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आमेर का कच्छवाहा राजवंश कंप्लीट नोट्स - स्थापना, महत्वपूर्ण शासक और स्थापत्य कला



राजस्थान में कछवाहा राजवंश का इतिहास

राजस्थान के ढूँढाड़ क्षेत्र में कछवाहा राजपूतों का उदय 12वीं शताब्दी में हुआ। ये स्वयं को भगवान राम के पुत्र 'कुश' का वंशज मानते हैं। 1612 ई. के आमेर शिलालेख में कछवाहा शासकों को 'रघुकुल तिलक' कहा गया है। प्रारंभ में ये अजमेर के चौहानों के सामंत हुआ करते थे।

महत्वपूर्ण तथ्य: कछवाहा वंश के ‘नरू’ से ‘नरूका’ और राव ‘शेखा’ से ‘शेखावत’ शाखाएँ निकलीं। राव शेखा द्वारा स्थापित राज्यक्षेत्र बाद में ‘शेखावाटी’ कहलाया।

रियासत के प्रतीक एवं धार्मिक मान्यताएँ

  • रियासत का ध्वज: प्रारंभ में ध्वज श्वेत रंग का था। मानसिंह प्रथम ने काबुल अभियान की सफलता के बाद 'पचरंगा' झंडा बनाया (नीला, पीला, लाल, हरा व काला)। इसके मध्य में सूर्य की आकृति है।
  • राज्य चिह्न: आमेर के राज्यचिह्न में सबसे ऊपर राधा-गोविंद जी का चित्र है और नीचे 'यतो धर्मस्ततो जय:' (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है) लिखा है।
  • कुलदेवी: जमवाय माता (अन्नपूर्णा माता)। इनका मुख्य मंदिर जमुवारामगढ़ (जयपुर) में है।
  • आराध्य देवी: शीला माता। इनका मंदिर आमेर दुर्ग में स्थित है (यह मूर्ति मानसिंह प्रथम बंगाल से लाए थे)।

प्रमुख प्रारंभिक शासक

1. दूल्हेराय (संस्थापक)

  • इनका मूल नाम तेजकरण (ढोला) था। ये नरवर (मध्य प्रदेश) के शासक सोढ़ासिंह के पुत्र थे।
  • 1137 ई. में इन्होंने दौसा के बड़गूजरों व मीणाओं को पराजित कर ढूँढाड़ में कछवाहा वंश की नींव रखी।
  • इन्होंने दौसा को अपनी प्रथम राजधानी बनाया।
  • इसके बाद माची के मीणाओं को हराया और माची का नाम बदलकर 'रामगढ़' रखा।
  • रामगढ़ में अपनी कुलदेवी 'जमवाय माता' का मंदिर बनवाया और जमुवारामगढ़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
  • 1170 ई. में मीणाओं के साथ युद्ध करते हुए ये वीरगति को प्राप्त हुए।

2. कोकिल देव

  • ये दूल्हेराय के पुत्र थे।
  • 1207 ई. में इन्होंने आमेर के मीणाओं को पराजित कर आमेर पर पूर्ण अधिकार कर लिया।
  • आमेर को अपनी तीसरी राजधानी बनाया, जो 1727 ई. (जयपुर शहर की स्थापना) तक कछवाहों की राजधानी रही।
  • इन्होंने आमेर में अंबिकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया था।

3. राजदेव (रामदेव)

  • इन्होंने 1237 ई. में आमेर में 'कदमी महल' का निर्माण करवाया।
  • यह आमेर का सबसे प्राचीन महल माना जाता है।
  • इसी कदमी महल में आमेर के कछवाहा शासकों का राज्याभिषेक मीणा सरदारों द्वारा अपने अंगूठे के रक्त से किया जाता था।

4. पृथ्वीराज कछवाहा (1503 - 1527 ई.)

  • ये प्रारंभ में कनफटे नाथ योगी के अनुयायी थे, लेकिन कालान्तर में गलताजी के रामानंद संप्रदाय के संत 'कृष्णदास पयहारी' के शिष्य बन गए।
  • इन्होंने महाराणा सांगा के सम्मान में अपने एक पुत्र का नाम सांगा रखा, जिसने बाद में 'सांगानेर' कस्बा बसाया।
  • इनके 12 पुत्र थे। उत्तराधिकार के संघर्ष से बचने के लिए इन्होंने अपने राज्य (आमेर) को 12 हिस्सों में बाँट दिया था, जिसे इतिहास में 'बारह कोटड़ी' कहा जाता है।
  • 17 मार्च, 1527 को खानवा के युद्ध में राणा सांगा की तरफ से बाबर के विरुद्ध लड़ते हुए ये वीरगति को प्राप्त हुए।
  • इनकी रानी बालाबाई (बीकानेर के राव लूणकरण की पुत्री) अपनी रामभक्ति के कारण ‘आमेर की मीरा बाई’ कहलाती हैं।

5. पूर्णमल (1527 - 1533 ई.)

  • पृथ्वीराज ने अपनी रानी बालाबाई के प्रभाव में आकर पूर्णमल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
  • 1527 ई. में पूर्णमल के शासक बनते ही पृथ्वीराज के बड़े पुत्र भीमदेव ने विद्रोह कर दिया।

6. भीमदेव कछवाहा (1533 - 1536 ई.)

