रारंभिक स्थिति व वंशावली की सबसे प्रामाणिक जानकारी 'घटियाला शिलालेख' (861 ई.) से मिलती है। गुर्जर-प्रतिहारों को भारत का 'द्वारपाल' भी कहा जाता है।
  • घटियाला शिलालेख के अनुसार, हरिश्चंद्र नामक ब्राह्मण की क्षत्राणी पत्नी भद्रा से चार पुत्र उत्पन्न हुए— भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल और दद्द।
  • इन चारों भाइयों ने मिलकर माण्डव्यपुर (मंडोर) को जीता और सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर एक परकोटा बनवाया। मंडोर के प्रतिहारों की वास्तविक वंशावली हरिश्चंद्र के तीसरे पुत्र रज्जिल से प्रारंभ होती है।

रज्जिल

  • रज्जिल ने शासक बनने के बाद मंडोर और उसके आस-पास के क्षेत्रों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया और प्रतिहार सत्ता को सुदृढ़ किया।

नरभट्ट

  • यह रज्जिल का पुत्र था जो उसके बाद मंडोर का उत्तराधिकारी बना।
  • इसकी वीरता और युद्ध कौशल के कारण इसे 'पिल्लापल्ली' (गुरुओं व ब्राह्मणों का रक्षक / साहसिक) की उपाधि दी गई थी।

नागभट्ट प्रथम (मंडोर शाखा)

  • यह नरभट्ट का पुत्र व रज्जिल का पौत्र था। यह इस शाखा का एक अत्यंत प्रतापी शासक सिद्ध हुआ।
  • इसे 'नाहड़' की उपाधि प्राप्त थी।
  • घटियाला शिलालेख के अनुसार, नागभट्ट प्रथम ने मंडोर राज्य की पूर्वी सीमा का विस्तार किया और 'मेड़ान्तक' (मेड़ता) को जीतकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • नागभट्ट प्रथम की पत्नी जज्जिका देवी से दो पुत्र उत्पन्न हुए— तात और भोज। (तात ने संन्यास ले लिया था, अतः भोज शासक बना)।

यशोवर्धन

  • यह नागभट्ट प्रथम के पुत्र तात का पुत्र था।
  • रांजोली ताम्रपत्र के अनुसार, यशोवर्धन के शासनकाल में पृथुवर्धन नामक शासक ने गुर्जर-प्रतिहार राज्य पर आक्रमण किया था, जो कि पूर्णतः असफल रहा।

शिलूक

  • यह यशोवर्धन के पुत्र चन्दुक का पुत्र (पौत्र) था।
  • घटियाला शिलालेख में वर्णित है कि शिलूक ने देवराज भाटी (जैसलमेर क्षेत्र के शासक) से युद्ध किया था। शिलूक ने देवराज को युद्ध में मारकर उसके राज्य चिह्न व राजछत्र को छीन लिया था।

कक्क

  • कक्क एक वीर शासक था जिसने मुंगेर (मुद्गगिरि, बिहार) के युद्ध में बंगाल के गौड़ राजा धर्मपाल को पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • कक्क की दो पत्नियाँ थीं— रानी पद्मिनी (जिससे बाउक का जन्म हुआ) और रानी दुर्लभदेवी (जिससे कक्कुक का जन्म हुआ)।

बाउक

  • कक्क की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बाउक मंडोर का उत्तराधिकारी बना।
  • बाउक ने मयूर नामक राजा के भयंकर आक्रमण को विफल किया था। अपनी इसी शानदार विजय के उपलक्ष्य में उसने 837 ई. में 'मंडोर शिलालेख' (प्रशस्ति) उत्कीर्ण करवाया था, जिसमें प्रतिहारों की वंशावली दी गई है।

