राजस्थान की कला एवं संस्कृति में लोकगीतों का अत्यंत महत्व है। यह नोट्स विशेष रूप से RPSC, REET, Patwar और CET जैसी परीक्षाओं के लिए तैयार किए गए हैं। इसमें पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQ) भी शामिल हैं।
महात्मा गांधी: "लोकगीत जनता की भाषा है और हमारी संस्कृति के पहरेदार हैं।"
देवेन्द्र सत्यार्थी: "लोकगीत किसी संस्कृति के 'मुंह बोले चित्र' हैं।" (Patwar-2011)
रवींद्रनाथ टैगोर: "लोकगीत संस्कृति का सुखद संदेश ले जाने वाली कला है।"
ऐतिहासिक तथ्य:
1. राजस्थान में लोकगीतों के संग्रह का कार्य जैन कवियों द्वारा (500 वर्ष पूर्व) शुरू किया गया।
2. C.E. Gover का ग्रंथ 'Folk Songs of Southern India' (1871) भारत में लोक साहित्य का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
3. हरिसिंह संगीतज्ञ: इनके बारे में किंवदंती है कि इन्होंने एक राग से पत्थर पिघला दिया था। (Patwar-2011)
1. राजस्थान में लोकगीतों के संग्रह का कार्य जैन कवियों द्वारा (500 वर्ष पूर्व) शुरू किया गया।
2. C.E. Gover का ग्रंथ 'Folk Songs of Southern India' (1871) भारत में लोक साहित्य का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
3. हरिसिंह संगीतज्ञ: इनके बारे में किंवदंती है कि इन्होंने एक राग से पत्थर पिघला दिया था। (Patwar-2011)
1. जन्म एवं संस्कार गीत (Birth Songs)
- अजमो: गर्भावस्था के आठवें महीने में गाया जाता है।
- जच्चा / होलर: पुत्र जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला मुख्य गीत। (Police-18)
- घूघरी: मरुस्थलीय क्षेत्रों में बच्चे के जन्म पर। (Librarian-20)
- हालरा / पालना: जैसलमेर क्षेत्र में बच्चे के जन्म पर/झूला झूलाते समय।
- बेमाता गीत: नवजात शिशु का भाग्य लिखने वाली 'बेमाता' के लिए।
- पील्हां (जलवा): शिशु जन्म के बाद कुआं पूजन (जलवा पूजन) के समय।
- पड़वलियों: बालक के जन्म के बाद बाल-मनुहार के लिए।
2. विवाह गीत (Wedding Songs)
- सगाई: सगाई तय होने पर गाया जाने वाला गीत।
- विनायक: मांगलिक कार्यों की शुरुआत में (गणेश पूजन)।
- चाक गीत: कुम्हार के घर चाक पूजते समय।
- पीठी: वर-वधू को उबटन/हल्दी लगाते समय (रूप निखारने हेतु)। (REET-23)
- बान: विवाह के अवसर पर 'बान बैठने' की रस्म पर।
- भात/मायरा: भात भरते समय (बीरा गीत)।
- बरसो: विवाह पूर्व दूल्हे को आशीर्वाद देने के लिए।
- निकासी / घोड़ी: दूल्हे की बारात रवानगी के समय। (ARO-22)
- जलो और जलाल: जब बारात वधू के घर आती है, तो वधू पक्ष की स्त्रियाँ बारात का डेरा देखने जाती हैं। (FSO-19)
- कामण: वर को जादू-टोने से बचाने के लिए।
- कुंकड़लू: जब दूल्हा तोरण पर पहुँचता है।
- काजलियो: भाभी द्वारा दूल्हे की आँखों में काजल डालते समय (16 श्रृंगार)।
- दुपट्टा: दूल्हे की सालियों द्वारा गाया जाता है।
- सींठणे: भोजन के समय दी जाने वाली मीठी गालियाँ।
- ओल्यूं / कोयलड़ी: बेटी की विदाई के समय (याद में)। (JEN-22)
- पावणा: दामाद के ससुराल आने पर भोजन करवाते समय। (Patwar-11)
- फलसड़ा: विवाह में अतिथियों के आगमन पर।
- धुमालड़ी व मदकर: यह भी एक प्रकार का विदाई गीत है।
3. विरह एवं प्रेम गीत (Love & Separation)
- केसरिया बालम: (राज्य गीत) मांड गायकी में। पति को बुलाने का संदेश। अल्लाह जिलाई बाई ने सर्वाधिक गाया।
- कुरंजा: विरहिणी द्वारा 'कुरंजा पक्षी' को संदेश देकर (मारवाड़)। (3rd Grd-23)
- झोरावा: जैसलमेर में पति के परदेश जाने पर वियोग में। (Supervisor-15)
- सुवटिया: भील स्त्री द्वारा परदेश गए पति को संदेश (तोते के माध्यम से)। (Raj Police-15)
- कागा: कौए को उड़ने का शकुन मनाना (प्रियतम के आने की आस में)।
- पीपली: शेखावाटी/मारवाड़ में वर्षा ऋतु (तीज) पर। (REET-23)
- मूमल: जैसलमेर (लोद्रवा की राजकुमारी) का श्रृंगारिक/प्रेम गीत। (LDC-18)
- ढोला-मारू: सिरोही का प्रेम गीत (ढाढ़ी जाति)। (Patwar-11)