  • यह पृथ्वीराज का बड़ा पुत्र था जिसने उत्तराधिकार के लिए संघर्ष किया।
  • 1533 ई. में पूर्णमल को पराजित कर यह आमेर का शासक बना।

7. रतनसिंह (1536 - 1547 ई.)

  • यह सदैव शराब के नशे में रहता था और राजकार्य में इसकी कोई रुचि नहीं थी। इसके शासन का सारा कामकाज तेजसी रायमलोत देखता था।
  • यह 1540 ई. तक स्वतंत्र शासक रहा, तत्पश्चात् इसने शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार कर ली।
  • भारमल की साजिश और उकसावे पर रतनसिंह के छोटे भाई आसकरण ने रतनसिंह को विष (जहर) देकर मार दिया और गद्दी पर बैठ गया।
  • बाद में भारमल ने चालाकी से आसकरण को अपने ही भाई का हत्यारा बताते हुए गद्दी से हटा दिया और स्वयं शासक बन गया।

8. भारमल (1547 - 1573 ई.)

  • जब भारमल शासक बना तब उसकी आयु लगभग 50 वर्ष थी।
  • मजनूं खाँ की मध्यस्थता से सर्वप्रथम दिसम्बर, 1556 (आगरा) में इसकी अकबर से मुलाकात हुई थी।
  • जनवरी, 1562 में अकबर की ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह (अजमेर) यात्रा के दौरान, अपने मित्र चगताई खाँ की मदद से सांगानेर के निकट भारमल ने अकबर से पुनः मुलाकात की।
  • इसने अकबर की अधीनता स्वीकार की और सांभर में अपनी पुत्री हरकू बाई (शाही बाई/मानमती/हरका बाई) का विवाह अकबर के साथ करवा दिया।
  • 20 जनवरी, 1562 को सांभर में अपने पुत्र भगवंतदास व पौत्र मानसिंह को अकबर की शाही सेवा में भेज दिया।
  • भारमल राजस्थान का पहला राजपूत शासक था जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए
  • सलीम (जहाँगीर) इसी जोधाबाई (हरकाबाई) का पुत्र था।
  • अकबर ने जोधाबाई को 'मरियम' और शेख सलीम चिश्ती ने 'उज्मानी' की उपाधि दी थी (इसका उल्लेख जहाँगीर की आत्मकथा 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' में मिलता है)।
  • अकबर ने भारमल को 5000 का मनसब प्रदान किया तथा ‘राजा’‘अमीर-उल-उमरा’ की उपाधि से सम्मानित किया।
  • भारमल ने आमेर में 'जामा मस्जिद' का निर्माण करवाया था।
  • 27 जनवरी 1573 ई. को आगरा में भारमल की मृत्यु हो गई और इसके बाद उनका पुत्र भगवंत दास शासक बना।

9. भगवंत दास (1573 - 1589 ई.)

  • भारमल की मृत्यु के बाद 1573 ई. में भगवंत दास आमेर की गद्दी पर बैठा।
  • अकबर ने इन्हें 5000 का मनसब और 'अमीर-उल-उमरा' की उपाधि प्रदान की थी।
  • इन्होंने सरनाल (गुजरात), कश्मीर और अफगानिस्तान के अभियानों में मुगलों की ओर से वीरतापूर्वक भाग लिया।
  • महाराणा प्रताप को समझाने के लिए अकबर द्वारा भेजे गए चार शिष्टमंडलों में से तीसरे शिष्टमंडल (नवम्बर 1573 ई.) का नेतृत्व भगवंत दास ने ही किया था।
  • इन्होंने 1585 ई. में अपनी पुत्री मानबाई का विवाह अकबर के पुत्र सलीम (जहाँगीर) से करवाया।
  • सलीम (जहाँगीर) ने मानबाई को 'शाह बेगम' की उपाधि दी थी। जहाँगीर का बड़ा पुत्र खुसरो इसी मानबाई से उत्पन्न हुआ था।
  • 1589 ई. में लाहौर में भगवंत दास की मृत्यु हो गई।
  • अकबर द्वारा इन्हें 5000 का मनसब एवं 'अमीर-उल-उमरा' की उपाधि प्रदान की गई।
  • अकबर के चित्तौड़ अभियान (1568 ई.) के समय ये मुगलों के साथ थे।
  • सितम्बर 1573 ई. में अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने हेतु तीसरे शिष्टमंडल के रूप में इन्हें मेवाड़ भेजा था।
  • 1583 से 1589 ई. तक इन्हें पंजाब की सूबेदारी प्रदान की गई।
  • 1585 ई. में इन्होंने अपनी पुत्री मानबाई का विवाह शहजादे सलीम (जहाँगीर) के साथ किया।
  • जहाँगीर मानबाई को 'सुल्तान-ए-निसा' नाम से बुलाता था और मुग़ल दरबार में मानबाई को 'शाह बेगम' का सर्वोच्च पद हासिल था।
  • 1604 ई. में मानबाई ने अपने पुत्र खुसरो के पितृद्रोही व्यवहार से दुखी होकर आत्महत्या कर ली थी।
  • भगवंत दास की मृत्यु 1589 ई. में लाहौर में हुई।

10. मिर्ज़ा राजा मानसिंह प्रथम (1589 - 1614 ई.)