कक्कुक

  • बाउक के बाद उसका सौतेला भाई कक्कुक मंडोर की गद्दी पर बैठा।
  • इसके शासनकाल में ही प्रसिद्ध 'घटियाला के शिलालेख' (861 ई.) उत्कीर्ण करवाए गए थे, जो प्राकृत और संस्कृत भाषा में हैं।
  • घटियाला शिलालेखों में कक्कुक की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है और उसे मरु (मारवाड़), वल्ल, गुर्जरात्रा, मांड (जैसलमेर), अज्ज (मध्य प्रदेश) व त्रवणी आदि राज्यों में ख्याति फैलाने वाला प्रतापी राजा कहा गया है।
  • कक्कुक ने 'वट्टनानक' (नाणाबेड़ा) नामक नया नगर बसाया था।
  • इसने मंडोर क्षेत्र पर हुए आभीरों (अहीरों) के आक्रमण को विफल कर दिया था। इस महान विजय के उपलक्ष्य में इसने रोहिंसकूप और मंडोर में विजय स्तंभ (जयस्तंभ) का निर्माण करवाया था।

मंडोर शाखा का पतन

  • कालान्तर में मंडोर पर प्रतिहारों की ईन्दा शाखा का शासन रहा।
  • मुस्लिम आक्रांताओं और हम्मीर परिहार के निरंतर आक्रमणों से परेशान होकर, ईन्दा प्रतिहारों ने 1395 ई. में अपनी राजकुमारी का विवाह मारवाड़ के राव चूंडा राठौड़ से कर दिया और मंडोर को दहेज स्वरूप राव चूंडा को सौंप दिया। इसी के साथ मंडोर से गुर्जर-प्रतिहार वंश का पतन हो गया और राठौड़ वंश का उदय हुआ।

जालोर, कन्नौज व उज्जैन के गुर्जर-प्रतिहार वंश

मारवाड़ (मंडोर) के गुर्जर-प्रतिहारों की ही एक शाखा ने आगे चलकर जालोर, उज्जैन और कन्नौज में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। इस नवीन और शक्तिशाली प्रतिहार वंश का आरंभ नागभट्ट प्रथम से होता है। इन शासकों को स्वयं को भगवान राम के भाई लक्ष्मण का वंशज मानने के कारण 'रघुवंशी प्रतिहार' भी कहा जाता है।

नागभट्ट प्रथम (730 - 760 ई.)

  • साम्राज्य विस्तार: इनके समय में गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य उत्तर में मारवाड़ से लेकर दक्षिण में भड़ौच (गुजरात) तक फैला हुआ था। इसमें लाट, जालोर, आबू और मालवा के कुछ भाग शामिल थे। उस समय मंडोर के प्रतिहार इनके सामंतों के रूप में शासन करते थे।
  • नागावलोक का दरबार: नागभट्ट प्रथम का राजदरबार अपनी भव्यता के कारण 'नागावलोक का दरबार' कहलाता था। जालोर, अवन्ति (उज्जैन) और कन्नौज के प्रतिहारों की वास्तविक नामावली नागभट्ट प्रथम से ही प्रारंभ होती है।
  • प्रमुख सामंत: गुहिल, चौहान, राठौड़, कलचुरि, चंदेल, चालुक्य और परमार आदि राजवंश प्रारंभिक दौर में नागभट्ट प्रथम के सामंत हुआ करते थे।
  • अरबों पर विजय व उपाधियाँ: यह गुर्जर-प्रतिहारों का प्रथम अत्यंत शक्तिशाली शासक था, जिसने सिंध की ओर से होने वाले अरबों और बलूचों के आक्रमणों को सफलतापूर्वक रोका। इसी कारण इसे भारत का 'प्रथम द्वारपाल' माना जाता है।
  • ग्वालियर प्रशस्ति एवं अन्य स्रोतों में उपाधियाँ:
    • नारायण का अवतार (अरबों / म्लेच्छों पर विजय प्राप्त करने के कारण)
    • राम का प्रतिहार / द्वारपाल
    • मेघनाद के युद्ध का अवरोधक
    • इन्द्र के दंभ (घमंड) का नाशक
    • नारायण की मूर्ति का प्रतीक
    • म्लेच्छों का नाशक (ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार)
  • चीनी यात्री का विवरण: (ध्यातव्य है कि 7वीं शताब्दी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग / युवानच्वांग भारत आया था, तब उसने अपनी 72 देशों की यात्रा के दौरान जालोर क्षेत्र (भीनमाल) की यात्रा की थी। ह्वेनसांग ने भीनमाल को 'पीलो-मोलो' तथा गुर्जर राज्य को 'कुचेलो' कहा था।)

वत्सराज (783 - 795 ई.)