- मोरिया: ऐसी बालिका की व्यथा जिसका संबंध (सगाई) तो तय हो चुका है, लेकिन विवाह में देरी है। (मोर = मोरिया)।
- हिचकी: मेवात (अलवर) में याद आने पर।
- सपना (सुपणा): विरहिणी द्वारा स्वप्न का वृत्तांत सुनाते हुए।
- काछबा: पश्चिमी राजस्थान का प्रेम गाथा गीत।
- पपैया: आदर्श प्रेम गीत (दांपत्य प्रेम का प्रतीक, जिसमें पुरुष अन्य स्त्री से मिलने को मना करता है)।
- लावणी: नायक द्वारा नायिका को बुलाने हेतु। मोरध्वज, भरथरी और सेऊ-समन की लावणियां प्रसिद्ध हैं।
- सुपियारदे: त्रिकोणीय प्रेम गाथा का वर्णन।
- लूंणाधार: लूनी नदी की बाढ़ और उदासी का वर्णन।
4. क्षेत्रीय व जनजातीय गीत (Regional/Tribal)
- पटेल्या, बीछियो, लालर: मेवाड़ के पर्वतीय क्षेत्रों में आदिवासियों के गीत। (CET-2024, EO/RO)
- हमसीढ़ो: उत्तरी मेवाड़ में भील स्त्री-पुरुष का युगल गीत। (Raj Police-15)
- रसिया (बम रसिया): भरतपुर/धौलपुर (ब्रज क्षेत्र) में होली के अवसर पर।
- रतवई: मेवात क्षेत्र में मेव महिलाओं द्वारा (रतवई नृत्य के साथ)। (Sangnak-25)
- आल्हा, लहंगी, हींडा: सहरिया जनजाति द्वारा (वर्षा/दिवाली पर)।
- लूर: राजपूत स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत।
- मोरिया थाई री थाई: गरासिया जनजाति (दूल्हे की प्रशंसा में)।
5. भक्ति गीत (Devotional Songs)
- जीण माता का गीत: सबसे लंबा लोकगीत। कनफटे जोगी डमरू-सारंगी के साथ गाते हैं। (CET-23)
- रामदेवजी (ब्यावले): लोकदेवताओं में सबसे लंबा भजन। 'नेतल रा भरतार' भी।
- चिरजा: देवियों की स्तुति। (3rd Grade-12). दो प्रकार: (1) सिंघाऊ (शांतिकाल), (2) घाड़ऊ (विपत्ति काल)।
- तेजा: खेती की बुवाई के समय (तेजा टेर)।
- हरजस: राम-कृष्ण लीला वर्णन (सगुण भक्ति)। शेखावाटी में वृद्ध की मृत्यु पर भी। (REET-23)
- लांगुरिया: कैला देवी (करौली) की भक्ति में। (2nd Grd-11)
- रतनराणा: अमरकोट के सोढ़ा राणा रतनसिंह का गीत (बाड़मेर/पाक सीमा)।
- जकड़ियां: मुस्लिम पीरों की प्रशंसा में।
- भूटनी: भरतपुर में देवी-देवताओं की आराधना में।
- गोगा: गोगाजी की आराधना में।
6. मृत्यु गीत (Death Songs)
- मरसिया: मारवाड़ में किसी प्रसिद्ध व्यक्ति/वीर की मृत्यु पर।
- छेड़े: शिशु (बच्चे) की मृत्यु पर। (2nd Grade-19)
- हर का हिंडोला: वृद्ध की मृत्यु पर। (REET Mains-23)
7. विविध गीत (Miscellaneous)
- गोरबंद: ऊँट के गले का आभूषण (शेखावाटी/मरुस्थल)।
- जीरो: पत्नी पति से जीरे की फसल न बोने की विनती करती है ("मत बाओ म्हारा परण्या जीरो...")।
- इंडाणी / पणिहारी: पानी भरते समय (पतिव्रत धर्म का संदेश)। (Vanrakshak-22)
- लसकरिया, बींद, रसाला, रमगारिया: शेखावाटी के कच्छी घोड़ी नृत्य के समय।
- पंछीड़ा: हाड़ौती/ढूंढाड़ में मेलों के समय (अलगोजा के साथ)।
- धुंसा: मारवाड़ का राज्य गीत (अजीत सिंह की धाय 'गोरा धाय' की याद में)।
- कांगसियो: बालों के श्रृंगार (कंघी) का गीत।
- बादली: वर्षा ऋतु से सम्बंधित गीत (शेखावाटी/मेवाड़/हाड़ौती)।
- भणेत: श्रम करते समय थकान मिटाने हेतु।
- फाग / धमाल: होली के अवसर पर गाए जाने वाले गीत।
- हीड़: मेवाड़ में दिवाली पर आदिवासियों द्वारा (दीपक)।
- घुड़ला: मारवाड़ में घुड़ला पर्व पर (कन्याओं द्वारा)।
- चिरमी: ससुराल में भाई/पिता की प्रतीक्षा में (चिरमी पौधे को संबोधित कर)। (3rd Grade-23)
- जीखड़ी: सहेलियों द्वारा लड़की की विदाई पर।
- जांगड़ा: युद्ध के समय (वीर रस)।
- डूंगरिया: ससुराल में महिला द्वारा भाई के लिए।
- दारूड़ी: रजवाड़ों में शराब पीते समय।
- चरचरी: ताल और नृत्य के साथ उत्सव में।
- कलली: शराब निकालने/बेचने वालों का सवाल-जवाब गीत।
- कलाकी: यह एक वीर रस प्रधान गीत है।
Note:
ध्रुपद गायकी लोकगीत नहीं है। इसे राजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर) ने शुरू किया था। राजस्थान के प्रथम ध्रुपद गायक मधुभट्ट तैलंग हैं। (Patwar-2011)