  • जन्म: 1550 ई., मौजमाबाद में (इतिहासकार मुहणोत नैणसी के अनुसार)।
  • ये अकबर व जहाँगीर दोनों के समकालीन थे। 1589 ई. में पिता की मृत्यु के पश्चात् इन्होंने आमेर का शासन संभाला। इनका विधिवत राज्याभिषेक 15 जनवरी, 1590 को पटना (बिहार) में हुआ।
  • अकबर द्वारा इन्हें 'फर्जन्द' (पुत्र) की उपाधि और 7000 का सर्वोच्च मनसब प्रदान किया गया। ये अकबर के नवरत्नों में शामिल थे।
  • 1569 ई. में रणथम्भौर के शासक सुर्जन हाड़ा को मुगल अधीनता स्वीकार करवाने में इन्होंने अहम भूमिका निभाई।
  • जून 1573 ई. में अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने हेतु (दूसरे शिष्टमंडल के रूप में) मानसिंह को मेवाड़ भेजा।
  • 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में इन्होंने मुगल सेना का मुख्य नेतृत्व किया। युद्ध के अपेक्षित परिणाम न मिलने (प्रताप को बंदी न बना पाने) से नाराज होकर अकबर ने मानसिंह के मनसब में 2000 की कटौती की और दरबार में इनकी ड्योढ़ी बंद कर दी।

मानसिंह के प्रमुख सैन्य अभियान व सूबेदारी:

  • इन्होंने काबुल में रोशनाइयों के विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया।
  • 1587 ई. में इन्हें बिहार की सूबेदारी मिली।
  • 1592 ई. में उड़ीसा को जीतकर पहली बार उसे पूर्ण रूप से मुगल साम्राज्य का अंग बनाया।
  • बंगाल के शासक केदारनाथ को हराकर इन्होंने विजय प्राप्त की।

स्थापत्य कला, नगर निर्माण व सांस्कृतिक योगदान:

  • मानपुर (बिहार) और अकबरपुर/राजमहल (बंगाल) नामक नगरों की स्थापना की।
  • रोहतासगढ़ (बिहार) में सुन्दर महलों का निर्माण करवाया।
  • पुष्कर में 'मान महल' तथा आमेर में 'पंचमहल' का निर्माण करवाया।
  • बंगाल से शीला देवी की मूर्ति लाकर उसे आमेर दुर्ग में प्रतिष्ठित करवाया।
  • जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर): मानसिंह की रानी कनकावती ने बंगाल अभियान के दौरान अपने पुत्र जगतसिंह की मृत्यु होने पर उसकी स्मृति में यह मंदिर बनवाया। इस मंदिर की कृष्ण मूर्ति मानसिंह चित्तौड़ के मीरा मंदिर से लाए थे।
  • प्रसिद्ध संत दादूदयाल जी का मानसिंह के दरबार में आना-जाना था।
  • जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी और मीनाकारी कला को मानसिंह ही लाहौर से आमेर लेकर आए थे।
  • मृत्यु : 6 जुलाई, 1614 को इलिचपुर (एलिचपुर, महाराष्ट्र) में इनकी मृत्यु हुई। इनकी छतरी हाड़ीपुर (आमेर) में स्थित है।

11. भावसिंह (1614 - 1621 ई.)

  • मानसिंह प्रथम के सबसे बड़े पुत्र जगतसिंह की मृत्यु मानसिंह के जीवनकाल में ही हो गई थी।
  • नियमानुसार जगतसिंह का पुत्र 'महासिंह' उत्तराधिकारी होना चाहिए था, लेकिन मुगल बादशाह जहाँगीर ने हस्तक्षेप करते हुए मानसिंह के दूसरे पुत्र भावसिंह को आमेर के राजसिंहासन पर नियुक्त कर दिया।

12. मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम (1621 - 1667 ई.)

  • ये महासिंह के पुत्र थे और मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में आमेर की गद्दी पर बैठे।
  • इन्होंने तीन मुगल बादशाहों— जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के समकालीन रहकर मुगलों की सेवा की (लगभग 46 वर्षों तक, जो कछवाहा शासकों में सबसे लंबा कार्यकाल है)।

जहाँगीर और शाहजहाँ के काल में सैन्य अभियान:

  • जहाँगीर का काल: सर्वप्रथम 1623 ई. में जहाँगीर ने इन्हें अहमदनगर के मलिक अम्बर के विरुद्ध अभियान में भेजा था।
  • शाहजहाँ का काल: शाहजहाँ ने इन्हें 4000 का मनसब प्रदान कर जाटों के विद्रोह का दमन करने भेजा।
  • 1629 ई. में इन्होंने उत्तर-पश्चिम के उजबेगों तथा 1630 ई. में खानेजहाँ लोदी के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबाया।
  • 1636 ई. में शाहजहाँ के साथ बीजापुर एवं गोलकुंडा के विद्रोह को दबाने गए, जहाँ इनकी वीरता देखकर बादशाह शाहजहाँ ने इनका मनसब बढ़ाकर 5000 कर दिया।
  • 1637 ई. में शाहजादा सूजा के साथ कन्धार अभियान पर गए। इसी उत्कृष्ट सैन्य सेवा के अवसर पर शाहजहाँ ने इन्हें 'मिर्ज़ा राजा' की उपाधि से अलंकृत किया।
  • 1647 ई. में मध्य एशिया का अभियान किया तथा 1651 ई. में कन्धार को घेरा। लगभग 10 वर्षों तक कांगड़ा, कन्धार व पेशावर की लड़ाइयों में इनका सक्रिय योगदान रहा।
  • 1653 ई. तक इन्होंने दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह (शाहजहाँ का पौत्र) के साथ काबुल की सूबेदारी में सहयोग किया।

उत्तराधिकार संघर्ष और औरंगजेब का काल:

  • मुगल उत्तराधिकार संघर्ष में प्रारंभ में जयसिंह ने शाही सेना (शाहजहाँ/दारा) का सहयोग किया और शाहजादा शुजा की सेना को 1658 ई. में बहादरुपुर (बनारस) के युद्ध में पराजित किया। इस पर शाहजहाँ ने इनका मनसब बढ़ाकर 6000 कर दिया।
  • स्थितियों को भाँपते हुए अंत में ये औरंगजेब के पक्ष में चले गए। औरंगजेब ने 1659 ई. में इनका मनसब बढ़ाकर 7000 कर दिया।
  • औरंगजेब ने इन्हें मराठा शासक वीर शिवाजी के खिलाफ एक मजबूत सेना का नेतृत्व करने के लिए दक्षिण भेजा।

पुरन्दर की ऐतिहासिक संधि (11 जून, 1665 ई.):

  • यह ऐतिहासिक संधि शिवाजी और मिर्ज़ा राजा जयसिंह के मध्य हुई थी।
  • इस संधि के समय इतालवी विदेशी यात्री डॉ. निकोलाओ मनूची (Nicolao Manucci) भी उपस्थित था। इस संधि का आँखों देखा वर्णन मनूची ने अपनी पुस्तक 'स्टोरिया दो मोगोर' (Storia do Mogor) में किया है।
  • संधि की शर्तों के अनुसार, शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 के मनसब के साथ मुगल दरबार में उपस्थित होना तय हुआ।
  • 1666 ई. में मिर्ज़ा राजा जयसिंह के भरोसे और सुरक्षा के वादे पर ही शिवाजी आगरा के मुगल दरबार ('दीवान-ए-खास') में औरंगजेब के समक्ष उपस्थित हुए थे।

सांस्कृतिक योगदान एवं दरबारी विद्वान:

  • महाकवि बिहारी: इन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ 'बिहारी सतसई' की रचना की। कहा जाता है कि जयसिंह प्रत्येक दोहे पर बिहारी को एक सोने की मुहर (अशर्फी) भेंट करते थे।
  • रामकवि: इन्होंने 'जयसिंह चरित्र' नामक ग्रंथ लिखा।
  • कुलपति मिश्र: ये मिर्ज़ा राजा जयसिंह के दरबारी विद्वान थे जिन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की।
  • स्थापत्य कला: इन्होंने आमेर में 'जयगढ़ दुर्ग' का निर्माण (विस्तार) करवाया और औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में 'जयसिंहपुरा' नामक कस्बा बसाया।

मृत्यु एवं इतिहासकार का कथन:

  • 2 जुलाई, 1667 को दक्षिण अभियान के दौरान बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) में इनका निधन हो गया।
  • प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने मिर्ज़ा जयसिंह के बारे में लिखा है कि इनकी मृत्यु एलिजाबेथ के दरबार के सदस्य 'वॉल सिंघम' की भाँति हुई, जिसने अपना बलिदान ऐसे स्वामी (औरंगजेब) के लिए किया जो काम लेने में कठोर और मूल्यांकन में कृतघ्न था।

13. महाराजा रामसिंह प्रथम (1667 – 1689 ई.)

  • ये मिर्ज़ा राजा जयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे और सितम्बर 1667 ई. में आमेर के शासक बने।
  • शिवाजी का प्रकरण: पुरंदर की संधि के बाद जब शिवाजी आगरा आए, तो उन्हें रामसिंह की हवेली (रामसिंह को उनका गारंटर बनाया गया था) में ही ठहराया गया था। जब शिवाजी वहाँ से कूटनीति से निकलने में सफल हो गए, तो औरंगजेब रामसिंह से अत्यधिक नाराज हो गया और उनका मनसब कम कर दिया।
  • औरंगजेब की नाराजगी के कारण ही रामसिंह को उनके पूरे शासनकाल में किसी बहुत बड़े या स्वतंत्र सैन्य अभियान का नेतृत्व नहीं दिया गया (बाद में उन्हें असम और फिर काबुल भेजा गया)।
  • दरबारी विद्वान एवं साहित्य: इनके दरबार में कई विद्वान थे। कुलपति मिश्र ने 'रस रहस्य', दलपतिराम ने 'चगताई पातशाही' और शंकर भट्ट ने 'वैद्य विनोद संहिता' नामक ग्रंथों की रचना की।
  • 1689 ई. में काबुल (अफगानिस्तान) में इनका निधन हो गया।

14. विष्णुसिंह / बिशनसिंह (1689 - 1699 ई.)