  • वास्तविक संस्थापक: वत्सराज को जालोर/कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहार वंश का 'वास्तविक संस्थापक' माना जाता है।
  • उपाधि: युद्ध में हाथी के समान पराक्रमी होने के कारण इन्हें 'रणहस्तिन्' की उपाधि दी गई थी।
  • साहित्यिक विकास: वत्सराज के शासनकाल में उत्कृष्ट साहित्य की रचना हुई:
    • 778 ई. में जालोर में उद्योतन सूरि ने प्राकृत भाषा में 'कुवलयमाला' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की।
    • 783 ई. में आचार्य जिनसेन सूरि ने 'हरिवंश पुराण' नामक ग्रंथ लिखा।
  • स्थापत्य कला: जोधपुर (ओसियाँ) के प्रसिद्ध प्राचीन जैन मंदिर (महावीर स्वामी मंदिर) प्रतिहार शासक वत्सराज के समय में ही 'महामारू शैली' में निर्मित हुए थे।

ऐतिहासिक त्रिपक्षीय / त्रिकोणात्मक संघर्ष

  • उत्तर भारत की तत्कालीन सत्ता के केंद्र 'कन्नौज' पर अधिकार करने के लिए भारत की तीन महाशक्तियों के मध्य एक दीर्घकालिक युद्ध हुआ, जिसे त्रिपक्षीय संघर्ष कहा जाता है। इसमें शामिल थे:
    • उत्तरी-पश्चिमी भारत के गुर्जर-प्रतिहार
    • दक्षिणी भारत के राष्ट्रकूट
    • पूर्वी भारत (बंगाल) का पाल वंश
  • इस लगभग 150 वर्षों तक चलने वाले ऐतिहासिक संघर्ष की शुरुआत गुर्जर-प्रतिहार नरेश वत्सराज ने ही की थी और अंततः इस लंबे संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहारों की ही निर्णायक विजय हुई।
  • वत्सराज के सैन्य अभियान:
    • वत्सराज ने कन्नौज पर आक्रमण कर वहाँ के शासक 'इन्द्रायुध' को पराजित किया और उसे अपना सामंत बना लिया।
    • इसके बाद वत्सराज ने बंगाल के पाल वंशीय शासक 'धर्मपाल' को भी मुंगेर के युद्ध में पराजित किया।
    • परंतु, अंत में राष्ट्रकूट शासक ध्रुव (धारावर्ष) प्रथम ने उत्तर भारत पर आक्रमण कर वत्सराज को पराजित कर दिया और उज्जैन व कन्नौज पर अधिकार कर लिया। पराजित होकर वत्सराज को वापस राजपूताना के मरुस्थल (जालोर) की ओर शरण लेनी पड़ी।
    • इस युद्ध व पराजय की प्रामाणिक जानकारी 'राधनपुर' और 'वनी-डिंडोरी' (Wani-Dindori) अभिलेखों से प्राप्त होती है।

नागभट्ट द्वितीय (795 - 833 ई.)

  • प्रारंभिक जीवन: ये वत्सराज और महारानी सुंदरदेवी के पुत्र थे, जो वत्सराज के बाद गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य के उत्तराधिकारी बने।
  • उपाधि: बुचकला अभिलेख (जोधपुर) के अनुसार, इन्होंने 'परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर' की सर्वोच्च राजसी उपाधि धारण की थी।
  • कन्नौज विजय व राजधानी: नागभट्ट द्वितीय ने अपने पिता की हार का बदला लेते हुए पुनः अपनी शक्ति संगठित की। इन्होंने उज्जैन और कन्नौज पर विजय प्राप्त की तथा कन्नौज को स्थायी रूप से गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।
  • ग्वालियर प्रशस्ति में वर्णन: नागभट्ट द्वितीय की कन्नौज विजय और उनकी अपार शक्ति का वर्णन 'ग्वालियर अभिलेख' में मिलता है। इस प्रशस्ति में इन्हें आन्ध्र, आनर्त (गुजरात), मालव (मालवा), किरात, तुरुष्क (तुर्क), वत्स और मत्स्य आदि प्रदेशों का विजेता बताया गया है।
  • नागावलोक का दरबार: नागभट्ट प्रथम की ही भाँति नागभट्ट द्वितीय का दरबार भी अपनी भव्यता के लिए "नागावलोक का दरबार" कहलाता था।
  • मुस्लिम आक्रमणकारियों से संघर्ष: मुसलमानों (तुर्कों/अरबों) के विरुद्ध नागभट्ट द्वितीय के सफल संघर्ष का ऐतिहासिक प्रमाण मेवाड़ के प्रसिद्ध ग्रंथ 'खुम्माण रासो' में मिलता है।
  • राष्ट्रकूटों से पुनः संघर्ष: त्रिपक्षीय संघर्ष के अगले चरण में मान्यखेत के शक्तिशाली राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय ने उत्तर भारत पर आक्रमण कर नागभट्ट द्वितीय को पराजित किया और कन्नौज पर अधिकार कर लिया।
  • इतिहासकारों का कथन: राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय के इसी विशाल साम्राज्य विस्तार और सैन्य अभियानों के बारे में इतिहासकारों ने लिखा है कि— "गोविंद तृतीय के युद्ध के घोड़े हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक बिना किसी शत्रु क्षेत्र की परवाह किए सीधे दौड़ सकते थे।"