  • ये रामसिंह प्रथम के पौत्र थे।
  • इन्होंने मथुरा और भरतपुर क्षेत्र में जाट विद्रोहों का दमन करने में मुगलों की सहायता की थी।
  • ये आमेर के पहले शासक थे जिन्होंने आमेर दुर्ग की सुनियोजित 'सैन्य किलेबंदी' करवाई थी।

15. सवाई जयसिंह द्वितीय (1700 - 1743 ई.)

  • जन्म व प्रारंभिक जीवन: इनका जन्म 3 दिसम्बर 1688 ई. को हुआ। इनका वास्तविक नाम 'विजयसिंह' था।
  • 'सवाई' की उपाधि: इनकी वाक्पटुता और रणकौशल से प्रभावित होकर औरंगजेब ने इनका नाम जयसिंह प्रथम (मिर्ज़ा राजा) से भी बढ़कर माना और इन्हें 'सवाई' (सवा गुना) की उपाधि दी, तथा इनके छोटे भाई का नाम विजयसिंह रख दिया। सवाई जयसिंह के पश्चात् जयपुर के सभी शासकों ने अपने नाम के आगे गर्व से 'सवाई' उपाधि का प्रयोग किया।
  • इन्हें अपनी दूरदर्शिता और कूटनीति के कारण 'आधुनिक चाणक्य' भी कहा जाता है। इन्होंने अपने जीवनकाल में सर्वाधिक सात मुग़ल बादशाहों का काल देखा था।

राजनैतिक संघर्ष और कूटनीति:

  • मुगल उत्तराधिकार युद्ध (1707 ई.): औरंगजेब की मृत्यु के बाद आजम और मुअज्जम के बीच हुए संघर्ष (जजाऊ का युद्ध) में जयसिंह ने आज़म का साथ दिया। परंतु विजयी मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) हुआ। बहादुरशाह ने आमेर पर अधिकार कर उसका नाम 'मोमिनाबाद / इस्लामाबाद' रख दिया और जयसिंह के छोटे भाई विजयसिंह को आमेर सौंप दिया।
  • देबारी समझौता (1708 ई.): आमेर पुनः प्राप्त करने के लिए जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय के साथ 'देबारी समझौता' किया। इसके तहत मेवाड़ की राजकुमारी चंद्रकुँवरी का विवाह जयसिंह से इस शर्त पर हुआ कि उससे उत्पन्न पुत्र ही आमेर का अगला राजा बनेगा। मेवाड़ की सहायता से इन्होंने आमेर पर पुनः अधिकार कर लिया।
  • मालवा की सूबेदारी: मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने 1713 ई. में इन्हें मालवा का सूबेदार बनाया। इसके बाद 1730 और 1732 ई. में भी इन्हें मालवा की सूबेदारी मिली।
  • मराठा हस्तक्षेप: 1729 ई. में जयसिंह द्वारा बूँदी रियासत के उत्तराधिकार मामले में हस्तक्षेप करने के कारण ही मराठों को राजपूताना की राजनीति में प्रवेश करने का पहला अवसर मिल गया था।
  • हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734 ई.): राजपूताना को मराठों के बढ़ते आक्रमणों से बचाने और सभी राजपूत राजाओं को संगठित करने के उद्देश्य से सवाई जयसिंह ने भीलवाड़ा के हुरड़ा नामक स्थान पर यह सम्मलेन आयोजित करवाया, परंतु आपसी स्वार्थों के कारण यह पूर्णतः असफल रहा।
  • जाट विद्रोहों के सफल दमन के कारण मुगल बादशाह मुहम्मद शाह 'रंगीला' ने इन्हें 'राजेश्वर श्री राजाधिराज' की उपाधि से सम्मानित किया।

नगर निर्माण एवं स्थापत्य कला:

  • जयपुर की स्थापना: 18 नवम्बर 1727 ई. को इन्होंने 'जयनगर' (वर्तमान जयपुर) की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया। इसके वास्तुकार बंगाली ब्राह्मण विद्याधर भट्टाचार्य थे।
  • उपनाम: जयपुर को स्टेनले रीड ने 'पिंक सिटी' (गुलाबी नगर) तथा वैज्ञानिक सी.वी. रमन ने 'रंग श्री द्वीप' (Island of Glory) की संज्ञा दी है।
  • सौर वेधशालाएँ (जंतर-मंतर): खगोल विज्ञान में गहरी रुचि के कारण इन्होंने देश में 5 वेधशालाओं का निर्माण करवाया— दिल्ली, जयपुर, मथुरा, उज्जैन और बनारस। जयपुर का जंतर-मंतर भारत की सबसे बड़ी वेधशाला है, जिसे वर्ष 2010 में UNESCO विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।
  • 1714 ई. में वृंदावन से भगवान गोविंद देव जी की मूर्ति लाकर आमेर (बाद में जयपुर के चंद्र महल) में स्थापित करवाई और भव्य मंदिर बनवाया।
  • जलमहल, चंद्रमहल (सिटी पैलेस), और अपनी रानी के लिए सिसौदिया रानी के महल का निर्माण करवाया।
  • मराठों से सुरक्षा हेतु 1734 ई. में जयपुर में 'नाहरगढ़' (सुदर्शनगढ़) दुर्ग का निर्माण करवाया।
  • जयगढ़ दुर्ग में एशिया की सबसे बड़ी तोप 'जयबाण तोप' का निर्माण करवाया (बाद में सवाई रामसिंह द्वितीय ने इसे पहियों पर रखवाया था)।