मिहिर भोज प्रथम (836 - 885 ई.)

  • प्रारंभिक जीवन: ये रामभद्र के पुत्र और नागभट्ट द्वितीय के पौत्र थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश में ये 'भोज' के नाम से सर्वाधिक विख्यात हुए। इनकी माता का नाम 'अप्पा देवी' था।
  • ऐतिहासिक स्रोत: इनका प्रथम प्रामाणिक अभिलेख 'वराह अभिलेख' है, जिसकी तिथि 893 विक्रम संवत् (836 ई.) है।
  • सैन्य अभियान एवं संघर्ष:
    • त्रिपक्षीय संघर्ष के दौरान मिहिर भोज को बंगाल के पाल वंशीय शासक देवपाल (धर्मपाल का पुत्र) से पराजय का सामना करना पड़ा था।
    • परंतु बाद में इन्होंने अपनी शक्ति को पुनः संगठित किया और पाल वंश के परवर्ती शासकों— नारायणपाल व विग्रहपाल को बुरी तरह पराजित किया।
  • अरब यात्री का विवरण (851 ई.): इनके शासनकाल में प्रसिद्ध अरब यात्री 'सुलेमान' ने भारत की यात्रा की थी। सुलेमान ने अपने यात्रा वृत्तांत में मिहिर भोज की अश्वरोही सेना की प्रशंसा की है और उसे 'मुसलमानों (अरबों) का सबसे बड़ा शत्रु' बताया है।
  • साम्राज्य विस्तार: मिहिर भोज का साम्राज्य उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में बुंदेलखंड तक और पूर्व में उत्तर प्रदेश (कन्नौज) से लेकर पश्चिम में गुजरात एवं काठियावाड़ तक विस्तृत था।
  • कल्हण की राजतरंगिणी: 12वीं सदी के प्रसिद्ध कश्मीरी कवि 'कल्हण' ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ 'राजतरंगिणी' में भी मिहिर भोज के विशाल साम्राज्य और उनकी शक्ति का स्पष्ट उल्लेख किया है।
  • प्रमुख उपाधियाँ:
    • आदिवराह: 'ग्वालियर प्रशस्ति/अभिलेख' में इन्हें भगवान विष्णु के वराह अवतार के समान पृथ्वी का उद्धारक बताते हुए 'आदिवराह' कहा गया है।
    • प्रभास: 'दौलतपुर अभिलेख' में इन्हें 'प्रभास' (सूर्य के समान तेजस्वी) की उपाधि दी गई है।
  • मुद्रा प्रणाली: इनके समय में चाँदी और ताँबे के उत्कृष्ट सिक्के चलाए गए थे। इन सिक्कों पर वराह भगवान की आकृति और 'श्रीमदादिवराह' शब्द अंकित रहता था।
  • राजपाट का त्याग: 'स्कंद पुराण' के विवरण के अनुसार, अपने जीवन के अंतिम समय में मिहिर भोज ने तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए अपना राजसिंहासन अपने पुत्र महेन्द्रपाल को सौंपकर राजपाट त्याग दिया था।

महेन्द्रपाल प्रथम (885 - 910 ई.)