सांस्कृतिक, सामाजिक व वैज्ञानिक योगदान:

  • ये भारत के अंतिम हिंदू शासक थे जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन (1740 ई.) करवाया था। पुंडरीक रत्नाकर इसके मुख्य पुरोहित थे।
  • विद्वानों और साहित्यकारों के निवास के लिए जयपुर में 'ब्रह्मपुरी' और मथुरा में संन्यासियों के लिए 'वैराग्यपुरा' नामक बस्तियाँ बसाईं।
  • इनके कूटनीतिक प्रयासों से मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला ने 1720 ई. में हिन्दुओं पर लगने वाला 'जजिया कर' समाप्त कर दिया। इसके अलावा इन्होंने गया (बिहार) में तीर्थकर और इलाहाबाद में गंगा स्नान कर को भी समाप्त करवाया।
  • साहित्य: 1725 ई. में ग्रहों व नक्षत्रों की सटीक जानकारी के लिए एक शुद्ध सारणी बनवाई, जिसका नाम तत्कालीन बादशाह के नाम पर 'जीज मुहम्मदशाही' रखा। ज्योतिष विद्या पर 'जयसिंह कारिका' नामक महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की।
  • मृत्यु: 1743 ई. में रक्त विकार (ब्लड इन्फेक्शन) के कारण इनका निधन हो गया। इनकी छतरी गैतोर (जयपुर) में स्थित है।

16. सवाई ईश्वरी सिंह (1743 - 1750 ई.)

  • उत्तराधिकार संघर्ष: सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों— ईश्वरी सिंह और माधो सिंह (मेवाड़ की राजकुमारी चंद्रकुँवरी के पुत्र) के मध्य जयपुर की राजगद्दी को लेकर भीषण संघर्ष हुआ।
  • राजमहल का युद्ध (1747 ई.): यह युद्ध टोंक के राजमहल नामक स्थान पर लड़ा गया। इसमें सवाई ईश्वरी सिंह ने अपने भाई माधो सिंह और उसकी समर्थक सेनाओं को पराजित किया।
  • ईसरलाट / सरगासूली का निर्माण: राजमहल युद्ध की विजय के उपलक्ष्य में ईश्वरी सिंह ने जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में 'ईसरलाट' (सरगासूली) नामक 7 मंजिला भव्य इमारत का निर्माण करवाया। यह मीनार चित्तौड़गढ़ के 'विजय स्तंभ' से प्रेरित मानी जाती है।
  • बगरू का युद्ध (1748 ई.): इस युद्ध में माधो सिंह ने मराठों और कोटा-बूँदी की संयुक्त सेना की सहायता से ईश्वरी सिंह को पराजित कर दिया और राज्य के कुछ हिस्से प्राप्त किए।
  • निधन (1750 ई.): मराठों के बढ़ते आर्थिक दबाव, निरंतर धन की माँग और सेनापति हरगोविंद नटाणी की गद्दारी से हताश होकर ईश्वरी सिंह ने सरगासूली से कूदकर (कुछ स्रोतों के अनुसार विष पीकर) आत्महत्या कर ली। ये राजपूताने के एकमात्र शासक थे जिन्होंने मराठों के दबाव में आत्महत्या की थी

17. सवाई माधो सिंह प्रथम (1750 - 1768 ई.)

  • ये सवाई जयसिंह और मेवाड़ की राजकुमारी चंद्रकुँवरी के पुत्र थे (देबारी समझौते की शर्त के तहत)।
  • मराठा सरदारों— मल्हार राव होल्कर और जयप्पा सिंधिया के सहयोग से 2 जनवरी 1751 ई. को ये जयपुर के शासक बने।
  • मराठों का कत्लेआम (1751 ई.): मराठों द्वारा बार-बार धन की अनुचित माँग करने और जयपुर की जनता को परेशान करने से दुखी होकर, माधो सिंह ने जयपुर शहर के दरवाजे बंद करवाकर मराठों का कत्लेआम करवा दिया था।
  • भटवाड़ा का युद्ध (नवम्बर 1761 ई.): यह युद्ध रणथम्भौर दुर्ग के नियंत्रण को लेकर सवाई माधो सिंह प्रथम और कोटा के महाराव शत्रुशाल के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में कोटा के सेनापति झाला जालम सिंह के नेतृत्व में शत्रुशाल विजयी हुए।
  • कामां का युद्ध: इसमें इन्होंने भरतपुर के शासक जवाहर सिंह को पराजित किया।
  • इन्होंने रणथम्भौर दुर्ग को मुगलों से छीनकर जयपुर रियासत में पूर्णतः सम्मिलित कर लिया।
  • स्थापत्य व नगर निर्माण: 1763 ई. में इन्होंने 'सवाई माधोपुर' शहर बसाया। इसके अलावा चाकसू (जयपुर) में शील की डूंगरी पर 'शीतला माता' के प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण करवाया।

18. सवाई प्रताप सिंह (1778 - 1803 ई.)

  • ये भगवान गोविंद देव जी को ही जयपुर का वास्तविक शासक मानते थे और स्वयं को उनका दीवान (सेवक) मानकर राजकाज चलाते थे। इनके राजशाही आदेशों का आरंभ 'श्री दीवान बचनात' (दीवान के वचनों से) शब्दों से होता था।
  • तुंगा का युद्ध (28 जुलाई 1787 ई.): दौसा के निकट तुंगा के मैदान में प्रताप सिंह ने जोधपुर सेना की मदद से मराठा सेनापति महादजी सिंधिया को बुरी तरह पराजित किया।
  • पाटन का युद्ध (20 जून 1790 ई.): महादजी सिंधिया ने फ्रांसीसी सेनापति 'डी बोई' (De Boigne) के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी और प्रताप सिंह को पराजित कर तुंगा की हार का बदला लिया।
  • साहित्यिक एवं सांस्कृतिक योगदान: ये स्वयं एक अच्छे कवि थे और 'ब्रजनिधि' उपनाम से कविताएँ लिखते थे। इनका कविता संग्रह 'ब्रजनिधि ग्रंथावली' कहलाता है।
  • इन्होंने जयपुर में 'संगीत ब्रजनिधि सम्मेलन' का आयोजन करवाया तथा संगीत के प्रसिद्ध ग्रंथ 'राधा-गोविंद संगीत सार' की रचना करवाई।
  • प्रताप बाईसी (गंधर्व बाईसी): इनके दरबार में 22 विभिन्न विषयों के प्रख्यात विद्वानों, संगीतज्ञों और कलाकारों की एक मंडली रहती थी, जिसे 'प्रताप बाईसी' कहा जाता था। इसके प्रधान चाँद खाँ थे।
  • प्रताप सिंह के संगीत गुरु चाँद खाँ थे (जिन्हें प्रताप सिंह ने 'बुद्ध प्रकाश' की उपाधि दी थी) और काव्य गुरु गणपति भारती थे।
  • हवामहल का निर्माण: 1799 ई. में प्रताप सिंह ने जयपुर के विश्व-प्रसिद्ध 5 मंजिला 'हवामहल' का निर्माण करवाया। यह इमारत भगवान कृष्ण के मुकुट के आकार की है और भगवान विष्णु को समर्पित है। इसके वास्तुकार उस्ताद लालचंद थे।

19. सवाई जगत सिंह द्वितीय (1803 - 1818 ई.)

  • ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि: मराठों और पिंडारियों के आतंक से त्रस्त होकर जगत सिंह ने 5 अप्रैल 1818 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधि कर ली।
  • रस कपूर का प्रभाव: इनका 'रस कपूर' नामक एक नर्तकी के साथ गहरा प्रेम प्रसंग था। इन्होंने रस कपूर को राज्य का आधा हिस्सा दे दिया था और जयपुर के सिक्कों पर उसका नाम भी अंकित करवाया था। इसी अंधानुकरण के कारण इतिहास में इन्हें 'जयपुर का बदनाम शासक' कहा जाता है। (बाद में विरोध होने पर रस कपूर को नाहरगढ़ दुर्ग में कैद कर दिया गया था)।
  • गिंगोली का युद्ध (13 मार्च 1807 ई.): यह ऐतिहासिक युद्ध सवाई जगत सिंह द्वितीय और जोधपुर के महाराजा मानसिंह के मध्य परबतसर (नागौर) के गिंगोली नामक मैदान में लड़ा गया। इस युद्ध का मुख्य कारण मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की राजकुमारी 'कृष्णा कुमारी' से विवाह का विवाद था। इस युद्ध में जगत सिंह विजयी हुए।

20. सवाई रामसिंह द्वितीय (1835 - 1880 ई.)