  • प्रारंभिक जीवन: ये मिहिर भोज और महारानी चन्द्रा भट्टारिका देवी के पुत्र थे, जो मिहिर भोज के संन्यास लेने के बाद शासक बने। इनका शासनकाल शांति और सांस्कृतिक विकास का काल माना जाता है।
  • साम्राज्य विस्तार: महेन्द्रपाल प्रथम का साम्राज्य पश्चिम में काठियावाड़ (गुजरात) तक विस्तृत था, जो उनकी सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता है।
  • उपाधियाँ: प्रसिद्ध ग्रंथ 'विद्धशालभंजिका' में महेन्द्रपाल प्रथम को कई गौरवपूर्ण उपाधियों से अलंकृत किया गया है:
    • निर्भयराज
    • निर्भय नरेन्द्र
    • रघुकुल तिलक
    • रघुकुल चूड़ामणि
  • इतिहासकार का कथन: प्रसिद्ध इतिहासकार बी. एन. पाठक ने महेन्द्रपाल प्रथम को 'हिंदू भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट' कहकर संबोधित किया है।
  • साहित्यिक एवं सांस्कृतिक स्वर्णकाल:
    • इनके दरबार में संस्कृत के प्रकांड विद्वान 'राजशेखर' निवास करते थे। राजशेखर महेन्द्रपाल प्रथम के राजगुरु (काव्य गुरु) और दरबारी कवि दोनों थे।
  • राजशेखर द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ: राजशेखर ने कई कालजयी ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं:
    • कर्पूरमंजरी (यह प्राकृत भाषा में रचित है और इसे राजशेखर ने अपनी पत्नी अवंतिसुंदरी के कहने पर लिखा था)
    • काव्यमीमांसा
    • विद्धशालभंजिका
    • बालभारत (प्रचंड पांडव)
    • बालरामायण
    • हरविलास
    • भुवनकोश
    • प्रबंधकोश

महिपाल प्रथम (914 - 943 ई.)

  • उपाधियाँ: प्रसिद्ध दरबारी विद्वान राजशेखर ने महिपाल प्रथम को कई गौरवशाली उपाधियाँ प्रदान कीं, जिनमें प्रमुख हैं— 'आर्यावर्त का महाराजाधिराज', 'रघुकुल मुक्तामणि' और 'रघुवंश मुकुटमणि'।
  • साहित्यिक प्रमाण: राजशेखर द्वारा रचित ग्रंथ 'प्रचंड पाण्डव' (बालभारत) में महिपाल प्रथम की महान विजयों और शूरवीरता का विस्तृत वर्णन मिलता है।
  • अरब यात्री अल-मसूदी: इनके शासनकाल में 915 ई. (915-916 ई.) में प्रसिद्ध अरब यात्री 'अल-मसूदी' ने भारत की यात्रा की थी। अल-मसूदी के वृत्तांत के अनुसार, महिपाल ने उत्तर-पश्चिम (पंजाब) के 'कुलूतों' और 'रठों' को बुरी तरह पराजित किया था।
  • विभिन्न अभिलेखों में साम्राज्य का वर्णन:
    • कहला अभिलेख: इसके अनुसार, कलचुरि वंश का राजा 'भीमदेव' महिपाल के अधीन रहकर गोरखपुर प्रदेश पर शासन कर रहा था।
    • हड्डल अभिलेख: इससे ज्ञात होता है कि महिपाल का एक सामंत 'धरणीवराह' उसकी अधीनता स्वीकार करते हुए सौराष्ट्र (गुजरात) पर शासन कर रहा था।
  • राष्ट्रकूटों से संघर्ष: इनके समय में मान्यखेत के शक्तिशाली राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय ने मालवा पर भयानक आक्रमण कर उज्जैन को अपने अधिकार में ले लिया था और कन्नौज तक को तहस-नहस कर दिया था।
  • पुनर्विजय: इस भीषण संकट के बाद महिपाल प्रथम ने चंदेल वंश के शासक 'हर्ष' की सहायता से राष्ट्रकूटों को खदेड़ा और पुनः उज्जैन तथा अपने खोए हुए साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।

महेन्द्रपाल द्वितीय एवं परवर्ती शासक

  • यह महिपाल प्रथम और महारानी प्रसाधना देवी का पुत्र तथा गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य का उत्तराधिकारी था। इसके शासनकाल तक साम्राज्य लगभग सुरक्षित रहा।
  • महेन्द्रपाल द्वितीय के पश्चात् गुर्जर-प्रतिहार वंश पतन की ओर अग्रसर हो गया। इसके बाद क्रमशः देवपाल, विनायकपाल द्वितीय, महिपाल द्वितीय व विजयपाल जैसे निर्बल शासक गद्दी पर बैठे।

महिपाल द्वितीय

  • महिपाल द्वितीय के शासनकाल का उल्लेख 'बयाना अभिलेख' में प्राप्त होता है।
  • बयाना अभिलेख में इसे 'महाराजाधिराज महिपाल देव' की उपाधि से संबोधित किया गया है।

राज्यपाल (990 - 1019 ई.)

  • यह विजयपाल का उत्तराधिकारी था। इसके समय तक गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य अत्यंत क्षीण हो चुका था।
  • कन्नौज की समृद्धि: इसके समय में कन्नौज भारत का एक अत्यंत सुंदर, समृद्ध और वैभवशाली नगर था, जहाँ लगभग 10,000 भव्य मंदिर स्थित थे। नगर की सुरक्षा हेतु कन्नौज के चारों ओर 7 मजबूत किले (दुर्ग) बनाए गए थे।
  • महमूद गजनवी का आक्रमण (1018 ई.): जब 1018 ई. में गजनी के लुटेरे सुल्तान महमूद गजनवी ने कन्नौज पर भयंकर आक्रमण किया, तब राज्यपाल बिना युद्ध किए ही भयभीत होकर राजधानी छोड़कर जंगलों में भाग गया।
  • महमूद गजनवी के इस विनाशकारी आक्रमण के कारण प्रतिहार वंश का शासन पुनः सिमटकर केवल राजस्थान के कुछ हिस्सों तक ही सीमित रह गया।
  • विद्याधर चंदेल का आक्रमण: महमूद गजनवी के सामने बिना लड़े भाग जाने के कारण बुंदेलखंड के प्रतापी चंदेल शासक 'विद्याधर चंदेल' ने राज्यपाल को कायर कहना प्रारंभ कर दिया। राजपूतों के सम्मान को ठेस पहुँचने के कारण विद्याधर चंदेल ने अन्य राजाओं का संघ बनाकर राज्यपाल पर आक्रमण कर दिया, जिसमें लड़ते हुए राज्यपाल वीरगति को प्राप्त हुआ (उसे मार डाला गया)।

त्रिलोचनपाल (1019 - 1027 ई.)

  • यह राज्यपाल का पुत्र व उत्तराधिकारी था, जिसे विद्याधर चंदेल और अन्य राजपूत राजाओं ने कन्नौज की गद्दी पर बिठाया था।
  • राजधानी परिवर्तन: मुस्लिम आक्रमणों के भय से इसने कन्नौज के स्थान पर 'बारी' को अपनी नई राजधानी बनाया (इसका स्पष्ट उल्लेख प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान अल-बरूनी ने किया है)।
  • 1020 ई. में महमूद गजनवी ने पुनः आक्रमण किया और त्रिलोचनपाल को पराजित कर कन्नौज और बारी में भारी लूटपाट की और वापस गजनी लौट गया।

यशपाल (1027 - 1036 ई.)

  • यह गुर्जर-प्रतिहार वंश का अंतिम शासक था।
  • इसके शासनकाल और इसके द्वारा किए गए दानों का विस्तृत वर्णन 1036 ई. के 'कड़ा शिलालेख' में मिलता है।
  • यशपाल के पश्चात् कन्नौज पर गाहड़वाल वंश (चंद्रदेव गाहड़वाल) का अधिकार हो गया। बचे हुए गुर्जर-प्रतिहारों ने कुछ समय तक कन्नौज और आस-पास के क्षेत्रों में केवल छोटे सामंतों के रूप में शासन किया, और अंततः यह महान राजवंश इतिहास के पन्नों में विलीन हो गया।

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