  • अल्पायु में राज्याभिषेक व मेजर लुडलो का प्रभाव: मात्र 16 माह की अल्पायु में शासक बनने के कारण प्रारंभ में राज्य का प्रशासन एक 'रिजेंसी काउंसिल' द्वारा चलाया गया, जिसके अध्यक्ष अंग्रेज अधिकारी मेजर जॉन लुडलो थे।
  • सामाजिक कुप्रथाओं पर रोक: मेजर लुडलो के प्रयासों से ही जयपुर रियासत में 'सती प्रथा', 'समाधि प्रथा', 'कन्या वध' और 'दास प्रथा' (कन्या क्रय-विक्रय) जैसी सामाजिक कुप्रथाओं पर कानूनी रूप से रोक लगाई गई।
  • 1857 की क्रांति व 'सितार-ए-हिन्द': 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रामसिंह द्वितीय ने तन, मन और धन से अंग्रेजों की भरपूर सहायता की थी। इससे प्रसन्न होकर ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'कोटपूतली का परगना' और 'सितार-ए-हिन्द' की प्रतिष्ठित उपाधि प्रदान की थी।
  • कला एवं शिक्षा (मदरसा-ए-हुनरी): 1857 ई. में इन्होंने जयपुर में कला एवं शिल्प के विकास के लिए 'मदरसा-ए-हुनरी' की स्थापना की। (बाद में सवाई माधोसिंह द्वितीय ने इसका नाम बदलकर 'महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स' / 'राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स' कर दिया था)।
  • स्वर्णकाल: सवाई रामसिंह द्वितीय के शासनकाल को जयपुर में 'संस्कृत भाषा की रचनाओं' और 'ब्लू पॉटरी' (Blue Pottery) कला का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • गुलाबी नगर (Pink City) और अल्बर्ट हॉल: 1876 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स (अल्बर्ट एडवर्ड) के जयपुर आगमन के अवसर पर इन्होंने पूरे जयपुर शहर को गेरुए (गुलाबी) रंग से रंगवाया था। इसी आगमन की स्मृति में 1876 ई. में 'अल्बर्ट हॉल संग्रहालय' की नींव रखी गई, जो राजस्थान का प्रथम और सबसे पुराना संग्रहालय है।
  • स्थापत्य कार्य: इन्होंने जयपुर में 'रामप्रकाश थिएटर' (उत्तरी भारत का पहला पारसी थिएटर), 'रामनिवास बाग', 'महाराजा कॉलेज' (1844 ई.), और 'संस्कृत कॉलेज' आदि का निर्माण करवाया।
  • मुद्रा: इनके द्वारा जयपुर रियासत में चलाए गए सिक्कों को 'झाड़शाही सिक्के' कहा जाता था (इनका वजन 167 ½ ग्रेन होता था)।

21. सवाई माधोसिंह द्वितीय (1880 - 1922 ई.)

  • इतिहास में इन्हें 'बब्बर शेर' के उपनाम से भी जाना जाता है।
  • डाक व्यवस्था की शुरुआत: राजस्थान की सभी रियासतों में सर्वप्रथम 1904 ई. में डाक टिकट और पोस्टकार्ड की शुरुआत जयपुर रियासत में माधोसिंह द्वितीय के काल में ही हुई थी।
  • लंदन यात्रा और चाँदी के कलश: 1902 ई. में ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने के लिए ये लंदन गए। अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण ये अपने साथ पीने के लिए 'गंगाजल' चाँदी के दो विशाल कलशों में भरकर ले गए थे। ये दुनिया के सबसे बड़े चाँदी के पात्र हैं, जो गिनीज बुक में दर्ज हैं और वर्तमान में जयपुर के सिटी पैलेस में सुरक्षित रखे हुए हैं।
  • शैक्षणिक योगदान: इन्होंने पंडित मदन मोहन मालवीय को 'बनारस हिंदू विश्वविद्यालय' (BHU) के निर्माण के लिए 5 लाख रुपये का सर्वाधिक आर्थिक अनुदान दिया था।
  • स्थापत्य कला (मुबारक महल): इन्होंने चंद्रमहल (सिटी पैलेस) परिसर में अतिथियों के ठहरने के लिए 'मुबारक महल' का निर्माण करवाया। यह महल राजपूत, मुग़ल और यूरोपीय स्थापत्य शैली का एक अति-सुंदर मिश्रण है।
  • माधवेन्द्र भवन: इन्होंने जयपुर के नाहरगढ़ दुर्ग में अपनी 9 पासवानों (प्रेमिकाओं) के लिए एक ही शैली (विक्टोरिया शैली) में 9 एक जैसे भव्य महलों का निर्माण करवाया, जिसे सम्मिलित रूप से 'माधवेन्द्र भवन' कहा जाता है।

22. सवाई मानसिंह द्वितीय (1922 - 1949 ई.)

  • इनका मूल नाम मोर मुकुट सिंह था। ये जयपुर के कछवाहा राजवंश के अंतिम शासक थे।
  • आधुनिक विकास: इनके शासनकाल में जयपुर में पहली बार सुव्यवस्थित विद्युत (बिजली) सेवा की शुरुआत हुई और पंचायती राज से संबंधित आधुनिक कानून बनाए गए।
  • मिर्ज़ा इस्माइल: इनके प्रधानमंत्री सर मिर्ज़ा इस्माइल थे। जयपुर के सुनियोजित विकास के कारण मिर्ज़ा इस्माइल को 'आधुनिक जयपुर का निर्माता' कहा जाता है (जयपुर के प्रमुख एम.आई. रोड का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है)।
  • एकीकरण व राजप्रमुख: 30 मार्च 1949 को वृहद् राजस्थान के निर्माण के समय जयपुर रियासत का राजस्थान में विलय हो गया। सवाई मानसिंह द्वितीय को राजस्थान का आजीवन राजप्रमुख (1949 से 1956 ई. तक) बनाया गया। 1956 में राज्यपाल पद के सृजन के बाद यह पद समाप्त हो गया।
  • खेल जगत: ये विश्व स्तर के पोलो (Polo) के अत्यंत प्रसिद्ध खिलाड़ी थे।
  • इनकी पत्नी महारानी गायत्री देवी थीं, जो बाद में राजस्थान की पहली महिला लोकसभा सांसद बनीं।

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